इंडियन एक्सप्रेस के अपने आलेख में आपने कहा था कि प्रधानमंत्री ने गरीबी को करीब से देखा है और अब वित्त मंत्री सारे देश को उसी तंगी का अनुभव कराना चाहते हैं. यह बात आपने किस आधार पर कही?

देश के वित्त मंत्री तो बड़ी-बड़ी नीतियां बिना किसी ठोस आधार के बनाकर लागू कर दे रहे हैं और मुझे सिर्फ एक बयान देने के लिए भी ठोस आधार की जरूरत है! कितनी नाइंसाफी है... आप भूल रही हैं कि मैं इस देश का एक सफल वित्त मंत्री रहा हूं.

आपके बेटे और केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने इस लेख से असहमति जताई है और उसका जवाब भी दिया है. इसे आप किस तरह देखते हैं?

मैं बेरोजगारी के फ्रस्ट्रेशन में बोल रहा था और जयंत रोजगार की मजबूरी में! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि यह जयंत नहीं, उसकी नौकरी बोल रही है... और अभी हालात ऐसे हैं कि उसे बोलने देना चाहिए वरना हम दोनों ही बेरोजगार हो सकते हैं!

सिन्हा जी, इस बात में कितनी सच्चाई है कि आप वित्त मंत्री के बहाने प्रधानमंत्री पर निशाना साध रहे हैं?

उतनी ही, जितनी इस बात में कि इस समय अहमदाबाद-मुम्बई बुलेट ट्रेन परियोजना का उद्घाटन सिर्फ विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए किया गया है, न कि गुजरात चुनाव के मद्देनजर!

बतौर वित्त मंत्री आपमें और अरुण जेटली में क्या फर्क है?

मैंने देश के अर्थ की व्यवस्था यानी अर्थव्यवस्था संभाली थी, जेटली जी सिर्फ ‘अव्यवस्था’ संभाल रहे हैं!

आपने खुद को छोड़कर बाकी लगभग सभी वित्त मंत्रियों की आलोचना की है. क्या आप खुद को सबसे बेहतर वित्त मंत्री मानते हैं?

हां बिल्कुल! अऽअ...मेरा मतलब कि मेरे बयानों के चलते पार्टी में कोई दूसरा तो अब इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेगा. सो, मुझे खुद ही मजबूरी में अपने काम की सराहना करनी पड़ रही है.

एक समय तो आप पार्टी और सरकार के केन्द्र में हुआ करते थे, लेकिन फिलहाल आप पूरी तरह हाशिये पर हैं. क्या आप फिर से केन्द्रीय भूमिका में आने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं?

ऐसे केन्द्र में आकर मैं क्या करूंगा जहां आपके खड़े होने और बैठने के निर्देश भी कोई और ही देता हो! अभी कम से कम मैं जब मर्जी, मनचाहे बयान तो दे सकता हूं. फिर तो मुझे मुंह खोलने के लिए भी किसी और की तरफ देखना पड़ेगा.

आपका इशारा किसकी तरफ है?

यह सवाल सिर्फ तब बनता, जब हमारे पास एक से ज्यादा ‘हिटलर’ होते!

अरुण शौरी, सुब्रमण्यम स्वामी, वरुण गांधी और आप, सभी भाजपा के सदस्य होते हुए भी लगातार अपनी ही पार्टी की सरकार की आलोचना क्यों करते रहते हैं?

ताकि सरकार को अच्छे विपक्ष की कमी महसूस न हो! ओह...मेरा मतलब कि यह बात तो कबीर दास जी ही कह गए हैं कि ‘निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय/बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय’. हम चारों लोग पार्टी के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं इसलिए लगातार आलोचना करते रहते हैं ताकि पार्टी अपना बेहतर प्रदर्शन करती रहे.

पर ऐसा लग रहा है, जैसे आप चारों लोग कांग्रेस की बी टीम की भूमिका में आ गए हों.

कांग्रेस की कोई ‘ए’ टीम भी है क्या? (हंसते हुए)... ‘ए’, ‘बी’ सब हमीं हैं! अरे... मेरा मतलब कि यह सब मिथ्या प्रचार है, हमारी पूरी निष्ठा भाजपा के साथ है.

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने तो नोटबंदी को कालेधन से निपटने वाला जरूरी कदम बताया था, लेकिन आप उसे आर्थिक आपदा कह रहे हैं. ऐसा क्यों?

आप मीडिया वाले सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं. मेरे कहने का मतलब था कि काले धन वालों के लिए इससे बढ़कर भला क्या आपदा होगी.

यानी देश के आम आदमी के लिए आप नोटबंदी को आर्थिक आपदा नहीं मानते?

आम आदमी का क्या है, उसके लिए तो शराबबंदी भी किसी आपदा से कम नहीं! ...मेरा मतलब कि आम आदमी के लिए तो हर तरह की ‘बंदी’ आफत ही है, फिर चाहे वह नोटबंदी हो, शराबबंदी, तालेबंदी या फिर कोई सामान्य बंदी हो!

आपने जीएसटी को अफरा-तफरी पैदा करने वाला फैसला क्यों कहा?

अफरा-तफरी तो मची ही है. पहले योजना आयोग खत्म कर दिया, चलो उसकी जगह नीति आयोग बना. पर उसमें भी सिर्फ नए लोगों को मौका दिया गया. यहां तक कि विदेश से आर्थिक सलाहकार बुलाकर उपाध्यक्ष बनाए गए, लेकिन देश के अनुभवी आर्थिक सलाहकारों को पूछा तक नहीं गया! अब अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आर्थिक सलाहकार परिषद बनी, उसमें भी मेरे जैसे योग्य अर्थशास्त्री को नहीं लिया गया. इससे बढ़कर अफरा-तफरी और भला क्या होगी!

लेकिन इसमें जीएसटी के कारण फैली अफरा-तफरी कहां है?

देखिये, अफरा-तफरी तो पदों की बंदरबांट के कारण मेरे दिमाग में मची है, पर इस देश में अब यदि सुनामी या भूकंप कुछ भी आएगा, कोसा तो सिर्फ जीएसटी और नोटबंदी को ही जाएगा न! अब्ब्ब...मेरा मतलब लोगों को यही नहीं पता कि बोलने पर कितना जीएसटी लगेगा, कटघरे में खड़े करने पर कितना और आलोचना करने पर कितना... मतलब कि किस चीज पर कितना टैक्स बढ़ा और घटा है, लोगों को यही ठीक से नहीं पता. इस कारण जबरदस्त अफरा-तफरी मची हुई है.

आप सरकार की ज्यादातर नीतियों का विरोध क्यों कर रहे हैं?

देखिये, मेरा पार्टी या सरकार से कोई विरोध नहीं है. दोनों का मुख्य एजेंडा सफाई करना ही है. सरकार अपनी नीतियों से देश में तरह-तरह के सफाई अभियान चला रही है और मैं अपने बयानों से पार्टी में सफाई अभियान चला रहा हूं!

अच्छा यह बताइये, अरुण जेटली के आपके बारे में दिए ‘80 वर्षीय नौकरी आवेदकवाले बयान पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

(कुछ पल की चुप्पी) आज के दौर में युवाओं की योग्यता और ऊर्जा के सामने अक्सर ही बुजुर्गों और अधेड़ों की नौकरी खतरे में होती है. मैं यह पहला ही केस देख रहा हूं जिसमें एक बुजुर्ग के कारण किसी युवा को अपनी नौकरी खतरे में लग रही है. मैं उस बुजुर्ग नौकरी आवेदक की योग्यता को सलाम करता हूं जिसके ज्ञान प्रदर्शन के आगे इस युवा को अपनी नौकरी खतरे में लगने लगी! (व्यंग्य से मुस्कुराते हुए)

भाजपा के एक दूसरे वरिष्ठ नेता अरुण शौरी ने वर्तमान सरकार कोढाई लोगों की सरकारकहा है. क्या आप इससे सहमत हैं?

शौरी जी पता नहीं क्यों ‘अध्धा’ और ‘पउवा’ के चक्कर में पड़े हैं! (हंसते हुए) उन्हें अब इस सरकार के ‘वन मैन आर्मी’ होने की सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए. मैं किसी की आलोचना नहीं कर रहा, बस कह रहा हूं कि ‘वन मैन शो’ की ऐसी अदभुत क्षमता उनसे अलग मैंने सिर्फ ‘गुरमीत राम रहीम इंसा’ में ही देखी है, जिसने फिल्म की कहानी से लेकर, पटकथा, संवाद, प्रोडक्शन, गीत-संगीत, अभिनय और निर्देशन सभी कुछ अकेले ही संभाला है!

नोटबंदी और अर्थव्यवस्था के मसले पर आपके और अरुण शौरी के विचारों में काफी समानताएं हैं. क्या आप दोनों में और भी कोई समानता है?

बिल्कुल, दोनों ही सरकार के भीतर या बाहर कोई भी पद न मिलने के कारण हुई उपेक्षा से बुरी तरह घायल हैं! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि हम दोनों ही पार्टी के सच्चे कार्यकर्ता हैं जो संसद में एक मजबूत विपक्ष की कमी को लगभग एक ही स्तर पर गहराई से महसूस कर रहे हैं और उस कमी को पूरा करने की हर संभव कोशिश भी कर रहे हैं!

सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करने पर शत्रुघ्न सिन्हा ने ही आपका पूरा समर्थन किया है. इसे आप किस तरह देखते हैं?

एक अभिनेता को आर्थिक नीतियों की समझ भला क्या होगी. आप इसे एक ‘सिन्हा’ द्वारा आंख बंद करके दूसरे ‘सिन्हा’ की तारीफ के तौर पर देखिये. यह है शुद्ध सिन्हावाद! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि पार्टी में कोई तो है जिसे मेरी आर्थिक सूझबूझ की कद्र है और जो बोलने पर भी जीएसटी चुकाने को तैयार है!