हमारा समय पहले के किसी भी समय से अधिक हिंसक है: साम्प्रदायिक, जातीय, बाज़ारू, घरेलू, सवर्ण, आतंकवादी आदि सब तरह की हिंसाएं व्यापक स्तर पर एक साथ चल रही हैं. अधिकांश भारतीय अहिंसक हैं पर डरे हुए, अधिकतर चुप और निष्क्रिय हैं. हिंसा इतनी निडर इतनी हिम्मत और हिकमत वाली पहले कभी नहीं थी. आज की हिंसा न राज्य से, न पुलिस से, न धर्म से, न परंपरा से, न समाज से डरनेवाली हिंसा है. उसका लक्ष्य अक्सर अपने से ‘दूसरे’ को नष्ट करना, हाशिये पर डालना, उसकी गरिमा को समाप्त करना है. उसे व्यापक पैमाने पर राजनीति और धर्म का, मीडिया तक का, मौन या मुखर, समर्थन प्राप्त है.

ऐसी हिंसा से घिरे होने पर कई बार लाचारगी, निरुपायता और निराशा का तीखा बोध हम सबको होता है. ठीक उस मुक़ाम पर गांधीजी की याद आ सकती है, आती है कि नहीं यह दीगर बात है. भारतीय ही नहीं सकल मानव समाज में हिंसा और अहिंसा के लगातार चलते द्वंद्व को गांधी ने अपने समय में पहचाना था और इस बात को भी कि हिंसा का कारगर प्रतिरोध संभव है. आततायी नृशंस औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष संभव और सफल हो सकता है यह गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए संग्राम में प्रयोग कर दिखाया. हम उसे भूल गये हैं पर इस मुक़ाम पर उसे याद किया जा सकता है, जाना चाहिये.

आज के शासक भले भूल गये हों, हमें तो यह याद रखना चाहिये कि उन्हें हमने चुना है और हमें वही लोकतंत्र उनसे जवाबदेही मांग करने का अधिकार देता है जिसने उन्हें शासन का अधिकार दिया है. हमारी व्यवस्था में हम अब राजा की प्रजा नहीं, राज्य के नागरिक जन हैं. यह काफी नहीं है लोकतंत्र के लिए भी कि हम वोट देकर चुप हो जायें और अगले वोट देने के चुनावी अवसर का इन्तज़ार करें. हमारी नागरिकता तभी सशक्त हो सकती है जब वह लगातार सजग और सक्रिय रहे, मुखर और ज़िम्मेदार भी. चुप रहकर हम सभी क़िस्म की हिंसा को खूंख़़्वार का खेल खेलते रहने की इजाज़त देते हैं, हमारी नागरिकता में मनमानी कटौती करने का भी.

जिस तरह की निराशा फैल रही है और हर दिन अत्याचारों में इज़ाफ़ा हो रहा है उनके चलते एक तरह के सविनय अवज्ञा आंदोलन की ज़रूरत है. यह सिर्फ़ राज्य को लक्ष्य करके नहीं, समाज, धर्म, मीडिया, बाज़ार आदि को भी निशाना बनाते हुए होना चाहिये. हमारी चुप्‍पी और निष्क्रियता पहले ही घातक साबित हो रही है और मनमानेपन को एक तरह से कुछ भी करने की छूट सी मिल रही है. यह स्थिति हमारे लोकतंत्र और संविधान से, हमारी बहुलतामूल परंपरा से, हमारी विरासत से मेल नहीं खाती है. गांधी में ये सभी एकाग्र हुए थे और उनकी याद उन सबके अहिंसक पुनर्वास के लिए होनी चाहिये, किसी रस्मी औपचारिकता के लिए नहीं.

कुंवर नारायण
हिंदी साहित्य समाज पिछले कुछ दिनों से इस ख़बर से उद्विग्न (घबराया हुआ) है कि हमारे वरिष्ठ कवि-आलोचक कुंवर नारायण दो महीनों से अधिक अवधि से दिल्ली के एक अस्पताल में अचेत हैं. इस बेहद भले, सभ्य और मददगार साहित्यकार के लिए हम सभी प्रार्थना कर रहे हैं. लेखकों को विभिन्न आधारों पर बांटने और मित्र-शत्रु की श्रेणी में रखने में अधीर और अभागे समय में वे उन थोड़े से लेखकों में से हैं जो लगभग अजातशत्रु हैं.

हंसराज कॉलेज के कुछ युवा छात्रों ने मिलकर कुंवर नारायण पर एक परिसंवाद आयोजित किया जिसमें शिरकत करना तोषप्रद था. वहां भी यह मार्मिक अनुभव हुआ कि उनके लिए कितना व्यापक सद्भाव है. कुंवर जी की निश्चय ही एक बड़ी लेकिन शान्त और अनुग्र उपस्थिति दशकों से है. उग्रता, प्रतिबद्धता, नाटकीय दावेदारी और अतिरेक के वर्तमान आक्रामक समय में वे अल्प-भाषी, धीरोदात्त और विवेक के पक्षधर लेखक रहे हैं. राजनीति के भयावह वर्चस्व के दौर में वे अपनी रचना और आलोचना दोनों में ही नीति की आवाज़ उठाते रहे हैं. उनका इसरार रहा है कि ‘तट पर हूं. पर तटस्थ नहीं हूं’. वे जो नैतिक प्रश्न और मुद्दे उठाते हैं वे रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी और उसके खट्टे-मीठे अनुभवों से उठाये गये हैं. उनकी आकांक्षा और चिन्ता के केन्द्र में ‘मनुष्यतर लौटने’ की आकांक्षा है जो सरल नहीं है. कई तरह की जटिलताओं में फंसी यह आकांक्षा अपनी समूची पारदर्शिता से कुंवर नारायण की कविता पर छायी देखी जा सकती है. इस आकांक्षा को वे लगभग महाकाव्यात्मक स्तर तक भी ले गये हैं: उनकी तीन लंबी कविताएं अस्तित्व के मूल प्रश्नों को संबोधित करने का प्रयत्न हैं.

बेवजह जटिलता के मोह के समय में कुंवर नारायण की अपनी कविता और आलोचना दोनों का परिसर साफ़-सुथरा रहा है. भले उनकी शुरूआत ख़ासी जटिलता से हुई थी, कुंवर जी ने उसे सरलीकृत किये बिना सादगी और सुथरेपन में बदलने का बिरला कौशल दिखाया है. उनकी कविता आत्म के जालों-भ्रमों से दो-चार होती है और उसमें दूसरों की उपस्थिति का भरपूर एहतराम है. वे आत्मरति, आत्माभियोग और आत्मधिक्‍कार से मुक्त आत्मनिष्ठ लेखक हैं. उनमें गहरा आत्मबोध है जो दूसरों को भूलकर या उन्हें छोटा कर अर्जित नहीं किया गया है.

कुंवर जी की एक चिन्ता भाषा की पारिस्थितिकी को लेकर रही है. इन दिनों जब हमारी भरी-पूरी मानवीयता, मनुष्यता को छोटा करने के लिए दुर्भाग्य से भाषा का ही सहारा लिया जा रहा हो तो कुंवर जी के यहां इस अवमूल्यन को लेकर गहरा उद्वेलन है. यह उनकी नैतिक प्रश्नाकुलता का ही विस्तार है. कुंवर जी यह याद दिलाते रहे हैं कि हमारी नीतिपरकता का हमारी भाषा से आवयविक संबंध है: ये एक दूसरे के बिना हो ही नहीं सकती.

एक ‘ख्वाब को जिन्दगी से भी बड़ा’ की अवधारणा को अपने केंद्र में लिये कुंवर नारायण की कविता अब भी हममें विकल्प की तलाश और बड़ा सपना देखने की चाह उकसा सकती है.

अरबी सभ्यता-समीक्षा

अरबी लेखक नजीब महफ़ूज़ हमारे मुक्तिबोध की ही तरह विधिवत् सभ्यता-समीक्षक नहीं हैं. पर समय-समय पर वे अरबी सभ्यता की स्थिति, नियति और विडम्बना के अनेक पहलुओं पर टिप्पणियां करते रहे थे. अंग्रेज़ी में ऐसी टिप्पणियों का एक संचयन ‘दि मीनिंग अव् सिविलाइज़ेशन’ के नाम से स्पीकिंग टाइगर ने प्रकाशित किया है. उनका सन्दर्भ मिस्र और मध्यपूर्व की राजनैतिक उथल-पुथल और उठापटक है.

मिस्र के सांस्कृतिक पुनर्जन्म के सिलसिले में वे बताते हैं कि वह कैसे हो इस पर कई रुख़ रहे हैं. कुछ का ख़याल था कि जड़ों की ओर वापस जाना चाहिये और कुछ और सोचते थे कि आधुनिकता को पूरी तरह अपनाने से ही पुनर्जन्म संभव है. एक रुख़ बीच का था कि जड़ों और आधुनिकता दोनों को मिलाकर कुछ कारगर हो सकता है. उनका स्पष्ट मत है कि ऐसा पुनर्जन्म बिना मानवीय प्रयत्न और विवेक के संभव नहीं है. मिस्रियों को वही चुनना चाहिये जो उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और उसकी सचाइयों से मेल खाता हो फिर वह जड़ों से आये या कि आधुनिकता से. दोनों ही स्रोतों से रस और सार्थकता खींचे जा सकते हैं पर वे अपने आप, बिना प्रयत्न के, नहीं आ जायेंगे. अन्ततः सभ्यता लोगों के आन्तरिक और सामाजिक व्यवहार को नियमित-संयमित करती है. हर सभ्यता को उसके भौतिक और आध्यात्मिक आधारों पर ही समझा और परखा जा सकता है. सभ्यताएं स्वायत्त होती हैं पर दूसरी सभ्यताओं से लेती-देती भी हैं. किसी सभ्यता के लोग अस्तित्व, जीवन और दूसरे लोगों के बारे में क्या सोचते और कैसे व्यवहार करते हैं इस पर, महफ़ूज़ के अनुसार, उस सभ्यता की सार्थकता निर्भर करती है. वे इस पर इसरार करते हैं कि किसी भी सभ्यता में जो नैतिक और सर्जनात्मक ऊर्जा होती है वह काफ़ी नहीं होती : ज़रूरी है कि ये लोग दूसरे लोगों से कैसे व्यवहार करते हैं फिर वे किसी भी वर्ण, भाषा और आस्था के क्यों न हों. महफ़ूज़ को बराबर यह एहसास है कि सभ्यता सिर्फ़ अपनों से नहीं दूसरों से व्यवहार की कला है. वे कहते हैं कि सभ्यता के लिए मनुष्य नहीं बना है, मनुष्य के लिए सभ्यता बनी है.

धर्म को लेकर भी विशेषतः उसमें उपजी असहिष्णुता और कट्टरता के मामले में महफ़ूज़ स्पष्ट हैं कि ऐसी वृत्तियों का कोई गहरा या सच्चा धार्मिक औचित्य नहीं है और ये सभी धर्म की ग़लत समझ या दुर्व्याख्या से उभरती हैं. उन्हें इसका लगातार खेद होता रहता था कि बुद्धि, स्वतंत्रता और अन्तःकरण से सामान्य जीवन का संबंध शिथिल होता गया है. उनका मत है कि इस क्षेत्र में राज्य और जन के बीच पारस्परिकता के बिना इस संबंध को सशक्त नहीं किया जा सकता.