अगर भारत के किसी शख़्स की उम्र 25-30 साल या उससे ज़्यादा है तो यकीन मानिए उसने ‘देश की सुरीली धड़कन’ की हर धक-धक को महसूस किया होगा. उसके किसी न किसी सुर से उसका वास्ता पड़ा होगा. हाथ में ट्रांजिस्टर लेकर वह कभी न कभी खुली जगह में निकला होगा. ताकि सिग्नल पूरे मिलें और आवाज़ साफ सुनाई देने लगे. इसी गरज़ से घर के किसी हिस्से में रखे मरफी रेडियो का एंटिना भी दुरुस्त किया ही होगा. जी हां. विविध भारती पर फिल्मी नग़मे सुनने के लिए. कभी पढ़ाई या कोई और काम करते वक़्त तो कभी फुर्सत के पलों में. कभी दोपहर में बरामदे में रखी आरामकुर्सी में आराम फरमाते हुए तो कभी गर्मियों की रातों में खुली छत पर नींदभरी आंखों से आसमान के तारों को ताकते हुए. कभी इसे खुशी का हमसफर बनाया होगा तो कभी ग़म का और कभी रूमानियत का.

आपका यह हमसफर अब 60 बरस का हो चुका है. आज 3 अक्टूबर को वर्षगांठ है विविध भारती की जिसकी शुरुआत उस दौर में हुई जब देश में रेडियाे सीलोन (श्रीलंका की रेडियाे प्रसारण सेवा) का बोलबाला था. एक लेख में विविध भारती के उद्घोषक यूनुस खान लिखते हैं, ‘उस जमाने में भारत सरकार ने आकाशवाणी पर फिल्मी गाने-बजाने पर रोक लगा रखी थी. तब मान लिया गया था कि फिल्मी गाने सुनकर लोग बिगड़ जाते हैं. इसलिए केवल सुगम-संगीत पर आधारित गीत ही रेडियो पर बजाए जाते थे. लेकिन उसी दौर में रेडियो सीलोन नए फिल्मी गीतों के जरिए लोगों के बीच पैठ बना रहा था. आलम यह हो गया था कि अगर कोई शहर में टहलना शुरू करे तो घरों से आती रेडियो सीलोन की आवाजें लगातार उसका पीछा करती रहती थीं. रेडियो सीलोन का कंटेंट तो शानदार था ही वह व्यावसायिक-हितों को बख़ूबी पूरा कर रहा था. तमाम कंपनियां कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए उसका सहारा ले रही थीं.’

यूनुस आगे लिखते हैं, ‘रेडियो सीलोन के ज़रिए उत्पादों का प्रचार-प्रसार करने वाली कंपनियों में भारतीय कंपनियां भी थीं. यानी देश का पैसा बाहर जा रहा था. लिहाज़ा इसे रोकने के लिए सरकार के स्तर पर ऐसे रेडियो चैनल की ज़रूरत महसूस गई जो रेडियो सीलोन का मुकाबला कर सके. ज़िम्मेदारी कवि पंडित नरेंद्र शर्मा को दी गई और उन्होंने ‘विविध भारती’ की परिकल्पना की. फिर केशव पांडे, गोपालदास, गिरिजा कुमार माथुर जैसी साहित्य और रेडियो प्रसारण की कद्दावर हस्तियों के साथ मिलकर इसकी नींव रखी. यह तीन अक्टूबर 1957 की तारीख़ थी. उस दिन विविध-भारती का आगाज शील कुमार शर्मा की आवाज में हुआ था. उन्होंने कहा था, ‘यह विविध-भारती है, आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम’ पंचरंगी यानी पांच ललित कलाओं- गीत, संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्र का समावेश. सबसे पहले ‘नाच रे मयूरा’ गाना विविध भारती पर बजा था. इसे पंडित नरेंद्र शर्मा ने ही लिखा था. अनिल विश्वास का संगीत था और मन्ना डे की आवाज़’

इसके बाद तो देश की इस सुरीली धड़कन ने ऐसे सुर (हिट कार्यक्रम) बुलंद किए कि रेडियो सीलोन का कोई नामलेवा तक नहीं रहा. और इनमें अमीन सायानी की आवाज में ‘बिनाका गीतमाला’ का तो कहना ही क्या. संगीत के प्रथम सुर ‘षड्ज’ यानी ‘स’ की तरह. एक बार यह फिक्स हुआ नहीं कि पूरे सात के सातों सुर जैसे अपने आप फिक्स हो गए. आज विविध भारती के वर्षगांठ पर नज़र डालते हैं उसकी सरगम के सात सुरों पर.

1. बिनाका गीतमाला

इसे विविध भारती का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम कहें तो ग़लत नहीं होगा. पहले यह रेडियो सीलोन पर आता था पर 1989 के बाद से विविध भारती पर आने लगा. इस कार्यक्रम की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके प्रस्तोता अमीन सायानी को आज भी लोग याद करते हैं. हिंदी फिल्मों के शीर्ष-10 गानों का काउंटडाउन होता था इसमें और सायानी अपनी लरज़दार आवाज़ में पूरा लुत्फ लेकर बताते थे कि कौन सा गाना कितने ‘पायदान’ की छलांग लगाकर कहां से कहां पहुंचा. हर बुधवार रात आठ से नौ बजे प्रसारित होता था और कहते हैं सुनने वालों के बीच इस पर शर्तें लगा करती थीं कि आज बिनाका गीतमाला में फलां गाना पहले नंबर पर होगा.

अमीन सायानी की ही ज़ुबानी अगर बिनाका गीतमाला की कहानी सुनना चाहें तो इस लिंक के ज़रिए सुन सकते हैं.

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2. जयमाला

भारतीय रेडियो के इतिहास में शायद इकलौता कार्यक्रम जो फौजी भाइयों के लिए समर्पित था. समय- रोज़ शाम सात बजकर पांच मिनट. इस कार्यक्रम में फौजी भाइयों की फरमाइश पर न जाने कितनी मशहूर हस्तियों ने उनके लिए गाने बजाए. मसलन- प्राण, अमरीश पुरी, गुलज़ार, अमिताभ बच्चन, अमाेल पालेकर, एसडी बर्मन, आरडी बर्मन, मीना कुमारी और भी न जाने कितने नाम. इन्होंने न सिर्फ गाने बजाए बल्कि अपने मन की बात भी फौजी भाइयों के साथ साझा की. यकीन जानिए जयमाला को जिसने भी सुना है वह दावे के साथ कह सकता है कि उसकी आंखों में मोर्चे पर तैनात फौजियों का मंज़र तैर जाता था. यह सिलसिला आज भी ज़ारी है पर शायद अहसास पहले की तरह न रहा हो.

ऐसे ही एक कार्यक्रम का लिंक नीचे है जिसे मशहूर अभिनेता प्राण पेश कर रहे हैं...

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3. छायागीत

यह कार्यक्रम रात 10 बजे प्रसारित होता है. कमल शर्मा जैसे नामचीन रेडियो प्रस्तोता इसे पेश करते हैं. शायराना अंदाज़ में लोकप्रिय फिल्मी गीत. चांद की चांदनी में रूमानियत भरते हुए. ऐसा ही एक कार्यक्रम सुनकर तरोताज़ा कीजिए पुरानी यादों को.

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4. हवा-महल

कहानियों को नाट्य रूप में पेश किया करता हुआ कार्यक्रम. अक्सर हास्य-विनोद में लपटी हुई कहानियां. यह कार्यक्रम रात को आठ बजे आता है. इसमें अमरीश पुरी, ओम पुरी असरानी जैसे बड़े-बड़े कलाकारों ने काम किया है.

ऐसा ही एक कार्यक्रम ‘उदयपुर की ट्रेन’ सुनकर आप भी लुत्फ ले सकते हैं.

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5. संगीत-सरिता

यह कार्यक्रम सुबह साढ़े-सात बजे आता है. संगीत की समग्रता में दिलचस्पी है तो यह कार्यक्रम एकदम मुफीद. शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों की मूलभूत जानकारी दी जाती है. साथ ही उन पर आधारित फिल्मी गीत भी सुनवाए जाते हैं. और वह भी संगीत के किसी अच्छे कलाकार के बारास्ते. ऐसे ही एक कार्यक्रम में शास्त्रीय गायिका आशा खादिलकर राग तिलक कामाेद के बारे में बता रही हैं..

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6. आज के फनकार

यह कार्यक्रम सुबह 9.30 बजे आता है. किसी एक मशहूर गायक, गीतकार, संगीतकार को केंद्र में रखकर उसकी रचनाएं, उसकी बातें पेश की जाती हैं. मसलन- पुरानी हास्य कलाकार टुुनटुन अगर याद न आती हों तो उन्हें आज के फनकार की इस क्लिपिंग के ज़रिए याद कर सकते हैं.

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7. सखी-सहेली

दोपहर बाद तीन बजे घर के कामों से फुर्सत होकर घरेलू महिलाएं अरसे इस कार्यक्रम के साथ हमकदम हाे लेती हैं. और इसकी प्रस्तोता ममता सिंह शुरू से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं जो आज घर-घर में पहचानी जाती हैं. इस कार्यक्रम में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करते हुए उनकी पसंद के नगमे सुनवाए जाते हैं.

यह विविध भारती की सखी-सहेली की टीम है. इसमें ममता सिंह बीचों-बीच लाल सलवार सूट में.
यह विविध भारती की सखी-सहेली की टीम है. इसमें ममता सिंह बीचों-बीच लाल सलवार सूट में.

और एक बड़ा सा ‘पिटारा’ भी, जिसमें काफी कुछ है

जैसा नाम वैसी ही शक्ल. यह मस्ती, मनोरंजन और जानकारी का पूरा पैकेज है. इसमें रोज़ अलग-अलग कार्यक्रम पेश किए जाते हैं. कभी ‘हेल्लो फरमाइश’ (फोन कॉल के ज़रिए गानों की फरमाइश) तो कभी ‘सेल्‍युलाइड के सितारे’ (फिल्म कलाकारों से मुलाकात). कभी ‘सरगम के सितारे’ (संगीत के दुनिया के दिग्गजों से बातचीत) तो कभी सेहत से जुड़ा ‘सेहतनामा’. पिटारे में सब कुछ है. मन करे तो कभी खोलकर देखिए इस पिटारे को.

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वक़्त बदला. विविध भारती ने बदलते वक़्त के साथ अपना रूप भी बदला है. दूसरे तमाम एफएम चैनलों की तरह विविध भारती मोबाइल-इंटरनेट पर उपलब्ध है. 102.8 एफएम विविध भारती का आधुनिक चेहरा है. संभव है सुनने वालों की तादाद में कुछ कमी आई हो लेकिन उसके चाहने वालों की कमी नहीं हुई है. अहमियत कम नहीं हुई है. और यह अहमियत किस हद तक है इसकी एक मिसाल भारत रत्न लता मंगेशकर की एक टिप्पणी से मिलती है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘अगर
विविध भारती न होता तो हम मंगेशकर बहनों (लता, आशा, उषा) की आवाज़ देश के कोने-कोने तक न पहुंचती.’ सच ही तो है. इसीलिए तो विविध भारती ‘देश की सुरीली धड़कन’ है जो हर दिल में धक-धक करती है.