आज लगातार तीसरे दिन भी बारिश जारी है. बांध का जलस्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगा है. 70 साल के शांति लाल अपने घर के आंगन में एक टपकती हुई बरसाती के नीचे बैठे हैं. उनकी नज़रें एकटक पानी के उस विस्तार को निहार रही हैं जो धीरे-धीरे उनकी दहलीज़ की ओर बढ़ा आ रहा है. बांध के इस पानी ने उनके घर को एक ऐसे टापू में बदल दिया है जिसके तीनों ओर पानी ही पानी है. यह पानी अगर दो-तीन फुट भी और बढ़ा तो शांति लाल के घर को भी लील लेगा. वे बेहद मायूसी से अपनी तबाही को अपनी ओर बढ़ता देख रहे हैं. उनके पास इस तबाही से बच निकलने के कोई विकल्प नहीं हैं. पूंजी के नाम पर उनके पास ले-देकर उनका यह घर ही है, लेकिन इसके डूब क्षेत्र में आने के बावजूद भी सरकार से उन्हें न तो कोई मुआवजा मिला है और न ही कोई जमीन.

मध्यप्रदेश के धार जिले के निसरपुर गांव में ऐसी दुर्दशा सिर्फ शांति लाल की ही नहीं बल्कि सैकड़ों अन्य लोगों की भी है. लगभग 28 सौ परिवारों को समेटे हुए निसरपुर अब एक गांव से कस्बा होने ही लगा था कि सरदार सरोवर बांध ने उसकी इस यात्रा पर पूर्ण विराम लगा दिया. इस परियोजना के चलते डूब क्षेत्र में आने वाला यह सबसे बड़ा गांव है. निसरपुर के साथ ही मध्य प्रदेश के कुल 193 गांव इस परियोजना के चलते डूब क्षेत्र में आ गए हैं. लेकिन परियोजना के उद्घाटन हो जाने और बांध में पानी भर दिए जाने के बावजूद भी इनमें से शायद ही कोई गांव हो, जहां सौ प्रतिशत लोगों का पुनर्वास कर दिया गया हो.

स्थितियां ऐसी बन पड़ी हैं कि लोगों के घरों में पानी भरने लगा है लेकिन फिर भी वे गांव छोड़कर जाने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसा कई कारणों से है. मसलन कुछ लोगों को जमीन आवंटित हुई है तो मुआवजा नहीं मिला है, कुछ को जमीनों का आवंटन सिर्फ कागजों पर ही हुआ है, कुछ को ऐसी जगह जमीनें दी गई हैं जिनमें मकान बनाना संभव ही नहीं, कुछ को विस्थापन के नाम पर कुछ भी नहीं दिया गया है और कुछ मामले ऐसे भी हैं जहां एक ही प्लाट तीन-तीन परिवारों को आवंटित कर दिया गया है. इन तमाम तरह की गड़बड़ियों से जूझ रहे लोगों की आपबीती को समझने की शुरुआत वहीं से करते हैं जहां से सरदार सरोवर बांध के चलते नर्मदा घाटी में पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

इतिहास

बात 1961 की है. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने तब नर्मदा पर एक बांध का उद्घाटन किया था. इसके कुछ समय बाद तय हुआ कि नर्मदा पर 129 मीटर ऊंचा एक विशाल बांध बनाया जाए ताकि इस नदी का अधिकतम उपयोग किया जा सके. गुजरात राज्य के लिए ये बेहद महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन मध्य प्रदेश को इस पर आपत्ति थी क्योंकि ऐसा होने पर उसका बड़ा हिस्सा डूब क्षेत्र में आ रहा था और बड़ी जनसंख्या इससे प्रभावित हो रही थी. राज्यों के बीच बन रहे इस तनाव के समाधान के लिए एक ट्रिब्यूनल का गठन किया गया. इस ट्रिब्यूनल ने साल 1979 में अपना फैसला दिया जिसके छह साल बाद यानी 1985 में सरदार सरोवर बांध का काम शुरू हो गया.

यहीं से ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए)‘ का हस्तक्षेप भी इस परियोजना में शुरू हुआ. पर्यावरण के साथ ही कई अहम मुद्दों के आधार पर एनबीए ने इस परियोजना का विरोध शुरू किया. इसी का नतीजा था कि साल 1993 में वर्ल्ड बैंक ने इस परियोजना से अपने हाथ पीछे खींच लिए. कुछ समय बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा. न्यायालय ने इस परियोजना को हरी झंडी तो दे दी लेकिन साथ ही गुजरात और मध्य प्रदेश सरकार को यह निर्देश भी दिए कि सभी प्रभावितों का संतोषजनक पुनर्वास किये बिना परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. लेकिन इन निर्देशों का पालन आज तक नहीं हो सका. लिहाजा अब जब गांवों में पानी भरने लगा है, तब भी लोग अपने घर छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं.

धीरे-धीरे बढ़ता बांध का पानी | फोटो : राहुल कोटियाल
धीरे-धीरे बढ़ता बांध का पानी | फोटो : राहुल कोटियाल

नर्मदा घाटी में पुनर्वास की प्रक्रिया 90 के दशक में शुरू हुई. उस वक्त लोगों को उनके डूब रहे खेतों के बदले पैसे दिए गए. एनबीए के कार्यकर्ता राहुल यादव बताते हैं, ‘इस नीति से सिर्फ उन लोगों को फायदा हुआ जिनकी अधिकारियों से व्यक्तिगत पहचान थी क्योंकि उन्हें उनकी जमीनों के अच्छे दाम मिल गए. लेकिन अधिकतर लोगों की जमीनें सरकार ने कौड़ियों के भाव अधिग्रहित कर ली.’ इस तरह की नीति का जमकर विरोध हुआ जिसके दबाव में सरकार ‘विशेष पुनर्वास अनुदान’ लेकर आई. लेकिन इसमें भी सरकार ने एक शर्त तय कर दी. अनुदान के पात्र सिर्फ वही लोग हो सकते थे जिन्हें उनकी जमीनों के लिए पांच लाख से कम मुआवजा मिला था.

इस शर्त के चलते कई लोग तो ‘विशेष पुनर्वास अनुदान’ पाने की पात्रता से ही बाहर हो गए. बहूती गांव के साधु राम बताते हैं, ‘मेरी 17 एकड़ जमीन डूब क्षेत्र में चली गई. इसके लिए मुझे सिर्फ दस लाख 18 हजार मुआवजा मिला. जबकि उस जमीन की कीमत करोड़ों में होगी.’ साधू राम की तरह ही नर्मदा घाटी के कई अन्य बड़े काश्तकार भी ‘विशेष पुनर्वास अनुदान’ की पात्रता से बाहर हो गए जबकि उनकी दर्जनों एकड़ जमीन डूब क्षेत्र में आ गई थी.

लेकिन पुनर्वास में असल धांधलेबाजी होन अभी बाकी था. इसकी शुरुआत ‘विशेष पुनर्वास अनुदान’ की बंदरबांट के साथ शुरू हुई. इस अनुदान के अनुसार सभी पात्रों को 5.58 लाख रुपये बतौर मुआवजा दिया जाना तय हुआ. लेकिन इसमें भी एक शर्त थी. शर्त यह थी कि इस धनराशि का आधा हिस्सा ही पहली क़िस्त में लोगों को दिया जाएगा. और बाकी बचे रुपये उन्हें सिर्फ तभी मिल सकेंगे जब वे पहली क़िस्त के पैसों से पांच एकड़ जमीन खरीद कर अपने नाम रजिस्ट्री करवा लें. राहुल यादव बताते हैं, ‘इस शर्त के चलते दलालों की मौज आ गई. इतने कम दामों पर पांच एकड़ जमीन मिलना असंभव था. लेकिन मुआवजा लेने के लिए जरूरी था कि लोग जमीन की खरीद दिखाएं. इस बात का फायदा दलालों ने उठाया और लोगों की फर्जी रजिस्ट्री करवाने लगे.’

बड़वानी जिले के पिछौड़ी गांव में रहने वाले हरिदा राम भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं जिन्होंने दलालों के बहकावे में आकर फर्जी रजिस्ट्री करवाई थी. वे बताते हैं, ‘विशेष पुनर्वास अनुदान की शर्त के अनुसार मैं उस दौर में जमीन की तलाश में था. मैंने सारी जगह खोज लिया लेकिन इतने कम दामों पर कहीं जमीन नहीं मिली. तब पास के ही बाज़ार के एक सुनार ने मुझे बताया कि वो मुझे जमीन दिलवा देगा और अनुदान की दूसरी क़िस्त भी मुझे मिल जाएगी. वो मुझे अपने साथ कचहरी ले गया और उसने जमीन की रजिस्ट्री करवा दी. इसके आधार पर मुझे अनुदान की दूसरी क़िस्त तो मिल गई लेकिन कुल 5.58 लाख रुपयों में से 85 हजार उसी दलाल ने रख लिए.’

हरिदा राम की ही तरह हजारों अन्य लोगों ने अनुदान लेने के लिए फर्जी रजिस्ट्री करवाई और अनुदान की रकम का बड़ा हिस्सा दलालों को दिया. इसका खुलासा तब हुआ जब नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने यह मामला उठाया और इसकी जांच के लिया ‘झा आयोग’ का गठन किया गया. आयोग ने पाया कि 1358 लोगों ने फर्जी रजिस्ट्री करवाई हैं. लेकिन नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि सैकड़ों लोग झा आयोग के सामने कभी गए ही नहीं. दलालों के फेर में फंसे इन लोगों में से अधिकतर आज पूरी तरह भूमिहीन हो चुके हैं. इसे देखते हुए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ऐसे लोगों को 15-15 लाख रुपये का मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं.

दुकान डूब गई है सो कैमुद्दीन सड़क किनारे दुकान चला रहे हैं | फोटो : राहुल कोटियाल
दुकान डूब गई है सो कैमुद्दीन सड़क किनारे दुकान चला रहे हैं | फोटो : राहुल कोटियाल

जिस दौरान पुनर्वास की प्रक्रिया ‘विशेष पुनर्वास अनुदान’ और इसमें हुई धांधलियों की जांच में उलझ कर रह गई थी, उस दौरान मध्य प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही कि सौ प्रतिशत लोगों का पुनर्वास पूरा हो चुका है. मेधा पाटकर बताती हैं, ‘साल 2008 से 2016 तक लगातार सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में बाकायदा शपथपत्र देते हुए यह झूठ दोहराया कि सभी लोगों का पुनर्वास हो चुका है. अंततः बीती फरवरी में जाकर सरकार यह मानने को तैयार हुई कि 681 परिवारों का पुनर्वास अब भी बाकी है. जबकि यह आंकड़ा भी सही नहीं है क्योंकि अभी हजारों परिवार मुआवजे से वंचित हैं.’

सरदार सरोवर बांध से प्रभावित हुए ग्रामीणों की सीधी सी मांग थी कि उन्हें जमीन के बदले जमीन और घर के बदले घर दिए जाएं. लेकिन उनकी यह मूलभूत मांग भी सरकार आज तक पूरी नहीं कर सकी है. यही कारण है कि गांवों में पानी भरने के बावजूद भी लोग अपने घर नहीं छोड़ पा रहे हैं. ये लोग जिन तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें एक-एक कर समझते हैं:

जमीनें तो मिलीं लेकिन किसी काम की नहीं

सरदार सरोवर बांध से मध्य प्रदेश के 193 गांवों के लाखों लोग प्रभावित हुए हैं. लेकिन इनमें से बमुश्किल साढ़े पांच हजार लोगों को ही उनकी ‘जमीन के बदले जमीन’ आवंटित की गई. अन्य सभी लोगों को उनकी जमीनों के बदले पैसे दिए गए या अभी दिए जाने हैं. लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी लोगों को उनकी जमीन की तुलना में बेहद कम पैसे मिले. कई प्रभावित तो ऐसे भी हैं जिन्हें यह पैसे भी नहीं मिले और वे आज भी न्यायालयों और प्राधिकरणों के चक्कर काट रहे हैं.

जमीन के बदले जमीन पाने वाले कुल साढ़े पांच हजार लोगों में से अधिकतर वे हैं जिन्हें गुजरात में जमीनें आवंटित की गईं. कुकरा गांव के रहने वाले मनोज सिंह सोलंकी भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं. उन्हें 1994 में गुजरात में पांच एकड़ जमीन आवंटित हुई थी. लेकिन इस आवंटन के 23 साल बाद भी मनोज वहां जाकर नहीं बसे हैं. वे बताते हैं, ‘विस्थापन नीति के अनुसार हमें उपजाऊ और सिंचित जमीन मिलनी चाहिए थी. लेकिन वो जमीन न तो उपजाऊ थी और न ही सिंचित. उसमें खेती संभव नहीं थी. हम लोग सिर्फ खेती पर ही निर्भर हैं. वो भी नहीं कर पाएंगे तो कैसे रहेंगे. इसलिए गुजरात जाकर नहीं बस सके और आज भी यहीं रह रहे हैं.’

कुकरा गांव के ही रहने वाले जालम सिंह बताते हैं, ‘जो जमीनें हम लोगों को आवंटित हुईं उनमें हर बरसात पानी भर जाता है. न हम लोग वहां खेती कर पाते हैं और न ही वह जमीन किसी और काम की है. वह जमीन कितनी उपयोगी है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अगर हम वो जमीन किराए पर देते हैं तो पूरे पांच एकड़ जमीन का सालाना किराया पांच हजार रुपये से ज्यादा नहीं मिलता.’ खेती की जमीन के अलावा इन लोगों को आवासीय जमीन भी आवंटित की गई थी. इसके बारे में राधे श्याम केवट बताते हैं, ‘जो आवासीय प्लाट हमें आवंटित हुए उनमें काली मिट्टी है. उस मिट्टी पर मकान बनाते हैं तो कुछ ही सालों में दीवारों पर दरारें आने लगती हैं. मेरे भाई घनश्याम केवट ने मकान बनाया था लेकिन वो पूरा मकान ही जर्जर हो चुका है.’

इन लाखों बांध प्रभावितों में से सिर्फ 53 लोग ही ऐसे हैं जिन्हें उनकी जमीनों के बदले मध्य प्रदेश में ही जमीनें आवंटित की गई हैं. लेकिन इनमें भी अधिकतर लोग आवंटित की गई ज़मीनों पर जाकर बसने की स्थिति में नहीं हैं. पिछौड़ी गांव (जिला बड़वानी) के रहने वाले रेम सिंह इड़ा बताते हैं, ‘मुझे दो साल पहले धार जिले में पांच एकड़ जमीन आवंटित हुई थी. लेकिन आज तक मुझे उस जमीन पर कब्ज़ा नहीं मिल सका है. उस जमीन पर उसी गांव के लोगों का कब्ज़ा है और वो मुझे उस पर खेती नहीं करने देते. वो खुलेआम धमकी देते हैं कि मर जाएंगे लेकिन ये जमीन नहीं छोड़ेंगे.’ नर्मदा बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ता बताते हैं कि जिन 53 लोगों को उनकी जमीन के बदले जमीन आवंटित हुई हैं उनमें से लगभग 30 लोग ऐसे हैं जिनकी जमीनों पर या तो दबंगों का कब्ज़ा है या वो इतनी संकरी हैं कि उन पर अच्छी खेती संभव ही नहीं. इसीलिए ये तमाम लोग आज भी अपने मूल गांवों में ही रहने को मजबूर हैं.

केवट, मछुआरों, व्यापारियों और अन्य भूमिहीनों की स्थिति

विस्थापन नीति में यह शर्त थी कि गांवों में पानी भरने से कम-से-कम छह महीने पहले ही सभी लोगों का पुनर्वास हो जाना चाहिए. लेकिन मध्य प्रदेश में यह स्थिति है कि डूब के कगार पर पहुंच चुके गांवों में लोग अब भी अपने हकों के लिए जूझ रहे हैं. बांध का जो पानी गांवों में भरने लगा है, उसी में बैठकर कर ग्रामीण जल-सत्याग्रह कर रहे हैं. ‘जहां जमीन डूबी हमारी-पानी मछली कैसे तुम्हारी’ जैसे नारे गांव-गांव में गूंज रहे हैं. नर्मदा बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ता राजा बताते हैं, ‘डूब क्षेत्र में आने वाले लोगों में से लगभग 60 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं. इनमें कुम्हार, केवट, मछुआरे और छोटे व्यापारियों जैसे सभी लोग शामिल हैं. लेकिन इनके व्यवसायिक पुनर्वास के नाम पर सरकार ने कुछ भी नहीं किया. सरकार की मंशा है कि बांध बन जाने के बाद मछलियां निकालने और नावों का ठेका बड़े व्यापारियों को सौंप दिया जाए. ऐसे में यहां के स्थानीय केवट और मछुआरे तो अपनी आजीविका से हाथ धो बैठेंगे. ‘जहां जमीन डूबी हमारी-पानी मछली कैसे तुम्हारी’ का नारा सरकार की इसी मंशा के खिलाफ लगता है.’

पिछौड़ी गांव के रहने वाले मछुआरे मडिया नत्तु कहते हैं, ‘हमारी कमाई पहले के मुकाबले आधी हो गई है. पानी और बढेगा तो हमारा धंधा और मंदा हो जाएगा. क्योंकि हमारे पास जो नावें और औजार हैं उनसे हम इतने गहरे पानी में मछलियां नहीं मार सकते.’ गांव छोड़कर न जाने के बारे में मडिया कहते हैं, ‘सरकार से मुझे एक प्लाट और 35 हजार रुपये मिले हैं. आप ही बताइए 35 हजार रुपये में क्या मकान बनाया जा सकता है. हम भूमिहीन लोग हैं. रोज़ मछली मारते हैं और रोज़ अपने खाने भर की जरूरत पूरी कर पाते हैं. कर्ज लेकर अगर मकान बना भी लेंगे तो वो कर्ज उतारेंगे कैसे? हमारा तो घर के साथ ही व्यवसाय भी डूब रहा है.’

प्रभावित क्षेत्रों में कई छोटे व्यापारी तो ऐसे भी हैं जो बांध बनने के चलते सड़क पर आ चुके हैं. निसरपुर में रहने वाले कैमुद्दीन इसका जीता-जागता उदाहरण हैं. बीते कई दशकों से वो निसरपुर बाज़ार में कपड़ों की दुकान चलाया करते थे. लेकिन हाल ही में जब बांध का पानी भरने लगा तो उनकी दुकान भी इसकी चपेट में आकर डूब गई. अब कैमुद्दीन सड़क किनारे एक कपड़ा बिछाकर अपनी दुकान चला रहे हैं. वे कहते हैं, ‘व्यवसायिक नुक्सान के लिए मुझे सरकार से कुछ नहीं मिला. एक प्लाट जरूर सरकार ने मेरे मकान के बदले दिया है लेकिन वो इतने गड्ढे में है कि उसे भरने में ही मकान बनाने जितना खर्चा होगा. इतना पैसा मेरे पास नहीं है. इसलिए सड़क किनारे बैठने को मजबूर हूं.’

गांव के अधिकतर भूमिहीन अपने रोजगार के लिए अन्य गांववालों पर निर्भर हैं. कोई बड़े काश्तकारों के खेत में मजदूरी करता है तो कोई छोटी-मोटी दुकान चलाता है. ऐसे लोग गांव छोड़कर जाने को इसलिए भी तैयार नहीं हैं कि इनके रोजगार की सारी संभावनाएं गांव छोड़ते ही लगभग ख़त्म हो जाएंगी. ऐसे ही भूमिहीन ग्रामीण कैलाश मंग्तिया कहते हैं, ‘गांव में हमारी सालों की जान-पहचान है तो हमें काम मिल जाता है. यहां से जाएंगे तो काम कौन देगा. ऊपर से सरकार ने इतना मुआवजा भी नहीं दिया आवंटित प्लाट में मकान बना सकें. इसलिए आज भी गांव में रहने को मजबूर हैं. पानी की डूब से डर कर अगर गांव छोड़ भी दें तो हम कर्ज में डूबकर मर जाएंगे.’

प्रभावितों के व्यवसायिक पुनर्वास के लिए बीती जुलाई में मध्य प्रदेश सरकार ने नौ सौ करोड़ के अतिरिक्त पैकेज की घोषणा की है. यह भी सरकार को तब दबाव में करनी पड़ी जब मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने लगातार 17 दिनों तक अनशन किया. इस पैकेज का सरकार जमकर प्रचार-प्रसार कर रही है और राज्य के कई शहरों को इसके विज्ञापनों से पाट दिया गया है. लेकिन इसके धरातल पर उतरने की गुंजाइश इसलिए बेहद कमज़ोर लग रही हैं कि सरकार खुद पिछले तीन महीनों में 15 से ज्यादा बार इससे जुड़े नियमों में बदलाव कर चुकी है और अलग-अलग आदेश जारी कर चुकी है. ऐसे में ग्रामीण खुद भी यह नहीं जानते कि वे इस पैकेज के पात्र हैं भी या नहीं.

सबकुछ उजाड़ कर जिन्हें अब डूब क्षेत्र से ही बाहर माना जा रहा है:

सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई पहले 121.92 मीटर तय हुई थी. इस ऊंचाई तक मध्य प्रदेश के कुल 177 गांवों के 24,421 परिवार बांध बनने से प्रभावित हो रहे थे. 2014 में मोदी सरकार ने आते ही बांध की ऊंचाई को बढ़ाकर 138.68 मीटर कर दिया. इस नई ऊंचाई के चलते प्रभावित गांवों की संख्या बढ़कर 192 हो गई और कुल प्रभावित परिवारों की संख्या 37,754 हो गई. ये सभी आंकड़े मध्य प्रदेश सरकार के ही थे. लेकिन कुछ समय पहले ही सरकार ने एक नया ही आंकड़ा जारी किया. इस आंकड़े के अनुसार बांध की ऊंचाई बढ़ने के बाद भी प्रभावित गांवों की संख्या सिर्फ 176 और प्रभावित परिवारों की संख्या 21,808 है. ये आंकड़ा पहली ही नज़र में गलत इसलिए भी लगता है कि जब 121.92 मीटर की ऊंचाई पर ही 24,421 परिवार प्रभावित हो रहे थे तो बांध की ऊंचाई लगभग 17 मीटर बढाए जाने के बाद भी प्रभावित परिवारों की संख्या बढ़ने के बजाय घटकर 21,808 कैसे हो सकती है. लेकिन इतनी बड़ी चूक के लिए भी किसी को कटघरे में खड़ा नहीं किया गया, बल्कि इस नए आंकड़े के चलते प्रभावित गांवों में स्थितियां और भी उलझ गईं.

अब कई गांवों में हालात ऐसे हैं कि बिलकुल अलग-बगल के दो घरों में से एक को डूब क्षेत्र में माना जा रहा है जबकि दूसरे को डूब क्षेत्र से बाहर कर दिया गया. गोकुल लाल बताते हैं, ‘मेरे आस-पास के कई घरों में पानी भी भरने लगा है और वो लोग गांव छोड़ के जा चुके हैं. मेरा घर भी तीन तरफ से डूब चुका है. सिर्फ एक पगडण्डी बची है जिससे होकर मैं अपने घर तक पहुंच सकता हूं. थोड़ा भी पानी बढ़ेगा तो ये पगडण्डी भी डूब जाएगी और उसके बाद मेरा घर भी. लेकिन प्रशासन कहता है कि तुम्हारा घर डूब क्षेत्र में नहीं आता.’ अपनी समस्या लेकर जब गोकुल क्षेत्रीय प्रशासन से मिले तो जिस संवेदनहीनता से उन्हें जवाब दिया गया उसके बारे वे कहते हैं, ‘एसडीएम साहब से जब मैंने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने हंसते हुए कहा तू चिंता मत कर. तेरा घर नहीं डूबेगा. और अगर तेरे घर का रास्ता डूब भी गया तो हम तेरे लिए पुल बनवा देंगे.’

निसरपुर के रहने वाले राहुल पाटीदार भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं. वे बताते हैं, ‘सिर्फ निसरपुर हलके में ही करीब 1700 एकड़ जमीन इस बांध के कारण एक टापू में बदल रही है. इसके सारे रास्ते बंद हो रहे हैं. लेकिन प्रशासन इस बारे में मौन है. वे सिर्फ यह कहकर लोगों को टाल देते हैं कि हम पुल बनवा कर तुम्हारी जमीनों तक पहुंचने का इंतजाम कर देंगे.’ राहुल का घर भी अब डूब क्षेत्र से बाहर किया जा चुका है. उनके घर तक पहुंचने की जो एकमात्र गली है, उसके ठीक बाहर ही सरकार ने वह निशान लगाया है जहां तक बांध का पानी पहुंचेगा. यानी सरकार खुद भी यह मानती है कि उनकी गली डूब जाएगी, उनके घर तक पहुंचने के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे, लेकिन फिर भी उन्हें डूब प्रभावित नहीं माना जा रहा.

अन्य समस्याओं के चलते लोग गांवों में ही रहने को मजबूर

कई प्रभावित ऐसे भी हैं जिन्हें खेती की जमीन और आवासीय प्लाट, दोनों ही आवंटित हो चुके हैं लेकिन इसके बाद भी ये लोग गांव छोड़ कर जाने की स्थिति में नहीं हैं. इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अधिकतर लोगों को आवासीय प्लाट उनके खेतों से बहुत दूर आवंटित किये गए हैं. बडवानी जिले के रहने मुन्ना सिंह बताते हैं, ‘विशेष पुनर्वास अनुदान के जरिये मुझे जो पांच एकड़ जमीन मिली वो खरगौन जिले में है. जबकि मुझे आवासीय जमीन बडवानी में ही आवंटित हुई है. इन दोनों जगहों में लगभग सौ किलोमीटर की दूरी है. अब या तो मुझे अपनी वो खेती की जमीन बेचनी पड़ेगी या अपना प्लाट बेचना पड़ेगा. रोज सौ किलोमीटर दूर जाकर तो मैं खेती नहीं कर सकता.’

कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें जमीन और प्लाट एक ही जिले में तो मिले हैं लेकिन इनमें 10-12 किलोमीटर की दूरी है. ऐसे में ये किसान अपने जानवरों को रोज़ इतनी दूर खेती के लिए नहीं लेकर जा सकते. इसलिए जब तक संभव हो अपने ही मूल गांवों में रह रहे हैं. इनके अलावा सैकड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अभी पुनर्वास के नाम पर कुछ भी नहीं मिला है. कुछ महीने पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिए हैं कि जिन प्रभावितों की 25 प्रतिशत से ज्यादा जमीन डूब क्षेत्र में आई है उन्हें 60-60 लाख रूपये बतौर मुआवजा दिया जाए. लेकिन यह मुआवजा गांवों में पानी भरने के बाद भी सब प्रभावितों को नहीं मिल सका है. लिहाजा अपनी जान जोखिम में डालकर भी लोग गांवों में ही रहने को मजबूर हो गए हैं. लोगों में यह भी डर है कि अगर मुआवजा मिलने से पहले वे गांव छोड़ जाते हैं तो फिर उनकी सुनने वाला कोई नहीं होगा. ऐसा कई लोगों के साथ हुआ भी है. जिन भी लोगों ने किसी तरह डूब क्षेत्र से बाहर अपने लिए रहने की व्यवस्था कर ली है, उन्हें 900 करोड़ के हालिया पैकेज का पात्र मानने से सरकार ने इनकार कर दिया है.

प्रभावित क्षेत्र के भूमिहीन लोगों को उनके घरों के बदले एक-एक प्लाट आवंटित किये जाने थे. लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें या तो अब तक यह प्लाट नहीं मिले हैं या उन्हें आवंटित हुए प्लाट कई अन्य लोगों को भी आवंटित कर दिए गए हैं. ऐसे में इन लोगों के लिए विवादित प्लाट पर मकान बनाना संभव ही नहीं है.

इन तमाम गड़बड़ियों के बावजूद भी सरकार यह दावा करते हुए हिचक नहीं रही है कि पुनर्वास का काम पूरा किया जा चुका है. फिलहाल सरदार सरोवर बांध में कुल 129.5 मीटर पानी भरा है. लेकिन बांध की कुल ऊंचाई 138.68 मीटर है और इस ऊंचाई तक पानी का भरा जाना संभव है. यदि हाल-फिलहाल में ही ऐसा होता है तो उन हजारों लोगों के घर भी इस पानी में डूब जाएंगे जिनकी दहलीज़ तक ये पानी पहुंच चुका है और जो अपने सही विस्थापन के लिए सरकार की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं.

सरकार भी ऐसा होने की संभावना को समझ रही है. इससे निपटने के लिए उसने एक व्यवस्था भी कर ली है. करोड़ों रुपये के ठेके देकर जगह-जगह टिनशेड कॉलोनी बनवा ली गई हैं. ऐसी कॉलोनियों का पुनर्वास नीति में कहीं कोई प्रावधान नहीं था. लेकिन ये इसलिए बनाई गई हैं कि अगर अचानक बांध का पानी बढ़ता है तो गांववालों को खदेड़ कर इन 10 बाई 12 के कमरों में ठूंस दिया जाए और इस तरह 100 प्रतिशत लोगों का पुनर्वास पूरा हो जाए.

(ग्राउंड रिपोर्ट का यह पहला भाग उन लोगों की स्थिति बताता है जो विभिन्न कारणों से अपने डूब रहे गांवों में ही रहने को मजबूर हैं. इस रिपोर्ट की अगली कड़ी में सरदार सरोवर बांध के उन प्रभावितों की स्थिति पर चर्चा होगी जो अपना मूल गांव छोड़ कर पुनर्वासस्थलों में बस चुके हैं.)