आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच का जो रास्ता होता है जिसे मिडिल सिनेमा भी कहा जाता है और सबसे कठिन रास्ता भी, ऋषिकेश मुखर्जी उस सिनेमा के अग्रणी निर्देशक थे. लेकिन ‘अनुपमा’ (1966) से लेकर ‘सत्यकाम’ (1969), ‘गुड्डी’ (1971), ‘आनंद’ (1971), ‘बावर्ची’ (1972), ‘चुपके चुपके’ (1975) और ‘गोलमाल’ (1979) जैसी इसी लीक की अनेक महान-सदाबहार फिल्में बनाने वाले इस फिल्मकार की फिल्मोग्राफी में एक फिल्म ऐसी भी है जिसके बारे में तकरीबन बिलकुल बात नहीं होती. इस फिल्म का विकिपीडिया पेज तक इसके बारे में कुछ नहीं बताता और हमेशा साफ-सुथरी व पारिवारिक फिल्में बनाने वाले ऋषि दा के करियर में यह एकलौती ऐसी बोल्ड फिल्म कहलाती है जिसमें सेक्स पर जमकर बात की गई थी.

सबसे बड़ा सुख’ (1972) नामक यह फिल्म उस साल चुपचाप रिलीज होकर फ्लॉप हो गई थी जिस साल कुछ महीनों के अंतराल में आकर राजेश खन्ना के जादुई अभिनय से सजी ‘बावर्ची’ ने धूम मचा दी थी. इससे पहले पिछले साल ही ऋषि दा ‘आनंद’ (1971) जैसी महान फिल्म दुनिया को दे चुके थे और इसके अगले साल, 1973 में, ‘अभिमान’ और ‘नमक हराम’ जैसी सुपरहिट फिल्में निर्देशित करने वाले थे. इन महान, सदाबहार और लगातार बेहद पसंद की जा रहीं फिल्मों को बनाने के बीच ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी लीक से हटकर ‘सबसे बड़ा सुख’ क्यों बनाई, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन इस सेक्स-कॉमेडी फिल्म को देखने के बाद जाहिर होता है कि उन्होंने इसे बड़े बेमन से बनाया था.

फिल्म में कोई बड़ा स्टार मुख्य भूमिका में नहीं था. ठरकी निर्देशक के रोल में असरानी, वैद्य के रोल में उत्पल दत्त और दलाल के रूप में केष्टो मुखर्जी जरूर थे, लेकिन ज्यादातर कहानी छोटे से एक कस्बे के रहने वाले नायक शंकर (विजय अरोड़ा) के इर्द-गिर्द घूमती थी जो मुंबई जाकर सबसे बड़ा सुख, यानी कि सेक्स पाना चाहता था. इसके लिए पहले कस्बे में और फिर मुंबई आकर नायक और उसका दोस्त लालू (रोबी घोष) कई जतन करते हैं और कभी सुंदर लड़कियों से मसाज करवाने एक मसाज पार्लर जाते हैं (जहां उन्हें टुन टुन मिलती हैं) तो कभी प्लेबॉय जैसी मैग्जीन छिपकर देखते हैं और ब्लू फिल्मों पर चर्चा करते हैं. फिल्म वेश्यावृत्ति को भी अपनी कहानी का हिस्सा बनाती है और इस सेक्स-कॉंमेडी फिल्म में बहुत कुछ परदे पर ऐसा घटता है, जैसे कि उम्मीद आप ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा से बिलकुल नहीं करते हैं.

लेकिन कंटेंट बोल्ड होने के बावजूद ‘सबसे बड़ा सुख’ एक नीरस फिल्म थी. इसमें न गाने अच्छे थे, न ऋषि दा मार्का मनोरंजन था, और न ही अभिनेताओं ने अपने अभिनय से रिझाया था. संवाद उबाऊ थे तो सिचुएशन्स और भी ज्यादा उबाऊ और क्लीशे थीं.

केष्टो मुखर्जी के अलावा असरानी और उत्पल दत्त तक ने इतना साधारण अभिनय किया था कि यह यकीन करना मुश्किल है कि ये वही कलाकार हैं जिन्होंने ऋषि दा की कई फिल्मों में कमाल काम किया हुआ है. साफ तौर पर फिल्म की पूरी फील ही बी-ग्रेड सिनेमा वाली थी. फिल्म को दोबारा देखते वक्त ऐसा भी लगता है कि 70 के दशक में सेक्स-कॉमेडी फिल्म बनाकर ऋषिकेश मुखर्जी कुछ क्रांतिकारी तो करना चाहते थे, लेकिन फिल्म बनाना शुरू करते-करते उन्हें यह समझ आ गया था कि उन्होंने गलत जॉनर की फिल्म से हाथ जला लिए हैं.

ऋषि दा जैसे मिजाज की ही फिल्में बनाने वाले बासु चटर्जी ने जहां बाद के सालों में ठरकी किरदारों को लेकर ‘शौकीन’ (1982) जैसी मनोरंजक फिल्म बनाने में सफलता पाई थी, वहीं ‘आनंद’, ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’ जैसी फिल्में बनाने के बीच में ऋषिकेश मुखर्जी ने इस तरह के दोयम दर्जे की फिल्म कैसे बना ली होगी, सोचकर ही आश्चर्य होता है. निर्देशन करने के अलावा इस फिल्म की कहानी और पटकथा भी ऋषिकेश मुखर्जी ने लिखी थी और बोल्ड व कम शालीन संवाद गुलजार की देन थे. फिल्म के एक सीन में स्वीमिंग पुल के पास कम कपड़ों में बैठी लड़की को देखकर कस्बे से पहली बार मुंबई आया नायक अचंभित होकर अपने दोस्त से गुलजार के लिखे ये संवाद बोलता है, ‘कितनी गोरी है...लगता है अंदर से ट्यूबलाइट जल रही है!’

शायद इन्हीं वजहों से, ‘सबसे बड़ा सुख’ आसानी से देखने को नहीं मिलती. आखिर कौन निर्देशक और लेखक चाहेगा कि उनके महान काम के आगे कोई उनके दोयम दर्जे की फिल्म का जिक्र छेड़े.

लेकिन फिल्मों के दीवाने दर्शक आखिर भूलते कहां हैं!

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