वित्त मंत्री अरुण जेटली पर भाजपा के अंदर से ही हमले की बरसात हो रही है. पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो वह सब कह दिया जो राहुल गांधी भी कहने से बचते थे. आखिर ऐसा क्या हुआ कि जेटली अचानक निशाने पर हैं? यशवंत सिन्हा की ऐसी क्या नाराजगी है कि उन्होंने अपने साथ-साथ अपने बेटे के भी राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगा दिया? भाजपा के छोटे और मझोले नेताओं को भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर यशवंत सिन्हा को क्या हो गया है? लेकिन भाजपा के शीर्ष पर बैठे नेताओं को इसकी वजह पता थी.

सुनी-सुनाई है कि यशवंत सिन्हा और भाजपा नेतृत्व के बीच एक समझौता हुआ था. उसी के तहत यशवंत खुद चुनाव नहीं लड़े और उन्होंने झारखंड के हजारीबाग से अपने बेटे जयंत सिन्हा को चुनाव लड़ाया. इसके एक हिस्से के मुताबिक मोदी सरकार में जयंत सिन्हा राज्यमंत्री बने और दूसरी के मुताबिक यशवंत का सिन्हा का यथोचित पुनर्वास होना था. आरएसएस भी इस करार का गवाह था. आरएसएस के एक नेता ने बताया कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यशवंत सिन्हा को राज्यपाल बनाकर राजभवन भेजना चाहता था, लेकिन यशवंत इतनी जल्दी राजनीति से संन्यास नहीं लेना चाहते थे, इसलिए बात बिगड़ी.

शुरू में यशवंत चाहते थे कि उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया जाए, लेकिन मोदी सरकार ने योजना आयोग खत्म कर नीति आयोग बना दिया और वहां भी नए लोगों को ही मौका मिला. झारखंड में जब सरकार बनी तो परंपरा से हटकर गैर आदिवासी रघुवर दास को मुख्यमंत्री बना दिया गया. यशवंत सिन्हा एक प्रतिनिधिमंडल के साथ कश्मीर गए, शुरू में ऐसी भी बात थी कि उन्हें कश्मीर का वार्ताकार नियुक्त किया जाएगा, लेकिन वह भी नहीं हुआ. पिछले एक साल से वे अपनी मन की बात प्रधानमंत्री से कहना चाहते थे, शिकायत का पिटारा भरता जा रहा था, लेकिन उन्हें मिलने का वक्त ही नहीं मिल रहा था. यशवंत सिन्हा ने जब अपने स्तर पर जानकारी जुटाई तो पता चला कि उनके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा वित्त मंत्री अरुण जेटली बने हुए हैं.

यशवंत सिन्हा भाजपा में ऐसे अकेले नेता नहीं जो अरुण जेटली से चिढ़ते हों. पिछले कुछ दिनों में जिस अंदाज़ में मोदी सरकार में जेटली की ताकत बढ़ी है उसके बाद तो आरएसएस और भाजपा के कई बड़े नेताओं की बेचैनी बढ़ी है. इस नाजुक वक्त में अर्थव्यवस्था के आंकड़े आए और नोटबंदी का असर दिखने लगा. आर्थिक मंदी की बातें शुरू हो गई. मौका सही था तो यशवंत सिन्हा को आगे बढाया गया और उन्होंने जेटली पर जमकर हमला बोला. लेकिन सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि इस हमले से जेटली को नुकसान कम और फायदा ज्यादा हुआ है.

भाजपा की सियासत को बरसों से समझने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि नोटबंदी का फैसला प्रधानमंत्री का था, इसलिए उसे आर्थिक मंदी की वजह बताने का मतलब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करना था. इसी वजह से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने फैसला किया कि यशवंत सिन्हा की बातों को तूल ही न दिया जाए और उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया. भाजपा के प्रवक्ताओं को भी कहा गया कि यशवंत सिन्हा के बयानों पर कोई प्रतिक्रिया ना दें.

यशवंत सिन्हा पर हमला करने के लिए सोच समझकर उनके बेटे जयंत सिन्हा को सामने लाया गया. ऐसा नहीं है कि जयंत सिन्हा मोदी सरकार में खुश हैं. अपने पिता यशवंत सिन्हा के बागी तेवरों का फिलहाल सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है. पहले वे वित्त राज्यमंत्री थे. यशवंत सिन्हा ने जब सरकार की मुखालफत शुरू की तो जयंत को वित्त मंत्रालय से हटाकर नागरिक उड्डयन मंत्रालय का राज्यमंत्री बना दिया गया. अगर जयंत इस बार भी पिता पर हमला नहीं बोलकर सरकार का बचाव नहीं करते तो मुमकिन था कि उनके पास मंत्री की कुर्सी तक नहीं बचती.

सुनी-सुनाई है कि जयंत ने अपने स्तर पर यशवंत सिन्हा को समझाने-बुझाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन यशवंत मानने को तैयार ही नहीं हैं. उन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है. और वे अकेले नहीं है. यशवंत सिन्हा की पीठ के पीछे संघ के कई मजबूत नेता खड़े हैं. संघ से जुड़े कई ऐसे नेता हैं जिनके नाम पब्लिक नहीं जानती, जो कभी खबरों में नहीं दिखते. वाजपेयी सरकार के वक्त ये लोग खासी हैसियत रखा करते थे. उस वक्त यशवंत सिन्हा उनके सूत्र हुआ करते थे. आज मोदी सरकार में संघ के उन ताकतवर नेताओं का की कोई पूछ नहीं है. कुछ महीने पहले तक संघ के इन आर्थिक जानकारों से सरकार कभी-कभी परामर्श कर लिया करती थी, लेकिन अब वह भी बंद हो चुका है. ऐसे लोगों को सबसे ज्यादा शिकायत अरुण जेटली से है क्योंकि प्रधानमंत्री फिलहाल सबसे ज्यादा भरोसा उन पर ही करते हैं.