आपने कांग्रेस पार्टी क्यों छोड़ दी?

राहुल गांधी तो इतने सालों से पता नहीं क्या-क्या छोड़ते आ रहे हैं, मैं पार्टी भी नहीं छोड़ सकता! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि पार्टी की हालत अब ऐसी बची ही नहीं कि मेरे जैसे सदस्य वहां कुछ कर सकें.

लेकिन सुनने में तो यह आया है कि कांग्रेस ने गुजरात में आपको पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने से इनकार कर दिया था इसलिए आपने पार्टी छोड़ी है.

जिस पार्टी की जीत का कोई ठिकाना नहीं, वह भला मुख्यमंत्री क्या बनाएगी! मेरा मतलब कि यह सब झूठा प्रचार है. सीधी बात यह है कि मैं पार्टी की कार्यशैली से असंतुष्ट था.

कांग्रेस में शामिल होते समय आपने सोनिया गांधी से कहा था कि आप पार्टी के लिए हमेशा वफादार बने रहेंगे. फिर आपने अचानक यह वफादारी क्यों खत्म कर दी?

आखिर एक इंसान से जानवरों जैसी आजीवन वफादारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मैं नेता हूं न कि वो, जो वफादारी के लिए ही जाना जाता है.

वाघेला जी, आपके साथ जिन 14 नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी थी, उनमें से 10 भाजपा में शामिल हो चुके हैं. आपने भाजपा में जाने के बारे में नहीं सोचा?

भाजपा ने मुझे कोई अच्छा ऑफर ही नहीं दिया! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मैं कुएं से निकलकर खाई में नहीं गिरना चाहता.

अतीत में नरेंद्र मोदी के साथ आपके रिश्ते टकराव भरे रहे हैं. फिलहाल आपके और उनके कैसे रिश्ते हैं?

(हंसते हुए) हम एक जैसे संस्कारों के साथ बड़े हुए हैं फिर भी हमारे संबंध अक्सर सास-बहू जैसे ही रहे हैं. कब कौन, किस रोल में आ जाए, यह समझना ही बड़ा मुश्किल है, फिर बताया क्या जाए!

बीस साल पहले आप भाजपा से कांग्रेस में आए थे. अब आपने तीसरा मोर्चा बना लिया है. इससे आपकी छवि एक मौकापरस्त नेता की बन गई है. इस बारे में क्या कहेंगे?

देखिये, जिसे आप मौकापरस्ती कह रही हैं, वही तो चुनावों की असली जान है. नीतीश कुमार और मेरे जैसे लोग ही तो भारतीय राजनीति के प्राण हैं. सिर्फ प्रचार करना, चुनाव लड़ना और जीतना, चुनाव का इतना सीमित अर्थ विदेशों में होता होगा. भारत में हमारे जैसे गेम चेंजर ही चुनावों में रोमांच पैदा करते हैं.

आम आदमी पार्टी ने भी गुजरात में चुनाव लड़ने की घोषणा की है. क्याजन विकल्पनाम के अपने नये मोर्चे में आपको शामिल करेंगे?

शायद आपने मोर्चे के संबंध में मेरी बात ध्यान से सुनी नहीं वरना आप यह सवाल ही नहीं करतीं. मैंने कहा था कि इस मोर्चे के जरिये मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीधे तौर पर आलोचना नहीं करूंगा. फिर ऐसे में अरविन्द केजरीवाल को इस मोर्चे में बुलाकर मैं उनका क्या करूंगा!

पाटीदार आंदोलन के संयोजक हार्दिक पटेल को अपने वैकल्पिक मोर्चे में शामिल करने के बारे में आपका क्या विचार है?

वैकल्पिक मोर्चे के लिए मेरे जैसे बिन घर-घाट के नेताओं की कमी थोड़े ही है जो मैं इस चिल्ला-चिल्ली करने वाले कल के हुडदंगी लड़के को मोर्चे में शामिल करूं. मेरा मतलब है कि तीसरे मोर्चे को मेरे जैसे अनुभवी लोगों की जरूरत है, न कि हार्दिक पटेल जैसों की.

सुनने में तो यह भी आ रहा है कि यह मोर्चा भाजपा की शह पर बना है और चुनावों में आप मोर्चे से भाजपा को ही फायदा पहुंचाने वाले हैं. आखिर सच क्या है?

सच तो यही है कि लोग ईवीएम पर बटन दबाएंगे जन विकल्प मोर्चे का, लेकिन वोट सीधे भाजपा के खाते में ही जायेंगे! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह आरोप गलत है. हमारा मोर्चा भाजपा और कांग्रेस दोनों पाटिर्यों से समान दूरी रखेगा.

कुछ समय पहले हुए राज्यसभा के चुनाव में आपने कांग्रेस नेता अहमद पटेल को यह कहकर वोट नहीं दिया था कि आपका वोट बेकार चला जाएगा. लेकिन अहमद पटेल की जीत के बाद क्या अब आपको नहीं लग रहा कि आपका वोट तो फिर भी बेकार ही गया?

थाली के बैंगन का भर्ता बने या आलू के साथ सब्जी, वह खाने के ही काम आता है न! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा, क्योंकि दीया भी बुझने से पहले तेज जलता है. कांग्रेस बुझे हुए दीये जैसी हो चुकी है, जिसमें और तेल डालने का कोई मतलब नहीं.

कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आपने कहा था,जो लोग चुनाव लड़ना तक नहीं जानते, वे पार्टी में बॉस बने बैठे हैं.’ तब आपके निशाने पर कौन था?

क्या आप सच में नहीं जानतीं कि मेरे निशाने पर कौन था? आप देखिये कि अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाने का दबाव, सिर्फ मिडिल क्लास के बच्चों पर ही नहीं होता. युवराज के उदाहरण से आप समझ सकती हैं कि राजनीति में ही सफल होने के दबाव के चलते, लोगों को हंसा सकने के उनके जन्मजात हुनर की कितनी बेकद्री हो रही है. हालांकि राजनीति में इतनी बुरी तरह खर्च होने के बाद भी वे यहां अच्छा कर रहे हैं. लोगों का तरह-तरह से मनोरंजन करके, आधे से ज्यादा सोशल मीडिया पर तो वे अकेले ही राज करते हैं.

अच्छा यह बताइये, आपके हिसाब से कांग्रेस पर सबसे ज्यादा असर किस बात का पड़ा; अहमद पटेल के चुनाव जीतने का या फिर आपके कांग्रेस छोड़ने का?

मेरा और उनका भला क्या मुकाबला. वे खुद गुजरात कांग्रेस के ताबूत की आखिरी कील हैं, जबकि मैं दूसरे ताबूतों के लिए कील बनाने वाला हूं. मेरे नाम के आगे पूर्व मुख्यमंत्री लिखा जाता है, जबकि वे सिर्फ सोनिया जी के राजनीतिक सलाहकार हैं. बतौर सलाहकार उनकी क्या हैसियत है, आप भी बेहतर समझ सकती हैं. वे आज तक पप्पू को तो पास नहीं करा पाए और न ही किसी दूसरे स्कूल में उनके दाखिले के लिए उनकी मां को ही मना सके हैं!

गुजरात विधानसभा चुनाव में आपको कांग्रेस के जीतने की कितनी संभावना लगती है?

चुनाव प्रचार के लिए राहुल गांधी के आते ही पार्टी का सूपड़ा साफ होने की सारी संभावनाएं साफ ही हैं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि अब मैं कांग्रेस की जीत की संभावना को टटोलूं या फिर अपनी पार्टी की जीत को संभव बनाऊं.

एक अंतिम सवाल. क्या आप बता सकते हैं कि फिलहाल आपकी किससे दोस्ती है और आप किसके विरोधी हैं?

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर. मुझे सिर्फ कुर्सी से प्रेम,पर क्या कहें अब खैर...मेरे नाम पर तो भारतीय राजनीति में एक अलग ही वर्ग बनाया जा सकता है.