कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा भारतीय जनता पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष भी हैं. साथ ही अगले कुछ महीनों में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी. इतना ही नहीं वे मानकर चल रहे हैं कि प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री भी वही बनने वाले हैं.

इसका सबूत है उनका ताज़ा बयान. हाल ही में उन्होंने कहा, ‘उत्तर कर्नाटक के लोग चाहते हैं कि मैं इस क्षेत्र की ही किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ूं. लिहाज़ा मैंने तय किया है कि इस बार बागलकोट या विजयपुरा में से किसी एक सीट से इस बार चुनाव लड़ूंगा.’ इसके आगे उन्होंने कहा, ‘इसका (उत्तर कर्नाटक से चुनाव लड़ने का) मतलब यह होगा कि अगर इस क्षेत्र से कोई नेता राज्य का मुख्यमंत्री बनता है तो इलाके का विकास तय है.’ इसके बाद उन्होंने कुछेक स्वाभाविक सी घोषणाएं कीं. जैसे-मुख्यमंत्री बनने के 24 घंटे के भीतर चार-पांच अहम सरकारी दफ्तार बेलगावी में बने सुवर्ण विधानसभा भवन (बेंगलुरू में मुख्य विधानसभा के अलावा) में स्थानांतरित कर दिए जाएंगे. और सरकार बनने के तीन दिन के भीतर कांग्रेस की मौज़ूदा सिद्धारमैया सरकारी की नाक़ामी साबित करने वाले सभी दस्तावेज़ ज़ारी कर दिए जाएंगे.

येद्दियुरप्पा का यह बयान कोई पहली बार नहीं है. वे पहले भी ऐसे बयान दे चुके हैं जिन्हें पढ़-सुनकर शायद ही किसी को उनके भरोसे पर संदेह हो, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को है. और राज्य में पार्टी की सफलता पर अपना संदेह येद्दियुरप्पा और प्रदेश के अन्य ज़िम्मेदार नेताओं के सामने अमित शाह ज़ता भी चुके हैं. यह पिछले महीने का वाक़या है. उस वक्त अमित शाह कर्नाटक के तीन दिन के दौरे पर थे. उस दौरान उन्होंने पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं की बैठकें लीं. बताते हैं कि इन्हीं से एक बैठक में येद्दियुरप्पा ने उनके सामने भी भरोसा ज़ताया था कि भाजपा राज्य के अगले चुनाव में 225 सीटों (एक मनोनीत सदस्य मिलाकर) में 150 तक सीटें जीत सकती है. लेकिन अमित शाह ने उन्हें टोका. अपने स्तर पर कराए गए तीन सर्वे के नतीजे बताए और कहा, ‘आज की स्थिति में आप 80 सीटें भी नहीं जीत पाएंगे.’

बताते हैं कि फिर अमित शाह ने वे तमाम जगहें भी गिनाईं जहां पार्टी को समस्या का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही सीधे सवाल दागे. सूत्रों के मुताबिक उन्होंने पूछा, ‘राज्य की कांग्रेस सरकार का भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए आपने क्या किया अब तक? सरकार के ख़िलाफ कितने धरना-प्रदर्शन किए? कितनी रैलियां कीं?’ इसके बाद शाह का कहना था कि कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ बहुत से मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं जिन्हें जनता के सामने ले जाया जा सकता है. लेकिन इन मुद्दों पर पार्टी का प्रदर्शन या तो बेहद लचर है या एकदम ठंडा. बताया जाता है कि फिर अमित शाह ने अपनी शैली में सीधी चेतावनी ज़ारी की. कोर कमेटी की बैठक में मौज़ूद दिग्गजों से उन्होंने कहा, ‘मुझे नतीज़े दिखने चाहिए. किसी भी हालत में राज्य में भाजपा की सरकार बननी चाहिए. आप नतीज़े दीजिए या रास्ता छोड़िए. नहीं तो मुझे कोई कार्रवाई करनी पड़ेगी.’

बाहर के सर्वे भी अमित शाह की आशंका को मज़बूत कर रहे हैं

अमित शाह की आशंका को मज़बूती देने का काम सिर्फ पार्टी के अंदरूनी सर्वे नहीं हैं. बाहरी एजेंसियों की ओर से किए गए सर्वे भी ऐसे ही निष्कर्षों पर पहुंच रहे हैं कि भाजपा की हालत फिलहाल तो कर्नाटक में कमज़ोर है. उदाहरण के लिए द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने हाल ही में मार्केट रिसर्च एजेंसी सी-फोर के एक सर्वे के नतीज़े प्रकाशित किए थे. इसमें बताया गया था कि भाजपा ही नहीं कर्नाटक में जद-एस (जनता दल सेकुलर) भी जनसमर्थन के अभाव के संकट से जूझ रही है. इस सर्वे के मुताबिक अगले चुनाव में भाजपा को विधानसभा की महज़ 60 से 72 सीटें ही मिल पाएंगी. जबकि जद-एस को 24 से 30 के बीच. वहीं कांग्रेस आसानी से बहुमत के लिए ज़रूरी 113 सीटों का अाकड़ा पार कर लेगी. उसे 120 से 132 तक सीटें मिल सकती हैं. इस सर्वे में 10 अगस्त तक की स्थिति को शामिल किया गया था.

शायद यही कारण है कि राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया दावा करते हैं कि भाजपा उनकी सरकार को नहीं गिरा सकती. लोग भाजपा को वोट नहीं देंगे. हाल ही में उनका कहना था, ‘अमित शाह उत्तर प्रदेश में सफल हो गए होंगे. लेकिन मेरी सरकार को नहीं हटा सकते. हम कोई बच्चे नहीं हैं. कर्नाटक में चुनाव जीतना उतना आसान नहीं है कि जितनी आसानी से आपने (केंद्र सरकार ने) आयकर विभाग को कुछ कांग्रेसी नेताओं पर छापा मारने का आदेश दे दिया. उनकी बंटवारे की राजनीति यहां नहीं चलेगी. कर्नाटक में 150 सीटें जीतने का भाजपा का लक्ष्य पूरा होना नामुमकिन है.’

भाजपा की रणनीतियां भी लगातार उल्टी पड़ रही हैं

यानी अमित शाह के साथ ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अगर भाजपा की सफलता पर संदेह है तो यह एकदम ग़लत भी नहीं है. ख़ुद भाजपा की कर्नाटक इकाई ने अपनी आड़ी-तिरछी रणनीतियों के चलते इस धारणा को मज़बूत किया है. मिसाल के तौर पर दलितों को लुभाने की गरज से येद्दियुरप्पा ने दलित समुदाय के किसी सदस्य के घर पर भोजन का सिलसिला शुरू किया. तीन-चार महीने पहले की बात है. येद्दियुरप्पा इस क्रम में तुमकुरू के एक दलित के घर भाेजन करने गए. लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया. क्योंकि ख़बरों के मुताबिक समाज के उच्च तबके लिंगायत से आने वाले येद्दियुरप्पा के लिए वहां एक होटल से अलग से खाना मंगवाया गया था. कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के दलित नेताओं ने इसके लिए उन्हें निशाने पर ले लिया और इसके बाद भाजपा को कई दिनों तक सफाई देनी पड़ी.

फिर येद्दियुरप्पा ने क़रीब 33 दलित परिवारों को अपने बेंगलुरु स्थित घर पर बुलाकर खाना खिलाया. लेकिन उनकी यह कोशिश भी दलित समुदाय को लुभाने में ज़्यादा सफल हुई, ऐसा लगता नहीं है. यहां बताते चलें कि कर्नाटक की कुल क़रीब छह करोड़ की आबादी में दलितों की तादाद लगभग एक करोड़ (क़रीब 24 फीसदी) बताई जाती है. यह समुदाय परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देता रहा है. इसीलिए भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए जो जातीय समीकरण बनाए हैं उनमें उसने दलितों को सबसे ज़्यादा अहमियत दे रखी है. हालांकि अब तक इस समुदाय की ओर से उसके लिए कोई विशेष सकारात्मक संकेत तो दिखाई नहीं दिए हैं.

दूसरी बात कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार के ख़िलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा. इस पर भी भाजपा अब तक बड़ा अांदोलन नहीं खड़ा कर पाई है. अमित शाह की फटकार के बाद बीते महीने की शुरुआत में उसने मेंगलुरू चलो रैली आयोजित की. लेकिन सिद्धारमैया सरकार ने इसकी हवा निकाल दी. उसने उल्टा येद्दियुरप्पा के ही भ्रष्टाचार के मामले खोल दिए. भ्रष्टाचार जो कथित तौर पर उनके मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था. इसके बाद दौड़े-भागे से भाजपा नेता राज्यपाल के पास पहुंचे. उन्हें बताया कि राज्य सरकार ने एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) को येद्दियुरप्पा के ख़िलाफ जांच सौंपकर ग़लत किया है. उन्होंने साथ ही उच्च न्यायालय में भी ग़ुहार लगाई. अदालत ने एसीबी जांच पर सवाल उठाते हुए येद्दियुरप्पा के साथ भाजपा को भी थोड़ी राहत दी. उसने येद्दियुरपा के ख़िलाफ कार्रवाई पर अगले आदेश तक रोक लगा दी.

कांग्रेस की रणनीति सधी हुई दिखती है

वहीं भाजपा की तुलना में कांग्रेस की रणनीति ज़्यादा सधी हुई दिखती है. इसकी एकदम ताज़ा मिसाल है 25 सितंबर को कलबुरागी में हुई रैली. राज्य के असरदार लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्ज़ा देने की मांग के समर्थन में हुई इस रैली में सिद्धारमैया सरकार के तीन-चार मंत्री मौज़ूद थे. यहां दो-तीन बातें ग़ौर करने की हैं कि लिंगायत भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग है. दूसरा- लिंगायत को अलग धर्म बनाने की मांग का भाजपा ने अब तक खुला समर्थन नहीं किया है. और तीसरा- इस समुदाय की मांग का मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ख़ुलकर समर्थन कर चुके हैं. यानी सीधे तौर पर कहा जाए तो वे भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं.

दूसरी तरफ कांग्रेस अपना दलित-पिछड़ा वोट बैंक बचाए रखने का प्रयास करते हुए भी दिखती है. मसलन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कुरुबा (पिछड़े) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. इसलिए पार्टी ने प्रदेश इकाई की कमान दलित समुदाय से आने वाले जी परमेश्वरा काे सौंपी. पार्टी में एक और कद्दावर नेता एसआर पाटिल लिंगायत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. वे प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार थे लेकिन पार्टी ने नई व्यवस्था के तहत उन्हें उस उत्तर कर्नाटक क्षेत्र का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया जहां लिंगायत समुदाय का असर ज़्यादा है. राज्य के दो ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों में से एक आर गुंडूराव के पुत्र दिनेश गुुंडूराव को दक्षिण कर्नाटक का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. वहीं वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले नेता डीके शिवकुमार को प्रचार अभियान समिति की कमान दी गई है

यही नहीं, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया लगातार जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि चुनावी फायदे के मद्देनज़र भाजपा ओर उसके अध्यक्ष अमित शाह राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही पार्टी की ओर से अपने नेताओं को बताने का प्रयास किया जा रहा है वे भाजपा में जाएंगे तो उन्हें वहां इस्तेमाल करने के बाद किनारे कर दिया जाएगा. इन रणनीतियों के साथ ही सिद्धारमैया सरकार प्रशासनिक जमावट भी चुनाव को ध्यान में रखकर कर रही है इस तरह की ख़बरें आ रही हैं. अभी अगस्त में बेंगलुरू के पुलिस आयुक्त प्रवीण सूद का तबादला इसी क़वायद का हिस्सा माना जा रहा है. यानी हर तरफ से चाक-चौबंद इंतज़ाम.

फिर भी येद्दियुरप्पा के दावे अपनी जगह जस के तस हैं. ऐसा ही एक दावा है, ‘मुख्यमंत्री बना तो सिद्धारमैया को जेल की सलाखों के पीछे भेज दूंगा.’ पर सवाल तो यही है कि क्या वे अगले मुख्यमंत्री बन पाएंगे?