भारत में पोषण की कमी से ग्रस्त बच्चों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एससी-एसटी) के बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है. टेलिग्राफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ एक सरकारी सर्वेक्षण से पता चला है कि एससी-एसटी समुदाय के पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कम वज़न, वृद्धि धीमी होने या न होने और शरीर के किसी अंग के लगातार कमजोर होने की दर उल्लेखनीय रूप से ज़्यादा है. बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है. एससी-एसटी समुदाय के इतर भी पोषण की कमी का सामना कर रहे बच्चों की कुल संख्या देखी जाए तो सर्वेक्षण के आंकड़े भविष्य की एक चिंताजनक तस्वीर दिखाते हैं.

यह सर्वेक्षण हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूट्रीशन ने किया है. इसके मुताबिक दलित घरों के पांच साल से कम उम्र के 39 प्रतिशत लड़के वृद्धि रुक या धीमी हो जाने की समस्या का सामना कर रहे हैं, जबकि आदिवासियों के 34 प्रतिशत बच्चों में यह समस्या बनी हुई है. वहीं, पिछड़ी जातियों और बाक़ी जनसंख्या में क्रमशः 28 और 27 प्रतिशत बच्चे पोषण की कमी का सामना कर रहे हैं.

सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि जिन घरों में प्रति व्यक्ति आय कम है, पिता अशिक्षित हैं और साफ़ शौचालय नहीं हैं वहां ख़राब पोषण की समस्या ज़्यादा है. दिल्ली के इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ की सुपर्णा घोष कहती हैं कि शिक्षा और पोषण संबंधी जागरूकता की कमी, घरों का अस्वस्थ माहौल, बच्चों की ठीक से देखभाल न होना, खाद्य असुरक्षा, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संसाधन ऐसे कारण हैं जो बच्चों की खाद्य संबंधी स्थिति को प्रभावित करते हैं. घोष के मुताबिक सर्वेक्षण बताता है कि तुरंत कुछ करने की ज़रूरत है. उनका यह भी कहना था कि शिक्षा, स्वच्छता, रोज़गार सुरक्षा और लोगों के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी लक्ष्यों को जल्दी हासिल किया जाना चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल खाद्यान्न की पूर्ति से दूर नहीं होगी, बल्कि इसके लिए अलग से कुछ करने की ज़रूरत है.

सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि पोषण की कमी की शिकार लड़कियों की संख्या में सुधार हुआ है. यह परिणाम इस पारंपरिक सोच को चुनौती देता है कि लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों के खानपान का अधिक ध्यान रखा जाता है. सर्वेक्षण कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिक ए लक्षमैया ने बताया कि बीते दो दशकों में शहरी और ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के पोषण में सुधार हुआ है, हालांकि यह भी साफ़ है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में उनसे भेदभाव किया जाता है. उन्होंने कहा कि इसके बावजूद लड़कियों के बेहतर पोषण को लेकर कोई निश्चित कारण स्पष्ट नहीं है.

जिन राज्यों के बच्चे वृद्धि धीमी होने या रुक जाने की समस्या का शिकार हैं, उनमें उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है. यहां ऐसे बच्चों का आंकड़ा 40 फीसदी है . इसके बाद महाराष्ट्र में 36, दिल्ली में 35 और बंगाल में 34 प्रतिशत बच्चों की वृद्धि में समस्या है. शरीर के किसी अंग के कमजोर होते जाने की समस्या सबसे ज़्यादा (18 प्रतिशत) अनूसूचित जाति के बच्चों में पाई गई. बच्चों के कुपोषण पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट भी बताती है कि अपनी तरह के देशों में भारत इस मामले में ‘अपवाद’ है. यानी यहां बच्चों में यह समस्या उल्लेखनीय रूप से ज़्यादा है.