मध्यप्रदेश के बड़वानी शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर, सतपुड़ा की पहाड़ियों से सटा एक कस्बा है बहूती बसाहट. इस क्षेत्र में बसाहट अमूमन उन कस्बों को कहा जाता है जहां सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों को बसाया गया है. चूंकि इस बसाहट में बहूती गांव के लोग बसे हैं इसलिए इसका नाम बहूती बसाहट पड़ गया. नर्मदा घाटी में ऐसी लगभग 88 बसाहटें हैं जहां सरदार सरोवर बांध के चलते डूब क्षेत्र में आए 193 गांवों के लोगों को बसाया गया है या अभी बसाया जाना है. इन सभी बसाहटों में बहूती बसाहट ही सबसे पुरानी है जहां आज से लगभग 12 साल पहले ही लोग आकर बसने लगे थे.

किशोर सिंह सोलंकी इस बसाहट में रहने वाले सबसे पुराने लोगों में से हैं. अपने यहां आने के बारे में वे बताते हैं, ‘2005 में हमारे गांव में बाढ़ आई थी. घरों में पानी भर गया था. तभी हम गांव छोड़ के यहां आ गए थे. वैसे भी सरदार सरोवर बांध के चलते कभी न कभी तो गांव छोड़ना ही था. लेकिन विस्थापित होने के इतने सालों बाद भी हम लोग यहां आज तक स्थापित नहीं हो सके हैं.’ किशोर आगे कहते हैं, ‘यहां बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं. बिजली की लाइन हाल ही में बिछी है और पानी की समस्या तो आज तक जस की तस बनी हुई है. एक ट्यूबवेल यहां लगा है लेकिन उसमें भी कुछ ही महीनों पानी आता है. गर्मियों में हमें आज भी बैलगाड़ी पर पानी लादकर लाना पड़ता है.’

बहूती बसाहट से कुछ किलोमीटर दूर गोई नदी बहती है. यह नर्मदा की सहायक नदी है. बहूती बसाहट के लगभग सभी लोग पानी के लिए इस नदी पर निर्भर हैं. इन लोगों का पुनर्वास हुए एक दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है लेकिन आज तक ये लोग पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. आलम यह है कि गर्मियों में लोग कई-कई किलोमीटर दूर से आकर गोई नदी से पानी भरते हैं और फिर उसे बैलगाड़ियों पर लादकर अपने घरों तक पहुंचाते हैं. सरकार का दावा है कि सरदार सरोवर बांध से लाखों लोगों को पानी मिल सकेगा. लेकिन जो लोग इस बांध के चलते अपने मूल गांवों से उजाड़ दिए गए हैं, वे ही आज पानी के लिए तरस रहे हैं.

बहूती की ही तरह इस क्षेत्र की अन्य बसाहटों में भी पानी की विकट समस्या है. इसके अलावा सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल और जानवरों के लिए चारागाह जैसी सुविधाएं भी अधिकतर बसाहटों में नहीं हैं. मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि गुजरात में भी जिन लोगों को बसाया गया, वे लगभग इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं.

लेकिन इन तमाम सुविधाओं की कमी इन विस्थापितों को उतना विचलित नहीं करती जितना आने वाले दिनों की चिंता इन्हें बेचैन कर जाती है. इनमें सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जो एक बार फिर से उजड़ने के कगार पर आ गए हैं, और कई ऐसे भी जो आने वाले दिनों में अपने रोजगार के माध्यमों से हाथ धोने वाले हैं. इन लोगों की स्थितियों को एक-एक कर समझते हैं:

आवंटित जमीनें अब सरकार वापस छीन रही है

दीपक घनश्याम मूल रूप से बड़वानी जिले के रहने वाले हैं. 90 के दशक में जब यहां सरदार सरोवर बांध के चलते पुनर्वास शुरू हुआ तो दीपक को उनके डूब रहे खेतों के बदले गुजरात के भरूच जिले में पांच एकड़ जमीन आवंटित हुई. उसी दौर में दीपक गुजरात जाकर बस भी गए. लेकिन अब लगभग 20 साल बाद गुजरात सरकार उन्हें आवंटित की गई जमीन वापस लेने की तैयारी कर चुकी है. दीपक की ही तरह कई अन्य विस्थापितों से भी आवंटित जमीनें वापस ली जा रही हैं. इन विस्थापितों को आवंटित जमीनों पर मालिकाना हक़ आज तक नहीं दिया गया लेकिन अब जमीनों का कब्ज़ा भी इनसे छीना जा रहा है.

दिनेश भाई बांकेलाल भी ऐसे ही एक विस्थापित हैं जो करीब 17 साल पहले मध्यप्रदेश से गुजरात आकर बसे थे. वे कहते हैं, ‘एक बार अपना घर-गांव सबकुछ छोड़ कर हम यहां आकर बसे. अब सरकार हमें फिर से उजाड़ने की तैयारी में है. सरकार का तर्क है कि कई लोगों को गलत तरीके से आवंटन हो गया था लिहाजा अब उनका आवंटन रद्द किया जाएगा. जो लोग यहां आकर बसे हैं उनका मूल गांव और खेत बांध के चलते डूब चुके हैं. अब अगर उनका आवंटन भी रद्द हो जाता है तो वे कहां जाएंगे?’

सरदार सरोवर परियोजना की चपेट में आ रहे लोगों ने पुनर्वास के नाम पर छल का आरोप लगाया है | फोटो : राहुल कोटियाल
सरदार सरोवर परियोजना की चपेट में आ रहे लोगों ने पुनर्वास के नाम पर छल का आरोप लगाया है | फोटो : राहुल कोटियाल

छोटा उदयपुर जिले की बरौली बसाहट में रहने वाले बालू भाई बताते हैं, ‘मेरा मूल गांव गुजरात में ही था जो बांध के चलते डूब गया. हम 90 के दशक में ही इस बसाहट में आ गए थे. लेकिन जो जमीनें हमें आवंटित की गई थी, वे सिंचित नहीं थीं. ऐसी जमीनों को खेती के लायक बनाने में हमने लाखों रुपये खर्च किये. घर बनाने के लिए भी जो प्लाट हमें आवंटित हुए थे वे काली मिट्टी वाली जमीनों पर थे. मैंने अपना घर जमीन से पांच फुट ऊपर उठाकर बनाया था. लेकिन इसके बावजूद भी मेरे घर में जगह-जगह दरारें आ गई हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘तमाम परेशानियां झेलने और लगातार आंदोलन करने के बाद कहीं जाकर हम सरकार से पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं ले पाए हैं. खेड़ा जिले की कई बसाहटों में तो आज भी कई-कई किलोमीटर दूर तक पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. इन सुविधाओं की व्यवस्था करने की जगह सरकार बेशर्मी से यह कह रही है कि आवंटन गलत हो गए थे लिहाजा रद्द किये जाने हैं. सूचना के अधिकार से मैंने जानकारी ली तो मालूम हुआ पूरी नर्मदा घाटी में सरकार करीब आठ सौ लोगों के आवंटन रद्द कर रही है.’

विस्थापन के एक दशक बाद अब रोजी-रोटी का भी संकट

नर्मदा घाटी के कई विस्थापित ऐसे भी हैं जिनके सामने अब रोजी-रोटी का भी संकट आ खड़ा हुआ है. बहूती बसाहट में रहने वाले महिताब बताते हैं, ‘मेरे पिता के नाम पर नौ एकड़ जमीन थी और मेरे नाम पर दो एकड़. ये सारी ही जमीन डूब क्षेत्र में आ गई थी. इसके बदले हमें कुल साढ़े सात लाख रुपये का मुआवजा मिला. इस रकम से हमने किसी तरह अपना ये घर बनाया और साल 2000 में यहां आकर रहने लगे. तब से हम अपने उन्हीं खेतों में फसल उगा कर गुजर-बसर कर रहे हैं जो सरकार ने अधिग्रहित कर ली है.’ वे आगे कहते हैं, ‘लेकिन अब उन खेतों में पानी भरने लगा है. हमारी खड़ी फसल बर्बाद हो गई है और अब हमारे पास खेती के लिए कोई जमीन भी नहीं है. खेती के अलावा हमें कुछ और नहीं आता लेकिन अधिग्रहण के बाद हम पूरी तरह से भूमिहीन हो गए हैं. कुछ दिनों बाद खेत पूरी तरह डूब जाएंगे और हमारा व्यवसाय भी.’

महिताब जिस समस्या से जूझ रहे हैं वैसी ही समस्या नर्मदा घाटी के सैकड़ों अन्य लोगों की भी है. ये उन लोगों में से हैं जिन्हें पुनर्वास नीति का सबसे कम लाभ मिला है. वह इसलिए कि जो लोग अपने मूल गांव छोड़कर नहीं गए उनके लिए सरकार कई बार अलग-अलग नीतियां लेकर आई. लेकिन इन सभी नीतियों से उन लोगों को पहले ही बाहर कर दिया गया जो अपना मूल गांव छोड़ कर बसाहटों में आ गए थे. हाल ही में शिवराज सरकार ने जो 900 करोड़ के अतिरिक्त पैकेज की घोषणा की है, इन लोगों को उसका भी पात्र नहीं माना जा रहा है.

फोटो : एएफपी
फोटो : एएफपी

बहूती बसाहट में ही रहने वाले साधुराम बताते हैं, ‘हम तीन भाइयों के पास कुल 22 एकड़ जमीन थी. इसमें से 17 एकड़ डूब में चली गई और इसका कुल मुआवजा हमें दस लाख रूपये मिला. इसके अलावा न तो हमें खेत के बदले खेत मिले और न ही हमें उस 60 लाख के मुआवजे का पात्र माना जा रहा है जिसके आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने दिए हैं.’ साधुराम अपने तीन भाइयों के साथ मिलकर फिलहाल 22 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं. कपास, गेहूं, ज्वार मक्का और मूंगफली जैसी फसल उगाकर तीनों भाई साल भर में लगभग 12 लाख रुपये कमा लेते हैं. लेकिन अब उनकी 22 में से 17 एकड़ जमीन पानी में डूबने लगी है. बाकी बची सिर्फ पांच एकड़ जमीन में तीन भाई खेती करके अपना परिवार कैसे चला पाएंगे, इस सवाल का जवाब वे खुद भी नहीं जानते.

मूल गांव से पहले पुनर्वास स्थल डूबने लगे हैं

बड़वानी के कुकरा गांव वालों को इसी जिले में जहां बसाया गया है वह जगह कुकरा बसाहट कहलाती है. इस बसाहट की स्थिति ऐसी है कि यहां लगभग वैसा ही पानी भरने लगा है जैसा डूब क्षेत्र में आए कई गांवों में भर रहा है. नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता राहुल यादव बताते हैं, ‘फिलहाल बांध का जलस्तर 129.30 मीटर है जबकि बांध की कुल ऊंचाई 138 मीटर है. लेकिन अभी से ही कुकरा बसाहट जैसे पुनर्वास स्थलों में पानी भर जाने का खतरा मंडराने लगा है. ये निश्चित है कि अगर बांध का जलस्तर बढ़ेगा तो डूब क्षेत्र के कई गांवों से पहले ही ये कुकरा बसाहट पूरी तरह से बांध के बैक-वाटर में डूब जाएगी.’

इस बसाहट में रहने वाली चंदू बेन बताती हैं, ‘हर साल बरसात में हमारे घरों में पानी भर जाता है. इस साल जबसे बांध में पानी भरा गया है तब से तो ये समस्या और भी बढ़ गई है. हमारा मूल गांव, जो कि डूब क्षेत्र में है, उसमें भी इतना पानी अभी तक नहीं भरा जितना यहां इस बसाहट में हर बार भरता है. इस बार तो बरसात में इतना पानी आया कि पास का मंदिर उसमें बह गया. हमारा सारा सामान बर्बाद हो गया और दीवारों में दरारें आ गई.’ पानी भरने के चलते इस बसाहट के कई घर धसने भी लगे हैं. यहीं रहने वाली सुशीला बाई कहती हैं, ‘हमारा मकान ऐसी स्थिति में है कि वो कभी भी गिर सकता है. पिछले साल से घर धंसने लगा था. हम चौबीसों घंटे इसी डर में जीते हैं कि कहीं घर ढह न जाए.’ वे आगे कहती हैं, ‘हम भूमिहीन लोग हैं. ध्याड़ी-मजदूरी करके पेट पालते हैं. किसी तरह ये मकान बनाया था जिसका कर्ज आज भी नहीं उतार पाए हैं. अगर मकान गिर गया तो हम कभी दोबारा भी नहीं बना पाएंगे.’

पानी भरने के कारण इस बसाहट में बीमारियां फैलने का खतरा भी लगातार बना रहता है. करीब पांच साल पहले कुकर गांव से इस बसाहट में आकर बसे मंसाराम मालवीय बताते हैं, ‘बरसात में पूरे बडवानी शहर का पानी इस बसाहट में आता है और यहां से उसकी कोई निकासी नहीं है. गटर और नाली का पानी इस पूरे इलाके में फैलता है और घरों में घुसता है. पूरी बसाहट में बदबू फैली रहती है. यहां करीब 150 परिवार हैं और उनके पीने के पानी के लिए यहां सिर्फ एक ट्यूबवेल है. उसमें भी बदबूदार पानी आता है. कुछ समय पहले स्वास्थ्य विभाग के अफसर यहां आए थे और उन्होंने इस पानी की जांच की थी. उन्होंने बताया था कि ये पानी पीने लायक नहीं है. ऐसे में लोग बीमार नहीं पड़ेंगे तो क्या होगा.’

सरदार सरोवर बांध के चलते जिन लोगों का विस्थापन हुआ वे अपना सबकुछ गंवा कर जहां बसाए गए, वहां इन तमाम तरह की समस्याओं से उन्हें जूझना पड़ रहा है. कहीं पानी, बिजली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं भी विस्थापितों को नहीं मिली हैं तो कहीं उनके खेत, उनके बाज़ार, उनके अस्पताल उनसे कई-कई किलोमीटर दूर हो गए है. भीलखेडा बसाहट में रहने वाले गणेश लक्ष्मण कहते हैं, ‘गांवों जैसी कोई सुविधा बसाहटों में नहीं है. गांव में हमारे जानवरों के लिए न जगह की कमी थी और न चारे की. यहां हमें 60 बाई 90 का प्लाट दे दिया गया है जिसमें हमें भी रहना और जानवरों को भी रखना है. उनके चारे की कोई व्यवस्था यहां नहीं है. हमारे मंदिर-पूजा स्थल भी हमसे छिन गए हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन सबसे खतरनाक यह है कि इतना कुछ होने के बाद भी कई विस्थापित फिर से उजड़ने की कगार पर हैं. जिस परियोजना के चलते हम जैसे लाखों लोगों की ऐसी स्थिति हुई है, क्या उसे देश के विकास की परियोजना कहा जा सकता है?’