जब नेताओं, अधिकारियों और आपराधिक गिरोहों का एक संगठित गठजोड़ ही अवैध खनन की वजह हो तो क्यों उम्मीद करनी चाहिए कि एक बड़े विनाश को न्योता देता यह कारोबार कभी रुकेगा?
खनन माफिया का विरोध करने पर बाराबंकी में दो किसानों की हत्या.
झांसी में खनन पर वर्चस्व के लिए खूनी झड़प, पांच मरे
फतेहपुर में खनन माफिया ने यमुना पर पुल बना कर धारा रोकी
नियमित तौर पर दिखने वालीं ये सुर्खियां आतंक और अपराध तंत्र के उस दबदबे की झलक भर हैं जो उत्तर प्रदेश की शस्य-श्यामला धरती पर खनन माफिया के जरिए फैलाया जा रहा है. ये सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही हाल नहीं है. पूरा देश खनन माफिया के खतरनाक पंजों की जकड़ में फंसता जा रहा है. एक मोटे अनुमान के मुताबिक देश भर में अवैध बालू-मिट्टी का खनन इस समय सालाना एक लाख करोड़ रु से भी ज्यादा का कारोबार बन चुका है. मिट्टी से सोना पैदा करने वाले इस अवैध धंधे में बड़े-छुटभैय्ये नेता, अधिकारी और आपराधिक गिरोहों के लोग मिल जुल कर नोट छाप रहे हैं. इस माफिया तंत्र के सामने कोई बाधा नहीं है, उसे किसी कानून का डर नहीं है. यह गठजोड़ जहां जैसी जरूरत होती है उस हिसाब से नियम-कानून तक बना लेता है.
इस माफिया तंत्र के सामने कोई बाधा नहीं है, उसे किसी कानून का डर नहीं है. यह गठजोड़ जहां जैसी जरूरत होती है उस हिसाब से नियम-कानून तक बना लेता है.
बिल्डर लॉबी और बड़े ठेकेदार अवैध खनन को संरक्षण इसलिए दे रहे हैं क्योंकि अवैध खनन का माल उन्हें आधे से कम मूल्य पर मिल जाता है. राजनेता और प्रशासन इसलिए इस धंधे के साथ हैं क्योंकि इससे उन्हें मोटा माल मिलता है. पैसे का यह खेल कानून की आंखों की पट्टी को भी मोटा बना देता है.
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु इस अवैध धंधे के सिरमौर हैं. उत्तराखंड जैसे कम अपराध वाले राज्य में हरिद्वार, नैनीताल और उधम सिंह नगर जैसे जिले खनन माफिया के लिए स्वर्ग बन चुके हैं. हरिद्वार में गंगा से अवैध बालू खनन को लेकर पिछली भाजपा सरकार के एक प्रभावशाली मंत्री पर आरोप लगे थे तो इस सरकार में खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत पर ही खनन माफिया को संरक्षित करने का आरोप लग रहा है. अप्रैल में राज्य के रामनगर कस्बे के पास खनन माफिया के खिलाफ ग्रामीणों का साथ देने की जुर्रत करने पर एक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता प्रभात ध्यानी और उनके एक साथी पर माफिया ने जानलेवा हमला किया था. हमलावर दोनों को मरा समझ कर छोड़ गए थे. इस घटना का राज्य भर में तीखा विरोध हुआ. मगर माफिया का कुछ नहीं बिगड़ा.
उत्तर प्रदेश में बांदा जिले के बृज मोहन यादव ने केन व बेतवा नदी में हो रहे अवैध मोरंग खनन के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में शिकायत की थी. जांच में यह शिकायत सही पाई गई. लेकिन स्थानीय स्तर पर खनन माफिया की मजबूत पकड़ के चलते कोई कार्रवाई नहीं हो सकी. उल्टे यादव को स्थानीय पुलिस ने फर्जी आरोप लगा कर जेल भेज दिया. बाद में अनेक सामाजिक संगठनों की मदद से इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें रिहाई दिलवाई. इस घटना के बाद खनन माफिया का आतंक और भी बढ़ गया और अब तो ग्रामीण खुद ये कहने लगे हैं कि कुछ बोल कर जान गंवाने से तो अच्छा है कि चुप ही रह कर जिंदा रह लिया जाए. बुन्देलखण्ड की नदियां खनन माफिया को इसलिए भी पसंद हैं क्योंकि उनसे निकलने वाली मोरंग के दाम बालू की तुलना में ढाई गुना से भी ज्यादा हैं यानी एक ट्रक में ढाई गुना मुनाफा.
प्रदेश के फतेहपुर जिले में तो और भी अचरज की बात हुई. खनन माफिया ने वहां के औती घाट पर यमुना के दूसरे छोर पर मौजूद करोड़ों की रेत खोदने के लिए आठ सौ मीटर लंबा पुल बना डाला. खनन माफिया की हिम्मत कितनी बढ़ गई है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वह पूरे एक महीने तक यमुना की धारा रोककर अवैध पुल बनवाता रहा और प्रशासन उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका. हालांकि अब मीडिया के दबाव में लाखों रु की लागत से बना यह पुल ध्वस्त कर दिया गया है, मगर वहां के कोरी घाट में अब भी यमुना पर बंधा बना कर नदी का रुख मोड़ते हुए मशीनों के जरिए खुदाई कर सारे नियम कानूनों का मजाक उड़ाया जा रहा है. हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री ने इलाहाबाद के कमिश्नर बी के सिंह और फतेहपुर के डीएम राकेश कुमार को निलम्बित कर दिया है मगर अवैध खनन अभी रूका नहीं है.
खनन माफिया की हिम्मत कितनी बढ़ गई है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वह पूरे एक महीने तक यमुना की धारा रोककर अवैध पुल बनवाता रहा और प्रशासन उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका.
दरअसल उत्तर प्रदेश में पिछले 10-12 साल के दौरान बालू-मिट्टी से सोना बनाने की कीमियागिरी इतनी तेजी से विकसित हुई है कि आज राज्य का कोई भी जिला ऐसा नहीं बचा है जहां इस विद्या के पारंगत मौजूद न हों. राज्य के राजनीतिक ढांचे में इसका बड़ा अंशदान होने लगा है. इस नए उद्योग ने गांव-गांव में एसयूवी गाड़ियां पैदा कर दी हैं. हथियार और तड़क भड़क पैदा कर दी है और सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के लिए कमाई कर एक नया रास्ता भी खोल दिया है. मायावती सरकार में खनन मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा भले ही अभी जेल में हैं मगर उनकी अकूत सम्पत्ति बचाए रखने के लिए उनकी श्रीमती जी को सपरिवार समाजवादी पार्टी की शरण मिल गई है. खुद समाजवादी पार्टी के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति आय से अधिक सम्पत्ति के विवादों में बुरी तरह घिरे हुए हैं. सूबे में अखिलेश सरकार के कम से कम तीन अन्य मंत्री भी खनन के धंधे के चलते विवादों में हैं. दुर्गा शक्ति नागपाल के कारण चर्चा में आए भाटी साहब (सपा नेता नरेंद्र भाटी) जैसे स्वयंभू समाजवादियों की संख्या तो अब तीन अंकों में पहुंच चुकी है. पहले ऐसे खलीफा बसपा में होते थे. यानी सत्ता से अवैध खनन के धंधेबाजों का सीधा गठजोड़ हो चुका है.
आंध्र प्रदेश में (दोनों विभाजित राज्यों को मिलाकर) गुंटूर, कृष्णा, खम्मम, वारंगल, श्री काकुलम, ईस्ट गोदावरी और वेस्ट गोदावरी जिलों में बहने वाली कृष्णा, गोदावरी, वम्साधारा, पन्ना, प्राणहिता और उसकी सहायक नदियों पर सबसे ज्यादा अवैध खनन की मार पड़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ कृष्णा जिले से हर रोज हो हजार से ज्यादा ट्रकों में लगभग एक करोड़ रूपए की रेत हैदराबाद पहुंचती है. इस अवैध खनन के कारण वहां भूजल का स्तर अचानक तेजी से गिरने लगा है. आंध्र में ‘वाटर, लैण्ड एण्ड ट्री एक्ट’ 2002 के रूप में अवैध खनन के खिलाफ कड़े कानून थे. मगर खनन माफिया ने धीरे-धीरे कानूनों को दरकिनार कर अवैध खनन शुरू कर दिया.
बिल्डर लॉबी अवैध खनन को इसलिए संरक्षण देती है कि इससे उसे रेत-बजरी कहीं कम कीमत पर मिल जाती है. राजनेता और प्रशासन इसलिए इस धंधे के साथ हैं क्योंकि इससे उन्हें मोटा माल मिलता है.
यही हाल बिहार में है जहां बालू का खनन खूनी खेल बन चुका है और जिसके चलते पिछले एक दशक में 400 से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं, वहां तो कोई खनन नीति ही नहीं है. पिछली नीतीश सरकार में खनन मंत्री सत्यदेव नारायण एक के बाद एक छह खनन अधिकारियों को हटाने के कारण चर्चित हुए थे क्योंकि वे अपने चहेतों को उपकृत करना चाहते थे. बाद में नीतीश कुमार ने उनके सारे आदेश रद्द किए. बिहार में खनन के अवैध धंधे के कारण नदियों के प्रवाह और भूजल की स्थिति पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ रहा है. पटना उच्च न्यायालय में भागलपुर जिले में अवैध खनन पर रोक का आदेश इसीलिए जारी किया क्योंकि अवैध खनन के कारण धान की फसल वाले इस इलाके में अनेक जल धाराएं सूख गई थीं. लेकिन इस रोक पर भी पूरी तरह अमल नहीं हो पाया क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी इसके लिए ठोस प्रयास ही नहीं करना चाहती. बताया जाता है कि 300 करोड़ रु सालाना से अधिक का औसत राजस्व प्राप्त करने वाले इस राज्य में भी बालू-मिट्टी का अवैध कारोबार 3000 करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है.
महाराष्ट्र में तो तटीय इलाकों में बालू खनन एक बड़ी पर्यावरण समस्या बनता जा रहा है. महाराष्ट्र और गोवा में तटीय खनन से पर्यावरण को होने वाली क्षतियों के विरूद्ध ‘आवाज’ संस्था और बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने मिल कर मुम्बई हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी. अवैध खनन में इस्तेमाल ‘सैण्ड पम्पों’ के कारण जैव विविधता पर आए संकट को इस याचिका से चर्चा तो बहुत मिली लेकिन न तो अवैध खनन ही पूरी तरह रुका और न ही जैव विविधता का खतरा ही खत्म हुआ.
सरकारों का उल्टा काम
कमोबेश ऐसी ही स्थिति सभी राज्यों में हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी 2012 को माइनर मिनरल्स (बालू-मोरंग-मिट्टी-गिट्टी इसी वर्ग में आती है) के खनन के लिए भी केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति जरूरी करने का निर्देश राज्यों को दिया था, लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हो सका. इसके बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी कड़े दिशा निर्देश जारी किए थे. पांच अगस्त 2013 को भी ट्रिब्यूनल की प्रिंसिपल बेंच ने एक बार फिर एक और कड़ा आदेश जारी किया. मगर ये सब आदेश विभिन्न अदालती पचड़ों में पड़े हुए हैं. कहीं सरकारें खुद खनन कानूनों का विरोध कर रही हैं तो कहीं वे इस समस्या पर कान में रुई डाले बैठी हैं.
उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारें कान में रूई डाले बैठी हैं तो आंध्र प्रदेश जैसे राज्य एक कदम और आगे निकल गए हैं. वहां सरकारें खुद खनन माफिया को फायदा पहुंचाने वाले काम कर रही हैं.
उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लीजिए. राज्य के खनन मंत्री ने अभी हाल में ही अवैध खनन के खिलाफ नए केन्द्रीय कानूनों का खुला विरोध एक सरकारी कार्यक्रम में किया था. अवैध खनन के मामलों में सजा एक से सात वर्ष और जुर्माना एक लाख से बढ़ाकर सात लाख रूपये करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव से नाखुश उत्तर प्रदेश के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति कहते हैं कि इससे तो गरीब लोग जेल जाने लगेंगे. साफ है कि खनन मंत्री या सरकार की निष्ठा राज्य के पर्यावरण के प्रति अथवा लोगों के भविष्य के प्रति न होकर खनन माफिया के प्रति अधिक है.
दूसरा उदाहरण आंध्र प्रदेश का है. 29 मार्च 2012 को एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था. मगर राज्य सरकार खुद ही इन प्रतिबन्धों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. उसकी दलील थी कि खनन पर प्रतिबंध के कारण राज्य के आर्थिक संसाधनों को भारी क्षति हो रही है और गरीबों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं के लिए पैसे का संकट खड़ा हो गया है. शीर्ष अदालत ने उसे केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय जाने को कहा. उसकी अनापत्ति के बाद 71 स्थानों पर खनन की अनुमति दे दी गई. सितम्बर 2012 में राज्य सरकार नई खनन नीति लाई, मगर यह नीति खनन माफिया के पक्ष में ही बनाई गई. इसने न सिर्फ छोटी-छोटी नदियों बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी खनन आसान बना दिया. इससे राज्य सरकार को भले ही हर वर्ष औसतन 200 करोड़ रु की आय हो रही है लेकिन राज्य में अवैध खनन का आंकड़ा 2500 करोड़ से ऊपर पहुंच गया है.
मामला अपराध से ज्यादा बड़े विनाश का भी
अवैध खनन का यह मामला सिर्फ अपराध की संस्कृति का मामला ही नहीं है. यह मामला तो हमारे पर्यावरण के विनाश से सीधे जुड़ा हुआ मामला है. अवैध खनन हमारे प्राकृतिक परिवेश को कैंसर की तरह तबाह कर रहा है. उत्तराखण्ड में जिस तरह प्राकृतिक आपदा में नदियों के किनारे बने बहुमंजिला घर जमींदोज हुए वह अवैध खनन का ही एक साइड इफेक्ट था. अवैध खनन से नदियों के प्रवाह पथ, निकटवर्ती इलाकों का भूजल स्तर और प्राकृतिक परिस्थितियां प्रतिकूल रूप से प्रभवित हो रही हैं. इससे जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियां भी पैदा हो रही हैं.
उत्तराखण्ड में 2013 में आई प्राकृतिक आपदा में जिस तरह नदियों के किनारे बने बहुमंजिला घर जमींदोज हुए वह अवैध खनन का ही एक साइड इफेक्ट था.
भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण संस्थान ने अवैध खनन से पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर एक व्यापक शोध किया है. उसका कहना है कि अवैध खनन से पर्यावरण पर सात तरह के दुष्प्रभाव पड़ते हैं. इसके अनुसार अवैध खनन नदियों की पूरी सेहत बिगाड़ रहा है यानी जलीय जीवन तंत्र को नष्ट कर रहा है. जलीय जीवन तंत्र के नष्ट होने के कारण नदियां धीरे-धीरे मर रही हैं. इसके कारण नदियों के तटों पर मौजूद प्राकृतिक वन और वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं. इससे नदियों का प्रवाह पथ प्रभावित हो रहा है, भू कटाव बढ़ रहा है और यह यह बड़े पैमाने पर जन धन की हानि की वजह भी बन सकता है. इससे निकटवर्ती क्षेत्र का भूजल स्तर बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. भूजल में कमी आ रही है और वह प्रदूषित हो रहा है.
प्राकृतिक रूप से पानी को शुद्ध करने में रेत की बड़ी भूमिका होती है. अवैध खनन के कारण नदियों की स्वतः जल को साफ कर सकने की क्षमता पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही इससे नदियों का जीवन भी खत्म हो रहा है. यानी अवैध खनन हमारे अस्तित्व के लिए ही चुनौती बनता जा रहा है. जल्द से जल्द ज्यादा मुनाफा कमाने के इस खेल का खामियाजा हम सबको भुगतना पड़ सकता है.