1949 में दो प्रमुख घटनाएं हुईं - पहली, 1, जनवरी, 1949 को भारतीय रिज़र्व बैंक का राष्ट्रीयकरण हुआ और दूसरी, 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा ने भारत का संविधान पारित किया. आइये, पहली घटना का विस्तार से जिक्र करते हैं.

भारतीय रिज़र्व बैंक का राष्ट्रीयकरण एक बेहद दिलचस्प घटना है. यह दो संस्थाओं के टकराव की भी कहानी है. एक संस्था थी विधानसभा और दूसरी, चुनिंदा शेयरधारकों का वह बैंक जिसकी स्थापना 1935 में हुई. इस घटना का ज़िक्र करने से पहले यह बता देना ज़रूरी है कि जो भी लोग इसमें मुख्य भूमिकाएं निभा रहे थे, वे सब के सब सच्चे देशभक्त थे. उनका नज़रिया जरूर अलग-अलग था, पर हम उनकी आस्था पर संदेह नहीं कर सकते.

भारतीय रिज़र्व बैंक के राष्ट्रीयकरण से पहले हम इसके गठन को समझते हैं. भारत में सबसे पहले बैंकिंग या केंद्रीय बैंक जैसी कोई बात लगभग 250 साल पहले उठी थी. सन 1773 बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने राजस्व बोर्ड के सामने ‘जनरल बैंक ऑफ़ बंगाल एंड बिहार’ का प्रस्ताव रखा. इसके तीन मुख्य उद्देश्य निर्धारित किये गए:

1) विभिन्न जिलों से राजस्व के संकलन को एक जगह रखना

2) एक सिक्के का प्रचलन

3) राजस्व उगाही के वक़्त मुद्रा के प्रवाह को बनाये रखना

कुछ छोटे-मोटे परिवर्तन के साथ उसी साल सितंबर में इस बैंक की स्थापना को ईस्ट इंडिया ने मज़ूरी दे दी. दो साल में ही यह बैंक तो बंद हो गया पर सरकार को इससे काफी मुनाफा हुआ था. 1857 तक तकरीबन 50 छोटे-बड़े बैंक खुले लेकिन इनमें से भी लगभग आधे से ज्यादा बंद हो गए.

बीसवीं सदी की शुरुआत में देश में तीन प्रेसीडेंसी हुआ करती थीं. इनके ज़रिये हिंदुस्तान पर ब्रिटिश हुकूमत चला करती थी. इनके अपने-अपने बैंक थे - बैंक ऑफ़ बंगाल, बैंक ऑफ़ मद्रास और बैंक ऑफ़ बॉम्बे. इन तीनों बैंकों का विलय करके ‘इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया’ बनाया गया.

1931 की गोल मेज़ कॉफ्रेंस में पहली बार ठीक तरह से एक केंद्रीय बैंक की बात उठाई गयी. हिंदुस्तान की तरफ से शिरकत करने वाले एमआर जयकर, बहादुर सप्रू और मिर्ज़ा इस्माइल खान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्रीय बैंक राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रहेगा. तत्कालीन वित्त सचिव, रेजिनल्ड मेंट की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जिसने बैंक के प्रारूप पर विचार किया.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक ऐसे बैंक के गठन की बात कही जो एक निजी शेयरधारकों का बैंक हो. इसके अलावा एक और समिति - लंदन समिति - ने भी इसी तरह के एक निजी बैंक की बात कही. इस बाबत 1933 में एक बिल पेश किया गया, जिसे मार्च, 1934 को मंज़ूरी मिली और इस तरह 1 जनवरी, 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक का गठन हो गया.

शुरुआत में रिज़र्व बैंक को पांच करोड़ की नकद राशि से शुरू किया गया था. इसमें मात्र दो लाख बीस हज़ार रुपये सरकार की तरफ से थे. यह पूरी तरह से एक निजी बैंक था पर इस पर नियंत्रण बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का था.

दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स के प्रोफेसर जी बालचंद्रन ने ‘टुवर्ड्स अ हिंदू मैरिज’ में लिखा है कि पौंड स्टर्लिंग और रुपये की निश्चित विनियम दर से साबित हो जाता है कि अंग्रेज़ सरकार और बैंक ऑफ़ लंदन का इस पर पूरा नियंत्रण था.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई देशों में केंद्रीय बैंकों का राष्ट्रीयकरण शुरू हो चुका था. 1945 में जब बैंक ऑफ़ इंग्लैंड का राष्ट्रीयकरण हुआ, तब हिंदुस्तान में भी आरबीआई के राष्ट्रीयकरण की मुहीम ने ज़ोर पकड़ लिया. फ़रवरी 1947 में हिंदुस्तान की तत्कालीन अंतरिम सरकार ने इस बाबत एक गैर आधिकारिक प्रस्ताव असेंबली में पेश किया और इस पर आरबीआई के विचार मांगे.

उस समय श्री चिंतामणि द्वारकानाथ देशमुख रिजर्व बैंक के गवर्नर थे. श्री देशमुख एक विद्वान् आईसीएस अफसर थे. आज भी प्रशासनिक अधिकारी उनकी फोटो और किये हुए कार्यों के आगे नतमस्तक हो जाते हैं. उन्होंने उस प्रस्ताव को डायरेक्टर्स के सामने रखने से यह कहकर मना कर दिया कि अभी इसका उचित समय नहीं आया है और सरकार को ऐसा कुछ भी करने से पहले गहन चिंतन करना होगा. यहीं से ‘विधायिका बनाम कार्यपालिका’ का पहला द्वंद्व शुरू हो गया.

देश उस समय आज़ादी के मुहाने पर खड़ा था. हर एक नेता का दिल देश-प्रेम की भावना से लबरेज़ था. और हर कोई यही कहता फिर रहा था कि राष्ट्रीयकरण देश की उन्नति के लिए सबसे बड़ा ईंधन हैं. शरत चंद्र बोस, नेता प्रतिपक्ष, भी इसी के पक्षधर थे. जी हां, सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई. वे जब असेंबली में बोलते थे तब जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की भी सांसें रुक जाया करती थीं. उन्होंने असेंबली में राष्ट्रीयकरण पर जब प्रश्न पूछा तब किसी और ने नहीं बल्कि तत्कालीन वित्त सचिव आर्चिबॉल्ड रोलेंड्स ने बात संभाली और जिस बात के लिए देशमुख ने मना किया था, सचिव साहब ने उसके उलट जाकर यह कह डाला कि आरबीआई का राष्ट्रीयकरण बहुत जल्द हो जाएगा.

इस घटना पर विक्टर ह्यूगो का एक वक्तव्य बहुत सटीक है - ‘वह विचार जिसका समय आ गया हो, उसे कोई भी नहीं रोक सकता.

बख्तियार के दादाभाई ने अपनी किताब ‘बैरंस ऑफ़ बैंकिंग’ में इसका ज़िक्र किया है कि हवाओं का रुख़ भांपते हुए वित्त विभाग ने सरकार को चेताया कि अब समय आ गया कि इस मुद्दे पर ठोस कार्यवाही की जाए. सरकार ने भी ज्यादा समय न गंवाते हुए बैंक को राष्ट्रीयकरण के लाभ और हानि से अवगत कराने को कहा. देशमुख साहब इन दिनों बीमार थे. उनकी ग़ैर मौज़ूदगी में डिप्टी गवर्नर ट्रेवोर ने कमान संभाली और सरकार को नपा-तुला जवाब भेजा जो इस प्रकार था - ‘ सरकार को दो कारण ऐसे लगते हैं जो राष्ट्रीयकरण की वजह हैं. एक तो यह कि सरकार सोचती है कि बैंक उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है जिनको पूरा करने के लिए उसे बनाया गया है. और दूसरा यह कि आने वाले समय में बैंक सरकार की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पायेगा.’ आगे लिखा गया - ‘ऐसा नहीं है. बैंक ने पहले भी अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है और आगे भी सरकार की वित्त संबंधी सभी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभाने की क्षमता रखता है.’ ट्रेवोर आगे लिखते हैं, ‘...राष्ट्रीयकरण करना अभी जल्दबाज़ी होगी और जब तक हिंदुस्तान की सरकार अपना संविधान लागू नहीं करती, तब तक ऐसा न किया जाए.’

दूसरे विश्व युद्ध की वजह से बदले हुए हालात में सरकार धीरे-धीरे अपना मन बना रही थी और बैंक को अपनी ज़मीन खिसकती हुई नज़र आ रही थी.

वित्त विभाग ने 25 जनवरी, 1947 में आरबीआई को तलब किया और इसकी अन्वेषण शाखा और बैंक के विचार मांगे. इस बार कमान श्री चिंतामणि द्वारकानाथ देशमुख के ही हाथों थी और यही सरकार की सबसे बड़ी चिंता का कारण था. उन्होंने 31 जनवरी को अपने जवाब में कहा कि राष्ट्रीयकरण की बात अनौपचारिक रूप से सेंट्रल बोर्ड की समिति के समक्ष रखी गयी थी और उन्हें नहीं लगता कि इस पर समिति से कोई राय मांगी जाये. वे इसकी भी ज़रूरत नहीं समझते हैं कि इसे बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सामने रखा जाए क्योंकि अभी तक सरकार की भी राष्ट्रीयकरण जैसे वृहद विषय पर कोई मज़बूत विचारधारा नहीं है. अगर फिर भी सरकार को लगता है कि इस पर बात की जाए, तो वे इसे मीटिंग में बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सामने रख देंगे और सरकार द्वारा नामित डायरेक्टर्स वहां अपनी बात रख सकते हैं.

रिज़र्व बैंक की अपनी अन्वेषण शाखा ने काफ़ी दमदार नोट पेश किया था. वह कुछ इस तरह था – ‘बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और आरबीआई के राष्ट्रीयकरण की परिस्थितियां भिन्न हैं. इंग्लैंड में सरकार के पास एक ठोस प्लान है और यहां अभी तो पूरी तरह से आज़ाद भी नहीं हुए हैं. सरकार सिर्फ़ अपनी मंशाओं को पूरा करने के लिए इसे अपने अधीन कर लेना चाहती है.’ इस दलील पर बैंक ने दूसरे राउंड में बाज़ी मार ली और यह मुद्दा असेम्बली में नहीं उठा. सरकार के पास यक़ीनन कोई मज़बूत प्लान नहीं था.

अभी देशमुख साहब ने मुश्किल से 30 दिन भी चैन से नहीं गुज़ारे थे कि फरवरी 1947 में मुस्लिम लीग के विधायक, मौलवी तमीजुद्दीन खान, ने असेम्बली में रिज़र्व बैंक को सरकार के अधीन कर देने का प्रस्ताव पेश कर दिया. उनका ये मानना था कि देश की सबसे बड़ी वित्तीय संस्था कुछ शेयरधारकों के हाथ की कठपुतली नहीं हो सकती और आगे चलकर देश को इससे ख़तरा हो सकता है. ईस्ट इंडिया कंपनी का दिया हुआ ज़ख्म अभी भरा कहां था?

उनके प्रस्ताव को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों का ज़बरदस्त समर्थन था पर आरबीआई को अपनी कार्य प्रणाली पर जिस शख्स की सबसे ज़्यादा आलोचना झेलने पड़ी वह थे - मनु सूबेदार. उनकी डिग्रियां पढ़कर ही अच्छे-अच्छों को पसीना आ जाए - बीएससी, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (मानद), बैरिस्टर, प्रोफ़ेसर अर्थशास्त्री, कई राज्यों के वित्तीय सलाहकार, मेंबर इंडियन मर्चेंट्स मेंबर आदि. बक़ौल मनु सूबेदार रिजर्व बैंक तब तक किसी वित्तीय प्रणाली या वित्तीय मानक को स्थापित करने में असफल रहा था.

बैंक पर हुए हमले को इस बार संभालने वाले थे केजी अंबेगांवकर - वित्त विभाग के संयुक्त सचिव जो आगे चलकर आरबीआई के पांचवे गवर्नर बने - और नवाबज़ादा लियाकत अली खान जो अंतरिम सरकार में वाणिज्य मंत्री थे और बाद में पकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने.

दोनों ने तमीजुद्दीन को भरोसा दिलाया कि सरकार बैंक के राष्ट्रीयकरण के लिए प्रतिबद्ध है और वो उनके प्रस्ताव को गंभीरता पूर्वक लेंगे. फिर कुछ दिनों बाद लियाकत साहब ने बजट के भाषण के दौरान यह घोषणा कर दी कि काफी सोच-विचार के बाद वे इस नतीजे पर पहुचे हैं कि राष्ट्रीयकरण अब देश की ज़रूरत है और रिज़र्व बैंक का राष्ट्रीयकरण होकर ही रहेगा.

अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ और पहले वित्त मंत्री श्री शनमुखम ने श्री देशमुख को आग्रह किया कि वे आरबीआई के राष्ट्रीयकरण पर निजी विचार दें क्योंकि देश के पहले बजट सत्र में इस पर चर्चा होगी. देशमुख ने एक बार फिर से अपने विचार बड़े ही सधे और स्पष्ट तरीके से रखे. उन्होंने कहा कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की बैंक के मौजूदा प्रारूप को ही बनाए रखा जाए या इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया जाये. बात समय की है और बैंक के स्वरुप की है कि उसे किस तरह देश की अर्थव्यवस्था में फिट किया जाए. वे आगे कहते हैं कि प्रारूप कैसा भी हो, इतना ज़रूर होना चाहिए कि बैंक को आपातकाल के समय देश की सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि अगर बैंक का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ तो ये उददेश्य पूरे नहीं होंगे.

इन सबके बीच सितंबर, 1948 में तत्कालीन वित्त मंत्री केसी नियोगी ने संसद में रिज़र्व बैंक एक्ट के संशोधन से जुड़ा एक बिल पेश किया जो अगले दिन ध्वनिमत से पारित हो गया और फिर 1 जनवरी, 1949 को रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (टांसफर टू पब्लिक ओनरशिप) एक्ट के तहत एक सरकारी संस्था के रूप में परिवर्तित हो गया.

आरबीआई का राष्ट्रीयकरण श्री देशमुख की इच्छा के विरुद्ध हुआ था और सरकार के साथ इस टकराव की वजह से वे अपना कार्यकाल आगे नहीं बढ़वाना चाहते थे. लिहाज़ा उन्होंने अपने इस्तीफ़े की पेशकाश की जिसे नेहरू सरकार ने ठुकरा दिया. इसके बाद उन्होंने भी देश भावना को सर्वोपरि मानकर नए आरबीआई को खड़ा करने में अपना सर्वस्व झोंक दिया. यह टकराव मुद्दों का था, विचारों का था न कि अहम् और ध्येय का. बाद में श्री देशमुख देश के वित्त मंत्री भी बने.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आज देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है. यह एक स्वायत्त संस्था की तरह काम करता है. सारे बैंक सरकारी या निजी इसके मातहत होते हैं. इसका शानदार इतिहास रहा है. देशमुख, आई जी पटेल, मनमोहन सिंह, बिमल जालान, वाई गोपाल रेड्डी और रघुराम राजन आदि जैसे क़ाबिल व्यक्ति इसके गवर्नर रहे हैं जिन्होंने कई बार देश को आर्थिक संकटों से बचाया है.

पिछले एक साल से विमुद्रीकरण या डिमॉनेटाइज़ेशन चर्चा में है. 1978 में डॉ आईजी पटेल के कार्यकाल में आरबीआई ने पहली बार विमुद्रीकरण को अंजाम दिया था. उन्होंने सारे बड़े नोट सफलतापूर्वक बंद करवाए थे. हालांकि इस बार की तरह तब देश की अर्थव्यवस्था पर इतना भार नहीं था. इसलिए इस बार ऐसा करने से पहले सोचने-समझने की जरूरत पहले से ज्यादा थी.

आपको जानकर हैरत होगी कि 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव डॉक्टर आईजी पटेल को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे. उनके मना करने के बाद श्री मनमोहन सिंह को यह अवसर मिला. बाकी इतिहास तो आप जानते ही हैं कि उसके बाद से हमारी अर्थव्यवस्था एक नये दौर में प्रवेश कर गयी.

शेक्सपियर ने कहा है कि पुरुष के जीवन में तूफ़ान होते हैं, महान वे ही बनते हैं जिनमे ज्वार पर सवार होने की काबिलियत होती है. आज देश श्री उर्जित पटेल की तरफ़ बड़ी हसरतों से देख रहा है.