अंडर-17 विश्व कप के रूप में भारत की जमीन पर पहली बार फीफा का कोई टूर्नामेंट आयोजित हो रहा है. मेजबान देश होने के चलते भारत को इसमें सीधे प्रवेश दिया गया है. भारतीय टीम शुक्रवार को जब अमेरिका के खिलाफ मैच खेलने के लिए दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के मैदान पर उतरी तो उसका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. वह भारत की पहली ऐसी टीम बन गई जो फीफा के किसी टूर्नामेंट में हिस्सा ले रही है. भारत को इस विश्व कप के ग्रुप-ए में रखा गया है जहां अमेरिका, कोलंबिया और घाना जैसी फुटबॉल की सबसे मजबूत मानी जाने वाली टीमें हैं.

भारत में इस फीफा विश्व कप को लेकर बड़े स्तर पर तैयारियां चल रही हैं. भारत सरकार और अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (एआईएफएफ) इस आयोजन को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता. यही वजह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस टूर्नामेंट के उद्घाटन समारोह में शरीक होने पहुंचे.

लेकिन, इस सबके बीच एक बात सभी के दिमाग में घूम रही है. वह यह कि क्या भारतीय टीम इस टूर्नामेंट में कुछ अच्छा प्रदर्शन कर पाएगी? क्या वह ग्रुप स्टेज के मैच जीतकर नॉकआउट दौर में प्रवेश भी कर सकेगी?

इस विश्व कप में भारतीय टीम की संभावनाओं को समझने के लिए उसके पिछले दो साल के प्रदर्शन को देखना जरूरी है. 21 सदस्यीय जिस टीम को विश्व कप के लिए चुना गया है उसने दुनिया के सबसे चर्चित विदेशी कोचों से खेल के गुर सीखे हैं. इनमें निकोल एडम्स और वर्तमान में भारतीय टीम के मुख्य कोच लुइस नॉर्टन डे मातोस प्रमुख हैं. इन दोनों के साथ इस टीम ने पिछले तीन सालों में यूरोप और दक्षिण अमेरिका में महीनों प्रैक्टिस की है.

विश्व कप की तैयारी के तहत भारतीय टीम ने यूरोप में पुर्तगाल, फ्रांस, इटली और हंगरी में नामी क्लबों के साथ अभ्यास मैच खेले हैं. इसके अलावा उसने इस साल इटली के एक बड़े टूर्नामेंट में भी हिस्सा लिया. इसी साल मई में भारतीय टीम ने पेरिस के मशहूर सेंट जर्मेन क्लब की अंडर-17 टीम के साथ भी अभ्यास मैच खेला.

भारत सरकार की ओर से अंडर-17 टीम को बेहतर बनाने के लिए बड़ी रकम भी खर्च की गई है. इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने पिछले कुछ सालों में विश्व कप की तैयारी को लेकर टीम पर करीब 18 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

अगर, साल 2015 के बाद से भारतीय टीम के प्रदर्शन को देखें, तो एआईएफएफ के आंकड़ों के मुताबिक उसने कुल 259 गोल किए हैं. इस दौरान उसने दुनिया भर में कई टीमों को बड़े अंतर से भी हराया है. आंकड़ों की मानें तो करीब 100 मैचों में से 17 में विपक्षी टीम को पांच या उससे ज्यादा गोल के अंतर से भी शिकस्त दी है. उधर, इतने ही बड़े अंतर से होने वाली हार को देखें तो वह केवल दो ही बार पांच या उससे अधिक गोल से मैच हारी है. एआईएफएफ के मुताबिक भारतीय टीम ने अपने ज्यादातर मैच बेहद करीब से हारे हैं. भारतीय टीम ने पिछले साल मई से अगस्त तक कई नामी क्लबों के साथ 16 मैच खेले और इनमें उसे केवल तीन में ही हार का सामना करना पड़ा.

लेकिन, इस प्रदर्शन के बाद भी चिंता वाली बात यह है कि पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय टीमों के खिलाफ भारतीय टीम का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है. पिछले करीब 10 महीनों में वह भारत, यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में खेले गए 27 अंतरराष्ट्रीय मैचों में से पांच में ही जीत हासिल कर सकी है.

अगर, भारतीय टीम के खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन पर नजर डालें तो कोमल थालाल, अनिकेत जाधव और अमन छेत्री ने पिछले दो सालों में 25 से ज्यादा गोल किए हैं. हालांकि, दुर्भाग्य की बात यह है कि तेजतर्रार छेत्री चोट के कारण विश्वकप में टीम का हिस्सा नहीं हैं. पिछले दो वर्षों में टीम के सबसे ज्यादा गोल करने वाले इन खिलाड़ियों के अलावा भी कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं. इनमें अमरजीत क्याम, अभिजीत सरकार, नौंथोईंगनबा माइती, संजीव स्टालिन और सुरेश वांगजाम प्रमुख हैं. इन सभी ने भी पीछे दो सालों में 10 या उससे अधिक गोल किये हैं.

भारतीय टीम का विश्व कप में प्रदर्शन कैसा रहेगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन, टीम के कोच लुइस नोर्टन डे मातोस के इरादों से ऐसा नहीं लगता कि यह टीम केवल पहली बार विश्व कप में हिस्सा लेकर इतिहास बनाने तक ही सीमित रहने वाली है. एक साक्षत्कार में मातोस कहते हैं, ‘हम अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को कड़ी चुनौती देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. हमारी टीम बिना किसी डर के शेर की तरह मुकाबले के लिए तैयार है और फुटबॉल में हर मैच जीता जा सकता है.’