पता नहीं पहले करते थे या नहीं, लेकिन इन दिनाें तो बड़े नेताओं के ‘बात’ करने का दौर चल रहा है. ख़बर है कि इस कड़ी में अब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी बात करने वाले हैं. अगले कुछ महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राज्य के लोगों से सीधे जुड़ने के लिए मुख्यमंत्री रेडियो-टीवी के ज़रिए ‘काम की बात’ करेंगे.

ख़बरों की मानें तो सिद्धारमैया की बात में उनकी सरकार के कामकाज़ का दम होगा, सिर्फ बातों ही बातों की हवा नहीं भरी होगी. सिद्धारमैया हर हफ्ते बात करेंगे. उनकी सरकार ने इसके लिए 17 करोड़ रुपए का इंतज़ाम किया है. राज्य के सभी डिप्टी कमिश्नरों (जिला कलेक्टर) को कह दिया गया है कि वे जितनी जल्दी हो तालुक केंद्रों में बड़े-बडे एलईडी लगवाएं. ताकि आम जनता अपने मुख्यमंत्री को बात करते हुए देख-सुन सके. बताते हैं कि मुख्यमंत्री के बेंगलुरू स्थित घर में एक बड़ा सा स्टूडियो बनाया जा रहा है. यहीं बैठकर वे सीधे लोगों से बात करेंगे.

हालांकि सिद्धारमैया की काम की बात शुरू हो, उससे पहले ही विपक्षी भाजपा ने उन पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. पार्टी प्रवक्ता एस प्रकाश का कहना है, ‘हिंदी क्यों? क्या उनको कोई कन्नड़ नाम नहीं मिला? वे तो कन्नड़ के लिए लड़ रहे हैं.’ प्रकाश ने यह भी कहा कि ‘काम की बात’ ‘मन की बात’ की बेकार नकल है.

मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज भी बात करते हैं पर ‘दिल से’

और नेता हो सकता है बात करने में दिमाग लगाते हों. लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ‘दिल से’ बात करते हैं. ऑल इंडिया रेडियाे यानी आकाशवाणी पर उनकी यह बात महीने के दूसरे रविवार को शाम छह बजे प्रसारित होती है. पहली मर्तबा 13 अगस्त और दूसरी बार 10 सितंबर को उनके ‘दिल से’ निकली बात मध्य प्रदेश के लोगों के कानों तक तो पहुंच चुकी है. और अगली आठ अक्टूबर को पहुंचने वाली है. पर उनके दिल से निकली बात लोगों के दिल तक पहुंची या नहीं यह तो साल भर बाद (विधानसभा चुनाव के नतीजों से) पता लगेगा.

वे सरकार हैं. सो उनकी बात में जनता के लिए कुछ तोहफे और कुछेक नसीहतें भी होती हैं. मसलन- पहली बार जब बात की तो मंदसौर (गोलीकांड) से नाराज किसानों के जख्मों पर कुछ मरहम रखने की कोशिश की. फिर दूसरी बार में युवाओं का मन टटोला और उन्हें नसीहतें दीं. जैसे- ब्लूव्हेल (ऑनलाइन गेम) से दूर रहिए, उद्यमी बनिए, समाज के लिए काम कीजिए. और सबसे दिलचस्प नसीहत यह कि ‘थ्री इडियट्स’ की तरह मन की सुनिए, मन की करिए और मूलभूत चीजों को समझने की कोशिश कीजिए.

केजरीवाल भी बात किया करते थे - ‘टॉक टु एके’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी बात किया करते थे. निजी एफएम रेडियो पर. कहने वाले कहते हैं कि उनके पास बड़ी ‘सरकार’ नहीं थी सो उन्हें सरकारी रेडियो की सुविधा नहीं मिल पाई उन्हें. पर निजी रेडियो वालाें ने जनता से उनकी खूब बातें कराईं. सिलसिला 17 जुलाई 2016 को शुरू हुआ. मोबाइल और सोशल मीडिया से भी काफी मदद मिली. और फिर अचानक एक दिन इस बातचीत पर हुए ‘खर्चे के चर्चे’ शुरू हो गए. बताते हैं कि बातचीत में कोई गड़बड़घोटाला हुआ था. बस फिर क्या था. बातचीत इसके बाद ठप ही हो गई है.

बात करने का सिलसिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया था

यूं देखा जाए तो रेडियो ज़रिए इस तरह बात करने का सिलसिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया था. अक्टूबर-2014 में. तब तीन तारीख को पहली बार प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो ज़रिए बात की थी. आजकल प्रधानमंत्री हर महीने के आख़िरी रविवार को बात किया करते हैं. बताया जाता है कि खूब सारे लोग सुना करते हैं. पर कितने? किसी को पता नहीं. किसी ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री की बातों से रेडियो वालों ने पैसे भी खूब कमा लिए हैं. यह सुनकर प्रधानमंत्री के चहेतों के कानों को थोड़ा सुकून मिलता कि इससे पहले ही खोजियों ने दुमछल्ला चिपका दिया कि रेडियो वालों ने जो कमाए उससे ज़्यादा गंवा दिए हैं. वह भी सिर्फ यह बताने (विज्ञापन) में कि प्रधानमंत्री फलां महीने की फलां तारीख़ को बात करेंगे.

वैसे ख़बरख़ोजियों का क्या है. जब प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ शुरू की थी तो कुछ नहीं तो यही खोज लाए कि बातचीत का यह सिलसिला असल में अमेरिकी राष्ट्रपति (उस वक़्त के) बराक ओबामा की नकल है. ओबामा हर हफ्ते रेडियो के ज़रिए लोगों से बात किया करते थे. ‘थे’ इसलिए क्योंकि दो कार्यकाल पूरे होने पर ओबामा तो राष्ट्रपति पद से विदा हुए ही उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी ‘बेसरकार’ हो गई. लगता है अमेरिकियों ने ओबामा की बात सुनी नहीं.

पर क्या भारत वाले सुनेंगे? और सुनेंगे तो कितना गुनेंगे? बात की बात में पता चल ही जाएगा कभी न कभी.