जिस शनिवार की रात गाजियाबाद में एक युवा नर्स मुख्य सड़क से केवल 40 फुट की दूरी पर बलात्कार का शिकार हुई उसी रात, काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू में सुरक्षा के लिए आंदोलन कर रही लड़कियों ने पुलिस की लाठियां खाईं. एक ही दिन घटने के अलावा इन दोनों घटनाओं में एक संबंध यह भी है कि बीएचयू की ये लड़कियां अपना हश्र युवा नर्स जैसा होने से बचाना चाहती थीं और इसीलिए वे प्रदर्शन कर रहीं थीं. इसके लिए उन्हें लाठियां तब पड़ीं जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके साथ लड़कियों की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वैड बनाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन्हीं के शहर बनारस में थे.

बीएचयू में चल रहे इस आंदोलन को अब एक तबका वामपंथी ताकतों का प्रभाव या सरकार को बदनाम करने की कोशिश बता रहा है. लेकिन यह देखा जाए तो यह असल में राजनीति का क ख ग... भी न जानने वाली लड़कियों का न्याय मांगने के लिए किया गया सत्याग्रह है. बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि इसे सरकार और संघ से शह प्राप्त कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी के झूठे दंभ ने तिल से ताड़ बना दिया है. जानते हैं, आंदोलन के शुरू होने से लेकर लाठीचार्ज से इसे कुचले जाने तक का घटनाक्रम.

21 सितंबर

शाम करीब छह बजे विजुअल आर्ट्स, सेकंड इयर की एक छात्रा, फैकल्टी से निकल कर अपने हॉस्टल जाने के रास्ते में, छेड़छाड़ की शिकार होती है. यह छेड़छाड़ इतनी ही नहीं है कि बाइक पर सवार दो लड़के आपके बगल से फब्तियां कसकर या सीटियां मारकर निकल गए हों. यह इतनी बढ़ती है कि वे लड़के अंधेरे का फायदा उठाकर उस 18-19 साल की बच्ची के कपड़ों में हाथ डालकर, भद्दे शब्दों से उसे बुरी तरह अपमानित करने के बाद छोड़ते हैं.

इस घटना से डरी हुई छात्रा बेहोश हो गई और आसपास मौजूद लोगों की मदद से किसी तरह हॉस्टल पहुंचाई गई. इसी दौरान भारत कला भवन के सामने, जहां पर यह घटना घट रही थी, से कुछ ही दूरी पर यूनिवर्सिटी में अनुशासन बनाए रखने के लिए जवाबदार (प्रॉक्टोरियल ऑफिसर) और विश्वविद्यालय के कुछ और कर्मचारी भी खड़े थे. घटना की शिकार लड़की की एक सहपाठी बताती हैं, ‘यह कहना मुश्किल है कि वे वहां खड़े होकर तमाशा देख रहे थे या उसे अनदेखा करने की कोशिश कर रहे थे.’

घटना की शिकार छात्रा करीब आठ बजे कुछ और लड़कियों को साथ लेकर अपने हॉस्टल त्रिवेणी की वार्डन रजनी मिश्रा और प्रॉक्टोरियल ऑफिसर के सामने अपनी शिकायत रखने पहुंची. बताते हैं कि प्रॉक्टोरियल ऑफिसर जो खुद अपनी आंखों से इस घटना देख चुके थे, हंसते हुए कुछ उलटे ही सवाल करते नजर आए. जैसे – छह बजे तो तुम्हें हॉस्टल में होना चाहिए था, तुम इतनी देर तक बाहर क्यों घूम रही थी? कॉमर्स की छात्रा सुधा (सभी नाम बदले हुए) बताती हैं कि ऐसी ही कुछ बातें लड़कियों से वार्डन रजनी ने भी कहीं. सुधा के मुताबिक वार्डन का कहना था, ‘तुम लड़की हो तुम्हें थोड़ा डरकर रहना पड़ेगा, मुझे देखो मेरी इतनी उमर हो गई है पर मैं कभी अकेले बाहर नहीं निकलती हूं. तुम्हें तो अब इन चीजों की आदत हो जानी चाहिए.’

रात होने का बहाना बनाकर वार्डन ने लड़कियों को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने जाने देने की अनुमति देने में भी आनाकानी की और उन्हें आचार-व्यवहार पर लंबा लेक्चर सुनाया. कुछ लड़कियां जो अपने फोन पर इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहीं थीं, के साथ हॉस्टल को-ऑर्डिनेटर कल्पना गुप्ता ने धक्का-मुक्की और मारपीट भी की. सुधा बताती हैं कि वार्डन और को-ऑर्डिनेटर के इसी व्यवहार ने लड़कियों को धरने पर बैठने को मजबूर कर दिया. हालांकि इसके बावजूद वे पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने में सफल हो गई थीं.

त्रिवेणी ह़ॉस्टल में रहने वाली कुछ लड़कियां बताती हैं कि हॉस्टल लौटने के लिए पौने आठ बजे का समय निर्धारित है. उस दिन इस वारदात की शिकायत वार्डन तक पहुंचने के बाद उन्होंने तुरंत यह समय बदलकर हॉस्टल से निकलने का समय पांच बजे और लौटने का समय छह बजे कर दिया. यानी अगर कोई लड़की हॉस्टल के अंदर है तो वह पांच बजे के बाद बाहर नहीं जा सकती थी और अगर बाहर है तो किसी भी हाल में उसे छह बजे से पहले वापस लौटना जरूरी था. ऐसा न होने पर उसकी अटेंडेंस न लगाने और घर पर भी शिकायत भेजे जाने का डर दिखाया गया.

यहां पर इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि इसी विश्वविद्यालय के बॉयज हॉस्टलों का हाल कुछ ऐसा है कि कोई भी कभी भी आए-जाए या न आए कोई पूछने वाला नहीं है. असुरक्षा के बाद यह गैर बराबरी दूसरी वजह थी जिसने लड़कियों को यह अगले दिन सुबह छह बजे से विरोध प्रदर्शन करने को प्रेरित किया.

22 सितंबर

अगले दिन त्रिवेणी हॉस्टल में रहने वाली 300 से ज्यादा लड़कियां सुबह छह बजे से सुरक्षा और बराबरी की मांग करते हुए विश्वविद्यालय के लंका गेट पर इकट्ठी हो गईं. इस प्रदर्शन में उनका साथ देने के लिए यूनिवर्सिटी के ही कुछ लड़के भी शामिल थे. केवल नारेबाजी और पोस्टरों के सहारे चल रहे इस आंदोलन में छात्राओं की एक ही मांग थी कि कुलपति (वीसी) आएं और उन्हें संबोधित करें. लड़कियों का कहना है कि कुछ होता या न होता लेकिन वीसी आकर केवल सुरक्षा और समानता का आश्वासन भी दे जाते तो यह आंदोलन खत्म हो जाता.

दिन बीतता गया. 11 बजे के बाद कुछ और छात्र सक्रिय हो गए और चलती हुई क्लासें छोड़कर आंदोलन में शामिल हो गए. दोपहर तक लंका गेट पर आंदोलन करने वाले छात्रों की संख्या करीब सात-आठ सौ के पार हो गई. इनमें अब भी लड़कियों की संख्या ज्यादा थी. पहले दिन आंदोलन का हिस्सा रहे ज्यादातर छात्र बताते हैं कि इस दौरान केवल चीफ-प्रॉक्टर सिर्फ आश्वासन देने के लिए दो बार चक्कर लगाने आए जिन्हें छात्राओं ने यह कहकर लौटा दिया कि वे केवल वीसी से ही बात करना चाहती है. वहीं वीसी साहब का कहना था कि दस लड़कियों का एक दल आकर उनसे बात करे वे आंदोलन में लड़कियों को संबोधित करने नहीं जाएंगे.

दोपहर दो बजे के बाद लंका गेट के आसपास पुलिस की घेराबंदी शुरू हो गई क्योंकि तब तक आंदोलन करने वाले छात्रों की संख्या ढाई हजार के पार पहुंच चुकी थी. इस समय तक यह आंदोलन न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर चर्चा बटोरने लगा था. आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं स्वाति (बदला हुआ नाम) बताती हैं, ‘उस दिन का आंदोलन पूरी तरह शांति से गुजर गया था हालांकि इस दौरान कुछ अलग-अलग डिपार्टमेंट्स के डीन और प्रोफेसर हमारे आंदोलन को दूर से देखने आए थे.’ छात्रों का मानना है कि सुनवाई न करने के अलावा प्रशासन की तरफ से आंदोलन को कमजोर करने की यह दूसरी कोशिश थी. स्वाति बताती हैं, ‘मुझे खासतौर पर याद है कि लॉ विभाग से कुछ लोग आए थे और वो किसी एकता नाम की लड़की को ढूंढ़ रहे थे.’

शाम को कुछ छात्रों का एक समूह वीसी के पास ज्ञापन देने पहुंचा लेकिन न तो वीसी उनसे मिले और न ही कोई और उनकी बात सुनने को तैयार हुआ. चीफ प्रॉक्टर ने छात्रों को इतना कहकर लौटा दिया कि वे कुछ भी कर लें, कल मोदी जी बनारस आ रहे हैं इसलिए उनका जो भी होगा पीएम के जाने के बाद ही होगा. यह बताते हुए बिरला हॉस्टल के कुछ छात्र यह आरोप भी लगाते हैं कि यूनिवर्सिटी में नियुक्त हुए ज्यादातर लोग या तो वीसी के खास हैं या उनकी सिफारिश से यहां पर हैं. उनके मुताबिक यही कारण है कि फाइन आर्ट्स और सोशल साइंस के कुछेक प्रोफेसरों को छोड़कर किसी ने इस आंदोलन का समर्थन करना तो दूर, जिक्र करना तक ठीक नहीं समझा.

23 सितंबर

रात भर करीब 50 छात्र-छात्राएं लंका गेट पर विरोध करते हुए बैठे रहे. इस दौरान पुलिस पूरे समय तैनात रही. शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के आने की वजह से प्रशासन कुछ ज्यादा ही चुस्त था. प्रदर्शन करने वालों की गिनती देर तक नहीं बढ़ी क्योंकि त्रिवेणी जो छह गर्ल्स हॉस्टलों का कैंपस है उसका मुख्य द्वार सुबह 10 बजे तक खोला ही नहीं गया. बीएचयू में बीकॉम फाइनल इयर के छात्र और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय सदस्य राजीव बताते हैं कि वे और उनके कुछ साथी नवीन हॉस्टल के गेट पर खड़े थे और वार्डन अनुराधा सिंह सारी लड़कियों को सख्त हिदायत दे रही थीं कि अगर हॉस्टल की एक भी लड़की विरोध प्रदर्शन में नजर आई तो ठीक नहीं होगा. अब इस ठीक नहीं होगा का मतलब लड़कियों को ही समझना था. ऐसा ही कुछ हाल यमुना और कावेरी हॉस्टल का था. वहां पर जो लड़कियां बाहर थीं वे बाहर रह गईं लेकिन जो अंदर आ गई थीं उन्हें वार्डन ने बाहर निकलने की परमिशन ही नहीं दी. बताया जा रहा है कि इसके लिए उनके साथ जोर-जबरदस्ती भी की गई.

महिला महाविद्यालय (एमएमवी), जो कि बीएचयू का ही हिस्सा है, की लड़कियों को एक नई बात पता चली. वह यह कि जिस हॉस्टल और कॉलेज की जिस नियमावली पर उन्होंने एडमिशन के वक्त दस्तखत किए थे उसमें साफ लिखा हुआ था कि एमएमवी की कोई भी छात्रा किसी भी तरह के आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकती. ज्यादातर लड़कियों को इस बात का पता ही नहीं था कि जो विरोध वे अब तक कर रहीं थीं, उन्हें उसका अधिकार ही नहीं है. इस तरह एमएमवी की लड़कियां दूसरे दिन विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से रोक दी गईं.

जैसे-तैसे करके बाकी हॉस्टलों की लड़कियां लंकागेट पर एक बार फिर इकट्ठी हुईं और प्रदर्शन फिर शुरू किया गया. करीब 200 से ज्यादा लड़के भी उनका साथ देने के लिए वहां थे. आशा बताती हैं, ‘कई बार ऐसा होता था कि जहां पर 20-25 लड़के खड़े होते थे और उनके आस-पास लड़कियां नहीं होती थीं पुलिस लाठी लेकर उनकी तरफ बढ़ने लगती थी. फिर जैसे ही हम बीच में आ जाते वह पीछे हट जाती थी.’ बाहरी लड़कों के आंदोलन में शामिल होने के सवाल पर वे कहती हैं, ‘दोपहर के वक्त कुछ लोग आए और कहने लगे कि वे आंदोलन का समर्थन करने आए हैं.’ वे कुछ नाम भी लेती हैं जिस पर बिरला हॉस्टल में रहने वाले एक छात्र कहते हैं, ‘बीएचयू कैंपस में चार दिन बिताने वाले भी जानते हैं कि ये सभी कितने बड़े गुंडे हैं और वीसी के कितने करीबी हैं.’ उनके मुताबिक इनमें से एक तो वीसी का चहेता होने का फायदा उठाकर कैंपस में हमेशा बाहरी लड़कों को लाते हैं और उत्पात मचाते हैं. इस छात्र के शब्दों में ‘उस दिन भी ये आंदोलन में सिर्फ इस बात की पहचान करने आए थे कि वो कौन सी लड़कियां हैं जो इसे लीड कर रहीं हैं जिससे बाहर मिलने पर इन्हें सबक सिखाया जा सके.’

इन्हीं लोगों के चलते पहले दिन आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं स्वाति और कुछ और लड़कियों को सुरक्षा कारणों से हॉस्टल भेज दिया गया. स्वाति बताती हैं, ‘आंदोलन के दूसरे दिन ही न्यूज चैनल और सोशल मीडिया पर खबरें चल रही हैं कि ये वामपंथी ताकतों द्वारा खड़ा किया गया आंदोलन हैं. असल में पहले दिन उनके साथ आंदोलन कर रही जिस एकता सिंह को लॉ फैकल्टी एक दिन पहले ढूंढ़ते हुए आई थी, वह खुद एबीवीपी से थी. बाद में उसे डरा-धमकाकर उससे माफीनामा लिखवा लिया गया. इसके बाद टीवी डिबेट और तमाम जगहों पर वह गड्ड-मड्ड बातें कहती नजर आई.’ राजीव बताते हैं कि एबीवीपी का कोई बड़ा नेता इस आंदोलन को समर्थन देने नहीं आया, वहीं आइसा या एनएसयूआई कभी बीएचयू में इतनी प्रभावशाली रहे ही नहीं कि अपने दम पर 100 लोगों को भी इकट्ठा कर सकें. वे कहते हैं, ‘हां, आंदोलन में सभी पार्टियों के समर्थक थे लेकिन वो किसी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं बल्कि बीएचयू का छात्र होने के कारण इसमें शामिल होने आए थे.’

आशा, स्वाति और ज्यादातर छात्र इस बात पर सहमत नजर आते हैं कि बीएचयू में हर विरोध कुचलने के लिए एक ही तरीका अपनाया जाता है, इसके लिए कुछ लोगों को बुलाकर इतना डराया-धमकाया जाता है कि वे न खुद आवाज उठाते हैं न दूसरे को उठाने देते हैं. इन छात्रों के मुताबिक यहां एक साथ 70-70 लोगों को रस्टिकेट करने की भी घटनाएं हुई हैं. छात्रों का यह भी कहना है कि 10 लड़कियों का प्रतिनिधिमंडल भेजने वाली वीसी की बात वे इसीलिए नहीं मान रहे थे. एक छात्र कहते हैं, ‘10 लड़कियों को बुलाकर कमरे में बिठाकर डराना-धमकाना कहीं आसान है. यहां सैकड़ों लड़कियों के सामने आकर बात करने की वीसी की हिम्मत ही नहीं थी.’ दुर्घटना की शिकार लड़की की एक और सहपाठी बिना अपना नाम बताए कहती हैं, ‘यह आंदोलन किसी भी राजनीतिक विचारधारा का था ही नहीं वरना इतने लोग एक साथ आकर कभी इकट्ठे ही नहीं हो सकते थे, और लड़कियां तो बिल्कुल भी नहीं. वे केवल बराबरी और सुरक्षा की मांग के लिए ही इतने खतरे उठाकर प्रदर्शन करने आईं थीं. उन्हें न वामपंथ समझ आता है न दक्षिण पंथ.’ वे आगे जोड़ती हैं, ‘लेकिन वीसी लड़कियों की सुरक्षा के बजाए लड़कियों से अपनी सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित थे, तभी तो लाठीचार्ज करवा दिया.’

रात को हुए लाठी चार्ज के बारे में बताते हुए राजीव कहते हैं, ‘आंदोलन प्रशासन की राजनीति का शिकार हो चुका था, वह दिन तो बीत गया था लेकिन यह तय था कि अगले एक-दो दिन से ज्यादा अब यह चलने वाला नहीं है. फिर रात को तो वैसे भी ज्यादातर लड़कियां वापस चली जाती हैं. इसलिए करीब 100 लोग लंकागेट पर बैठे रहे और हम करीब 50-60 लोग वीसी के घर का घेराव और नारेबाजी करने के लिए बढ़े.’ राजीव का कहना है कि वे केवल वीसी के घर तक पहुंच ही पाए थे, घेराबंदी या नारेबाजी तो शुरू भी नहीं हुई थी कि पुलिस आ गई और उसने बिना किसी चेतावनी के लाठी भांजना शुरू कर दिया. लड़कियों पर भी पुलिस कॉंन्स्टेबलों ने लाठियां बरसाईं.

बीए फर्स्ट इयर की एक छात्रा का कहना है कि त्रिवेणी में तो पुलिस कुछ इस तरह लाठियां भांजती हुई घुसी कि लड़कियों को अपने हॉस्टल में ही नहीं कमरों के दरवाजे भी बंद करके छिपना पड़ा. इस दौरान अपनी एक साथिन का जिक्र करते हुए वे बताती हैं कि उसके चेहरे पर लाठी पड़ी और गाल फट गया है. वे बताती हैं, ‘उसे इतनी गहरी चोट आई है कि उसका दाग शायद उम्र भर उसके चेहरे पर रहेगा.’ आशा कहती हैं, ‘हमें जी भर के पीटने के बाद पुलिस रात भर लाउडस्पीकर पर यह चिल्लाती रही कि शूट एट साइट का ऑर्डर है, कोई भी बाहर नजर आया तो गोली मार दी जाएगी. ऐसी ही एक चेतावनी वे लाठी बरसाने के पहले भी दे सकते थे.’

फिलहाल सर्व विद्या की राजधानी में छात्रों से भिड़ने के लिए पुलिस के साथ-साथ सीआरपीएफ के जवान भी तैनात हैं. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सबको दो अक्टूबर तक छुट्टी दे दी है. सारे हॉस्टल जबरन खाली करवा लिए गए है. यमुना-गोमती-गंगा ही नहीं बिरला-ए और राजाराम जैसे कुख्यात बॉयज हॉस्टल भी सुनसान हो गए हैं. जो लड़के-लड़कियां आसपास के शहरों के थे, वे अपने घर को निकल चुके हैं. बाकी बनारस में रहने वाले अपने रिश्तेदारों या लॉज-होटलों की शरण में जा रहे हैं. इसके बाद भी जो बचे हैं, वे बस्ता बांधे हॉस्टल में बैठे ये सोच रहे हैं कि महामना के चेहरे पर कालिख मलने की तो केवल अफवाह उड़ी थी, ऐसा कुछ हुआ नहीं फिर भी महामना की रंगत बदली हुई क्यों लग रही है...आंदोलन खत्म हो चुका है, राजनीति जारी है.