‘जब जब इस दुनिया का नैतिक तापमान गिरने लगता है.... तब तब एक्टिविस्ट उठ खड़े होते हैं. यदि ऐसा न हो तो समाज का नैतिक बल क्षीण होने लगता है. सिर्फ और सिर्फ एक्टिविस्ट ही सुनिश्चित कर सकते हैं कि समाज का नैतिक कौशल क्षीण न हो.’ दार्शनिक सुंदर सरुक्काई ने अंग्रेज़ी अखबार द हिंदू में एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी के रिश्ते पर अपने एक लेख का अंत इन वाक्यों से किया है.

सुंदर के इन वाक्यों में ध्यान खींचनेवाले शब्द हैं नैतिक तापमान, नैतिक बल और नैतिक कौशल. कौशल की जगह आप चाहें तो क्षमता भी कह सकते हैं. एक्टिविस्ट का सटीक हिंदी अनुवाद अब तक मिल नहीं पाया. एक लम्बे इस्तेमाल के बाद यह हिंदी में दाखिल हो गया है और इसे बाकायदा मान्यता दे दी जानी चाहिए. एक बार कृष्ण कुमार से इस शब्द पर बात हो रही थी. उन्होंने कहा कि एक शब्द इसका प्रतिरूप नहीं हो सकता. क्या इसके लिए भागा दौड़ी करनेवाला का प्रयोग किया जा सकता है?

एक्टिविस्ट वह है जो चप्पल फटकारता हुआ, सड़क पर नारे लगाता, नुक्कड़ सभाओं में भाषण देता हुआ या पुलिस बैरिकेड तोड़ता हुआ दिखलाई पड़ता है. या पुलिस स्टेशन पर किसी की प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए झगड़ता हुआ या राशन कार्ड बनवाने के लिए अनपढ़ लोगों के साथ सरकारी दफ्तर का चक्कर काटता हुआ.

एक्टिविस्ट का कुछ रिश्ता सोचने समझने से है, यह मानना इसलिए कठिन है कि सोचने के लिए स्थिरता चाहिए और वह उसके पास हो ही नहीं सकती. सवाल यह है कि वह क्या करे, किसे अपना विषय बनाए, यह वह कैसे तय करता है? जब ज्ञान निर्माण की क्षमता जो अवकाश से पैदा होती है, उसके पास नहीं तो वह कैसे यह तय कर पाता है कि उसकी सक्रियता इस या उस विषय को लेकर होनी चाहिए?

एक्टिविस्ट को प्रायः अनुत्पादक और इसलिए बेकार माना जाता है. वह जो कर रहा है, उससे क्या कुछ बन रहा है? अक्सर उसकी उपस्थिति उनके लिए परेशानी का सबब है जो खुद को किसी अधिक गंभीर काम में व्यस्त मानते हैं.

केदार नाथ सिंह की कविता ‘एक ठेठ देहाती कार्यकर्ता के प्रति’ की याद आना स्वाभाविक है एक एक्टिविस्ट और के बुद्धिजीवी के बीच के असुविधाजनक रिश्ते को समझने के लिए:

‘वक्त-बेवक्त/वह साइकिल दनदनाता हुआ चला आता है/कई बार मैं झुंझला उठता हूं/उसके इस तरह आने पर/ उसके सवालों और तम्बाकू पर/तिलमिला उठता हूं मैं/ मैं बेहद परेशान हो जाता हू/ उसकी गलत-सलत भाषा/ उसके शब्दों से गिरती धूल / और उसके उन बालों पर/ जो उसके माथे से पूरी तरह उड़ गए हैं.’

यह देहाती कार्यकर्ता अकेले नहीं आता.किसी के साथ जिसे थाने बुलाया गया है. लेकिन, ‘मुझे थाने से चिढ़ है/मैं थाने की धज्जियां उड़ाता हूं/ मैं उस तरफ इशारा करता हूं/जिधर थाना नहीं है/जिधर पुलिस कभी नहीं जाती/मैं उस तरफ इशारा करता हूं.’

असलियत से कवि के विराग पर कार्यकर्ता का व्यंग्य बर्दाश्त करना मुश्किल है, ‘वह धीरे से हंसता है/और मेरी मेज हिलने लगती है/मेरी मेज पर रखी किताबें/ हिलने लगती हैं/मेरे सारे शब्द और अक्षर हिलने लगते हैं.’

यह है एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी का रिश्ता जिसमें हमेशा ही एक्टिविस्ट उसे चुनौती देता मालूम पड़ता है, उसके शब्दों और अक्षरों की सत्ता संदिग्ध हो उठती है. वह पर्याप्त नहीं है, शब्द अपने आप ही कर्म हों, आवश्यक नहीं. उसके लिए अलग से कुछ करने की ज़रूरत होती है. कई बार यह भी ही सकता है कि शब्द की अर्थवत्ता की रक्षा के लिए कर्म की आवश्यकता हो. जिस वक्त बाहर लड़कियों पर लाठी चल रही हो, उस समय अंदर कमरे में बैठकर स्त्रीवादी ही सही, लेकिन कथापाठ शब्द का मज़ाक है. उस समय तो कहानीकार को लड़कियों के साथ मिलकर नारा लगाना ही उचित है.

क्या एक्टिविस्ट खुद बुद्धिजीवी नहीं होते? मेधा पाटकर क्या एक्टिविस्ट हैं, बुद्धिजीवी नहीं? उनके बिना बड़े बांधों पर टिके ऊर्जा और विकास के तर्क को कैसे चुनौती दी जाती? अरुणा रॉय और निखिल दे बुद्धिजीवी क्यों नहीं हैं और क्यों सिर्फ एक्टिविस्ट हैं? साधारण जन के पास सूचना का अधिकार से जनतंत्र का क्या रिश्ता है, इस प्रश्न को विश्वविद्यालयों के लिए विचारणीय किसने बनाया?

ऐसा नहीं कि एक्टिविस्ट सिद्धांत को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते, जैसा सुंदर अपने लेख में कहते हैं. बल्कि इसी वजह से बुद्धिजीवियों के सम्मुख कई बार अतिशय विनम्र भी हो उठते हैं. उन्हें लगता रहता है कि सोचने के लिए जो अवकाश और अध्यवसाय चाहिए, वह उनके पास नहीं. लेकिन क्या यह बात ठीक है? गांधी से व्यस्त एक्टिविस्ट कौन था और उनसे बड़ा बुद्धिजीवी कौन? यही बात नेहरु या भगत सिंह के बारे में कही जा सकती है, या सरोजिनी नायडू या मौलाना आज़ाद के बारे में भी. उनके लेखन के परिमाण को देखकर हम सच में पड़ जाते हैं कि दिन-रात भागते और भांति-भांति के लोगों से मिलते रहने के बाद इतना लिखने का वक्त वे कहां से निकाल लेते थे?

यह भी कहा जा सकता है कि कौन कैसा एक्टिविस्ट है यह उसके लिखे हुए से जाना जा सकता है. जो लिख नहीं सकता वह कैसा एक्टिविज्म करता होगा?

फिर भी एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी के बीच एक दर्जाबंदी है. जब किसी को एक्टिविस्ट कहा जाता है तो यह तारीफ़ है या व्यंग्य, समझने में वक्त लगता है. कुछ बरस पहले की बात है. कुछ विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की चयन समिति के सदस्यों से बात हो रही थी. उन्होंने सरकारी हुक्म पर अपने विवेक के विरुद्ध आनन-फानन में काम निपटा दिया था. यह पूछने पर कि उन्होंने क्यों नहीं सरकारी दबाव का विरोध किया, उनमें से एक ने खीझते हुए कहा, ‘अरे,यार! मैं एक्टिविस्ट नहीं!’ लेकिन उन्हें तो अपने ज्ञान के क्षेत्र का माहिर होने की वजह से बुलाया गया था, एक्टिविस्ट होने के कारण नहीं.समिति के काम में झोल पड़ता देख उसकी बात करना क्योंकर एक्टिविज्म है, समझना मुश्किल था.

उसी प्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् में जब ए के रामानुजन के निबंध तीन सौ रामायण पर बहस के बाद उसे हटाने का निर्णय ले लिया गया, तो उसके एक सदस्य से मैंने पूछा कि उन्होंने इस कदम का विरोध क्यों नहीं किया, चुप क्यों रह गए. उनका उत्तर था कि मैं कहां वाम-दक्षिण के झगड़े में पड़ता! रामानुजन के निबंध का वामपंथ से क्या लेना-देना था, यह वे नहीं समझा सकते थे. वे यह मनाकर संतोष कर रहे थे कि वे एक्टिविस्ट नहीं ,प्रोफ़ेसर हैं. विरोध आदि जताना विद्वानों का काम नहीं है. लेकिन कुछ दिन बाद वे ही तत्कालीन कुलपति के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा ले रहे थे जो आम तौर पर एक्टिविज्म ही माना जाता है.

इस प्रकार जब एक्टिविज्म के बारे में बात की जाती है तो स्पष्ट है कि उसे कुछ हीन माना जा रहा है. लेकिन अभी हाल में अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज ने अपनी नई किताब सेंस एंड सॉलिडेरिटी : झोलावाला इकॉनोमिक्स फॉर एव्रीवन मे कहा है कि अर्थशास्त्री बहुत कुछ सीख सकते है उन झोलावालों से जो कॉरपोरेट मीडिया के लिए मज़ाक और घिन का विषय हैं. ड्रेज़ दुनिया के कुछ बड़े अर्थशास्त्रियों में से एक हैं लेकिन वे खुद भी झोलावाला हैं. वैसे ही जैसे नंदिनी सुंदर बड़ी समाजशास्त्री हैं लेकिन ऐसी झोलावाली हैं कि छत्तीसगढ़ की बस्तर पुलिस उन्हें न सिर्फ गिरफ्तार करना बल्कि मार ही डालना चाहती थी.

ड्रेज ने अपनी इस किताब में लिखा है कि अर्थशास्त्र को अपनी वह धारणा छोड़ देनी चाहिए कि स्वार्थ ही सारी आर्थिक क्रियाओं का प्रेरक है. वे लिखते हैं कि यह एक प्रकार का अंधविश्वास है. उनका यकीन है कि लोग अधिकतर प्रेम, करुणा, सहानुभूति और जनपरकता जैसी भावनाओं से परिचालित होते हैं. उनकी दलील है कि राज्य को भी अपनी नीतियां इन्हीं मानवीय भावनाओं को केंद्र में रखकर बनानी चाहिए.

ऐसा क्यों हो कि प्रेम, करुणा, सहानुभूति या जनपरकता के वकील सिर्फ एक्टिविस्ट हों? बाकी वे हों जो कारोबार करते हैं उस बुद्धि का जो मुक्तिबोध के शब्दों में असंग है?