क्या ऐसा अक्सर नहीं होता कि चर्चा भगत सिंह की छिड़े और बात थोड़ी आगे बढ़ते ही गांधी तक जा पहुंचती हो? लेकिन ऐसी कितनी ही चर्चाएं प्रायः एक ऐसे मोड़ पर खत्म होती देखी जाती हैं, जहां महज 23 साल के नौजवान भगत सिंह की अद्भुत शहादत का गुमान और एक बूढ़े गांधी द्वारा उसे बचाए न जा सकने की शिकायत एक साथ मौजूद होती है.

भगत सिंह पर बनाई गई बंबइया फिल्में हों या सोशल मीडिया पर युवाओं की जोशीली अभिव्यक्तियां, कई बार गांधी इनमें एक नकारात्मक भूमिका में देखे-दिखाए जाते हैं. इतना तक कि मानो भगत सिंह के नायकत्व के बरक्स असली खलनायक ब्रिटिश हुकूमत न होकर गांधी ही हों. यही वजह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के साथ भारी छेड़छाड़ के इस विचित्र दौर में ‘भगतसिंह बनाम गांधी’ के इस प्रचलित नैरेटिव का एक तटस्थ मूल्यांकन किया जाना जरूरी हो जाता है.

भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बाद उनके समर्थकों के आक्रोश पर महात्मा गांधी की क्या राय थी?

24 मार्च, 1931 के दिन या भगत सिंह को फांसी दिए जाने की अगली सुबह गांधी जैसे ही कराची (आज का पाकिस्तान) के पास मालीर स्टेशन पर पहुंचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. स्वयं गांधीजी के शब्दों में, ‘काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे.’ 26 मार्च को कराची में प्रेस के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा - ‘मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा सका और इसी कारण नौजवानों ने मेरे प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन किया है. ...ये युवक चाहते तो इन फूलों को मेरे ऊपर बरसा भी सकते थे या मुझ पर फेंक भी सकते थे, पर उन्होंने यह सब न करके मुझे अपने हाथों से फूल लेने की छूट दी और मैंने कृतज्ञतापूर्वक इन फूलों को लिया. बेशक, उन्होंने ‘गांधीवाद का नाश हो’ और ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगाए और इसे मैं उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूं.’

लेकिन इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आगे कहा था- ‘आत्म-दमन और कायरता से भरे दब्बूपने वाले इस देश में हमें इतना अधिक साहस और बलिदान नहीं मिल सकता. भगत सिंह के साहस और बलिदान के सामने मस्तक नत हो जाता है. लेकिन यदि मैं अपने नौजवान भाइयों को नाराज किए बिना कह सकूं तो मुझे इससे भी बड़े साहस को देखने की इच्छा है. मैं एक ऐसा नम्र, सभ्य और अहिंसक साहस चाहता हूं जो किसी को चोट पहुंचाए बिना या मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाए.’

अहिंसा को जीवन साधना और लक्ष्य मानने वाले गांधी तो मृत्युदंड के ही विरोधी थे

भगत सिंह को फांसी से बचाने में गांधी के विफल रहने के बारे में प्रचलित धारणाओं को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. अहिंसा के साधक गांधी किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सजा देने के विरोधी रहे थे. भगत सिंह से पहले उन्होंने अन्य मामलों में भी किसी को भी मृत्युदंड दिए जाने का विरोध किया था. उच्च कोटि के आस्तिक गांधी यह मानते थे कि किसी की जान लेने का हक केवल उसे ही है जिसने वह प्राण दिया है. यानी प्रकृति का नियम या ईश्वर ही किसी की जान ले सकता है, न कि कोई मनुष्य, सरकार या मनुष्य द्वारा बनाई कोई व्यवस्था.

26 मार्च, 1931 को कराची अधिवेशन में भगत सिंह के संदर्भ में ही बोलते हुए उन्होंने कहा था- ‘आपको जानना चाहिए कि खूनी को, चोर को, डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के विरुद्ध है. इसलिए इस शक की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती कि मैं भगत सिंह को बचाना नहीं चाहता था.’ इस सभा में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. दीवान चमनलाल जो नौजवान भारत सभा के सचिव थे, वे तो गांधी के अन्यतम सहयोगियों में से ही थे और वहां भी उनके साथ ही थे. इतने संवेदनशील और भावुक माहौल में भी गांधी पूरे होश में और पूरी करुणा से अपनी बात रख रहे थे.

तभी किसी ने चिल्लाकर पूछा- ‘आपने भगत सिंह को बचाने के लिए किया क्या?’

इस पर गांधी ने जवाब दिया- ‘मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया. मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी. भगत सिंह की परिवारवालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन यानी 23 मार्च को सवेरे मैंने वाइसराय को एक खानगी (अनौपचारिक) खत लिखा. उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी थी. पर सब बेकार हुआ.’

भगत सिंह को बचाने के लिए वाइसराय को लिखी उस अनौपचारिक चिट्ठी में गांधीजी ने उन्हें जनमत का वास्ता देते हुए लिखा था- ‘जनमत चाहे सही हो या गलत, सजा में रियायत चाहता है. जब कोई सिद्धांत दांव पर न हो तो लोकमत का मान रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है. ...मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद तो वह कदम वापस नहीं लिया जा सकता. यदि आप यह सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि इस सजा को, जिसे फिर वापस नहीं लिया जा सकता, आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें. ...दया कभी निष्फल नहीं जाती.’

भगत सिंह के बचपन के एक साथी जयदेव गुप्ता जो उस सभा में मौजूद थे, उन्होंने बाद में लिखा कि ‘उस सभा का वातावरण मिश्रित प्रकार का था. लोग दो धड़ों में बंट गए थे. एक धड़ा गांधी के पक्ष में था और दूसरा विरोध में. लेकिन महात्मा गांधी इतने अद्भुत वक्ता थे कि उन्होंने अपनी तार्किक बातों, मीठी आवाज, शांत और मृदुल अंदाज से सबको यह भरोसा दिला दिया कि भगत सिंह को बचाने की जितनी कोशिश की जा सकती थी वह की गई.’

लेकिन तब भी और आज भी एक ऐसा वर्ग है जो मानता है कि संयोगवश उसी दौरान एक अन्य संदर्भ में हो रहे गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की रिहाई भी एक शर्त के रूप में डाली जा सकती थी. गांधी ने इसका जवाब देते हुए इसी सभा में कहा था- ‘आप कहेंगे कि मुझे एक बात और करनी चाहिए थी— सजा को घटाने के लिए समझौते में एक शर्त रखनी चाहिए थी. ऐसा नहीं हो सकता था. और समझौता वापस ले लेने की धमकी को तो विश्वासघात कहा जाता. कार्यसमिति इस बात में मेरे साथ थी कि सजा को घटाने की शर्त समझौते की शर्त नहीं हो सकती थी. इसलिए मैं इसकी चर्चा तो समझौते की बातों से अलग ही कर सकता था. मैंने उदारता की आशा की थी. मेरी वह आशा सफल होने वाली नहीं थी, पर इस कारण समझौता तो कभी नहीं तोड़ा जा सकता.’

इससे करीब दो महीने पहले 31 जनवरी, 1931 को भी इलाहाबाद में गांधी कह चुके थे- ‘जिन कैदियों को फांसी की सजा मिली है, उन कैदियों को फांसी नहीं मिलनी चाहिए. पर यह तो मेरी निजी राय है. इसे समझौते की शर्त बना सकते हैं या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता.’

ऐसा नहीं था कि भगत सिंह के क्रांतिकारी आदर्शों को गांधी समझते न थे. किसानों और मजदूरों के प्रति भगत सिंह और उनके साथियों की प्रतिबद्धताओं से गांधी बखूबी वाकिफ थे. लेकिन इस बारे में वे एकदम स्पष्ट और सख्त थे कि उसका साधन केवल और केवल अहिंसा ही होनी चाहिए. विशेषकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों की ओर इशारा करते हुए गांधी ने कराची अधिवेशन में कहा था- ‘उन नौजवानों से मैं यह जरूर कहूंगा कि उनके पैदा होने के बहुत पहले से मैं किसानों और मजदूरों की सेवा करता आया हूं. मैं उनके साथ रहा हूं. उनके सुख-दुःख में भाग लिया है. जबसे मैंने सेवा का व्रत लिया है, तभी से मैं अपना सिर मानवजाति को अर्पण कर चुका हूं.’

वहीं जब भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में भयंकर दंगे छिड़ गए, तो इस संदर्भ में गांधीजी ने कहा- ‘अखबारों से पता चलता है कि भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए, और भगत सिंह के सम्मान में दुकान न बंद करनेवालों को धमकाने लगे. नतीजा आपको मालूम ही है. मेरा विश्वास है कि अगर भगत सिंह की आत्मा कानपुर के इस कांड को देख रही है, तो वह अवश्य गहरी वेदना और शरम अनुभव करती होगी. मैं यह इसलिए कहता हूं कि मैंने सुना है कि वह अपनी टेक का पक्का था.’

भगत सिंह को फांसी मिलने के एक महीने पहले जब गांधी वाइसराय से मिलने गए थे, तब भी उन्होंने भगत सिंह की सजा मुल्तवी करने की मांग की थी. बिड़ला द्वारा इस मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर 18 फरवरी, 1931 को गांधी ने कहा था- ‘मैंने उनसे भगत सिंह की बात की. ...मैंने भगत सिंह के बारे में कहा, वह बहादुर तो है ही पर उसका दिमाग ठिकाने नहीं है, इतना जरूर कहूंगा. फिर भी मृत्युदंड बुरी चीज है. क्योंकि वह ऐसे व्यक्ति को सुधरने का अवसर नहीं देती. मैं तो मानवीय दृष्टिकोण से यह बात आपके सामने रख रहा हूं और देश में नाहक तूफान न उठ खड़ा हो, इसलिए सजा मुल्तवी कर देने का इच्छुक हूं. मैं तो उसे छोड़ दूं, लेकिन कोई सरकार उसे छोड़ देगी ऐसी आशा मुझे नहीं है.’

दरअसल भगत सिंह के बारे में ब्रिटिश हुकूमत शुरू से ही गलतफहमियों का शिकार थी. क्रांतिकारियों के तौर-तरीकों के बारे में यह गलतफहमी उस दौरान भारतीयों के एक बड़े वर्ग में भी मौजूद थी. ऊपर-ऊपर से हिंसक दिखनेवाले तौर-तरीकों की वजह से ब्रिटिश हुकूमत इन इन्कलाबियों के प्रति बेहद सख्त रवैया अपनाए हुई थी. गांधी समेत अन्य कई नेता इन युवाओं के जोश से प्रभावित अवश्य थे, लेकिन इनके तौर-तरीकों की वजह से वे इनसे परहेज भी करते थे. इसलिए जेल में भगत सिंह अपने, और साथियों के साथ दुर्व्यवहार के विरुद्ध जब अनशन पर बैठ गए और जवाहरलाल नेहरू ने उनकी पैरवी की थी, तो गांधी ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर इसे एक ‘असंगत’ कार्य बताया था.

भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति ब्रिटिश हुकूमत पैरानोइया की हद तक भयभीत हो चुकी थी. और इसलिए सरकारी गुप्तचर उन सभी के पीछे पड़े हुए थे जिनके बारे में उन्हें थोड़ा सा भी लगता था कि इन्हें भगत सिंह से सहानुभूति हो सकती है. इनमें नेहरू, पटेल और मालवीय से लेकर तेजबहादुर सप्रू तक थे. माना जाता है कि भगत सिंह की फांसी के बाद ब्रिटिश इंटेलिजेंस को यह देखने तक के लिए लगाया गया था कि इस पर गांधी, नेहरू और पटेल इत्यादि की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया क्या थी.

लेकिन अंतिम अवस्था तक आते-आते गांधी को भगत सिंह के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति हो चली थी. जब भगत सिंह को तय समय से एक दिन पहले ही फांसी दिए जाने की खबर मिली तो गांधी काफी देर के लिए मौन में चले गए थे. 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह की फांसी के संबंध में दिए गए अपने वक्तव्य में गांधी ने कहा था- ‘भगत सिंह और उनके साथी फांसी पाकर शहीद हो गए हैं. ऐसा लगता है मानो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है. इन नवयुवक देशभक्तों की याद में प्रशंसा के जो शब्द कहे जा सकते हैं, मैं उनके साथ हूं. ...मेरा निश्चित मत है कि सरकार द्वारा की गई इस गंभीर भूल के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्त करने की हमारी शक्ति में वृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने मृत्यु का वरण किया है.’

भगत सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए गांधी ने 29 मार्च, 1931 को गुजराती नवजीवन में लिखा था- ‘वीर भगत सिंह और उनके दो साथी फांसी पर चढ़ गए. उनकी देह को बचाने के बहुतेरे प्रयत्न किए गए, कुछ आशा भी बंधी, पर वह व्यर्थ हुई. भगत सिंह को जीवित रहने की इच्छा नहीं थी; उन्होंने माफी मांगने से इनकार किया. यदि वे जीते रहने को तैयार होते, तो या तो वह दूसरों के लिए काम करने की दृष्टि से होता या फिर इसलिए होता कि उनकी फांसी से कोई आवेश में आकर व्यर्थ ही किसी का खून न करे. भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन वे हिंसा को भी धर्म नहीं मानते थे. वे अन्य उपाय न देखकर खून करने को तैयार हुए थे. उनका आखिरी पत्र इस प्रकार था : ‘मैं तो लड़ते हुए गिरफ्तार हुआ हूं. मुझे फांसी नहीं दी जा सकती. मुझे तोप से उड़ा दो, गोली मारो.’ इन वीरों ने मौत के भय को जीता था. इनकी वीरता के लिए इन्हें हजारों नमन हों.’

हालांकि अहिंसा के पुजारी गांधी हमेशा ही चेताते रहे कि तमाम शहादत और नेकनीयती के बावजूद जांबाज क्रांतिकारियों के हिंसामार्ग का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन न हो. वैसे भी, यदि लाला लाजपत राय की मौत का बदला और लाहौर षड्यंत्र केस की छाया न पड़ती, तो भगतसिंह की वैचारिकी का स्तर अपने समय के महानतम विचारकों को जाकर छूता था. महज बीसेक साल का एक नौजवान जिसके हृदय में मनुष्यमात्र की अंतिम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी के लिए छटपटाहट थी. और वह क्रांतिकारी जवानी ही क्या जिसकी आध्यात्मिकता की शुरुआत प्रचंड नास्तिकता से न होती हो? इसलिए यदि भगतसिंह स्वयं जीते रहते, तो गांधी का इतना बुरा न मानते. ठीक वैसे ही, जैसे सुभाषचंद्र बोस ने अंत तक महात्मा गांधी के प्रति श्रद्धा रखी. भगतसिंह की क्रांतिकारिता को समझने के लिए जिस स्तर की करुणा हमें चाहिए होगी, शायद वैसी ही करुणा गांधी की स्थिति को समझने के लिए हममें समानुभूति भी पैदा करेगी.