अपनी ज़मीन बचाने के लिए किसान ख़ुद की ‘समाधि’ बनाने को मजबूर हो रहे हैं. जयपुर में दूसरी सबसे बड़ी हाउसिंग कॉलोनी बनाने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) द्वारा ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ राजस्थान के निंदड़ गांव के किसानों ने सोमवार को गांधी जयंती के दिन ‘जमीन समाधि सत्याग्रह’ की शुरुआत की. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के मुताबिक़ विरोध के इस अनोखे तरीक़े के ज़रिए किसानों की मांग है कि सरकार अधिग्रहण के तहत ली गईं उनकी ज़मीनें वापस करे. किसानों का कहना है कि अपनी मांगें पूरी होने तक वे ख़ुद को ज़मीन में गर्दन तक गड़ाए रखेंगे.

इस विरोध को समर्थन दे रही ‘निंदड़ बचाओ किसान युवा समिति’ के संयोजक नागेंद्र सिंह ने कहा कि यह विरोध जेडीए की नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ शुरू किया गया है. उन्होंने कहा, ‘हम तब तक समाधि लिए रहेंगे जब तक राज्य सरकार (ज़मीन अधिग्रहण का) अपना फ़ैसला वापस नहीं लेती और हमारी ज़मीनें वापस करने की घोषणा नहीं करती.’ विरोध के पहले दिन 22 किसान समाधि के रूप में ज़मीन में बने गड्ढों में बैठे और जेडीए के ख़िलाफ़ नारे लगाए. प्रदर्शनकारी किसानों ने चेतावनी दी कि अगर राज्य सरकार ने उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं की तो और भी किसान समाधि लेकर विरोध प्रदर्शन करेंगे.

इन किसानों ने राज्य सरकार को उनके प्रति ‘असंवेदनशील’ बताया. उन्होंने कहा कि सरकार या जेडीए से एक भी प्रतिनिधि उनकी बात सुनने नहीं आया. किसानों ने बताया कि वे पिछले 14 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को नज़रअंदाज़ किया इसलिए उन्होंने विरोध तेज़ करते हुए ‘जमीन समाधि’ लेने का फ़ैसला किया. इस बीच, राज्य के शहरी विकास व आवास मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने कहा कि सरकार किसानों की मांगें जानने के लिए उनसे बात करने को तैयार है. उन्होंने कहा कि किसानों के प्रतिनिधि दल को उनसे मिलने आना चाहिए.

जेडीए ने इस आवास योजना के तहत 1300 बीघा ज़मीन अधिगृहीत करने की योजना बनाई थी. इसके लिए उसने मंदिरों के नाम पर ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करने वालों से 110 बीघा ज़मीन हाल में अपने अधिकार में ले ली थी. अभी तक 600 बीघा ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया जा चुका है. जेडीए ने अधिगृहीत ज़मीन के लिए कोर्ट में 60 करोड़ रुपये भी जमा करा दिए हैं. लेकिन किसानों का आरोप है कि पिछले दस सालों में आवास योजना के नाम पर अधिगृहीत की गईं अधिकतर ज़मीनें ख़ाली पड़ी हैं. उन्होंने कहा कि किसानों से ज़मीन लेने के बाद जेडीए ग़ैर-ज़रूरी ढंग से उन पर आवास परियोजनाएं चला रहा है.