इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर गुजरात में राजनीतिक हलचलें बढ़ चुकी हैं. इस बीच, उना की घटना के एक साल बीतने के बाद राज्य में दलितों के खिलाफ हिंसा की एक के बाद एक कई खबरें सामने आईं. इन घटनाओं को लेकर जमीन से लेकर सोशल मीडिया पर भी कई तरह से विरोध दर्ज किए जा रहे हैं. बीते रविवार को गुजरात के आणंद में ऊंची जाति (पटेल) के लोगों ने दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले 21 वर्षीय युवक जयेश सोलंकी की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी. बताया जा रहा है कि जयेश गरबा देख रहा था और इस पर दूसरे समुदाय के लोगों ने आपत्ति की थी. इसके अलावा दलित युवकों द्वारा मूंछ रखने को लेकर उनकी पिटाई किए जाने के कई मामले सामने आ रहे हैं.

गुजरात से लगातार आ रही इन खबरों पर देश के अखबारों ने संपादकीय के जरिए सवाल उठाने के साथ चिंता भी जाहिर की. देश में छपने वाले प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों की बात करें तो इस मामले में अंग्रेजी के अखबारों ने हिंदी अखबारों की तुलना में कहीं मुखर होकर अपनी बातें रखीं हैं. हिंदी में केवल जनसत्ता ने इस मुद्दे पर संपादकीय लिखा. इसके अलावा बाकी अखबारों में संपादकीय के रूप में यह महत्वपूर्ण मुद्दा जगह नहीं पा सका. अंग्रेजी के अखबारों में द इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे.

जनसत्ता ने दलित उत्पीड़न की घटनाओं का जिक्र करते हुए गुजरात के विकास मॉडल पर सवाल उठाया है. तीन अक्टूबर को प्रकाशित अखबार का संपादकीय कहता है कि क्या विकास का मतलब बस यही कुछ होता है या फ्लाइओवर, बड़े बांध, विदेशी निवेश. या फिर सौहार्द और सामाजिक समता भी इसकी कसौटी है? विकास के साथ-साथ अखबार ने राज्य में हिंदुत्व के प्रयोग पर भी सवालिया निशान लगाया है. संपादकीय में कहा गया है कि क्या हिंदुत्व की अब तक यही उपलब्धि रही है कि सूबे में दलित खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं. कुल मिलाकर देखें तो अखबार का संपादकीय संविधान में दलितों को दिए गए अधिकारों की बात करते हुए गुजरात के विकास और हिंदुत्व की अवधारणा को कटघरे में खड़ा करता है. हालांकि, कानून-व्यवस्था को लेकर वह राज्य सरकार की सीधी जवाबदेही की बात इसमें नहीं करता है.

उधर, तीन अक्टूबर को प्रकाशित द टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकीय में जनसत्ता के उलट दलितों के उत्पीड़न के मामलों में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाया गया है. अखबार का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से जुड़े मामलों में एक बुरा पक्ष यह है कि इनमें पुलिसकर्मी पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय आरोपितों को ही बचाने में लग जाते हैं. अखबार का आगे कहना है कि संविधान में दलितों का उत्पीड़न रोकने के लिए सख्त प्रावधान होने के बावजूद जमीनी स्तर पर नियम-कानूनों को लागू करने में कई तरह की खामियां हैं. पीड़ितों को न्याय मिल सके इसके लिए अखबार ने पुख्ता कदम उठाने की पैरवी की है.

द इंडियन एक्सप्रेस ने इन घटनाओं की सीधी जिम्मेदारी राज्य की भाजपा सरकार पर डाली है. चार अक्टूबर को प्रकाशित इसके संपादकीय में कहा गया है कि लोगों को यह संदेश देना कि सरकार जाति आधारित उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेगी, विजय रुपाणी सरकार की जिम्मेदारी है. हालांकि, इस संपादकीय में बीते साल हुई उना घटना के बाद राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून-1989 के तहत दर्ज मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए 16 विशेष अदालतें गठित को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है. इस संपादकीय के आखिर में कहा गया है कि सूबे में सामाजिक शांति के लिए इस तरह की हिंसा पर ध्यान देना जरूरी है.

अंग्रेजी के एक और प्रमुख अखबार हिंदुस्तान टाइम्स ने गुजरात के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी दलित उत्पीड़न पर सवाल उठाया है. अखबार ने अपने संपादकीय में इन घटनाओं को एक ऐसे देश के लिए शर्मनाक करार दिया है जो सुपर पावर बनने की उम्मीद में है. अखबार ने राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए किए जाने वाले प्रतीकात्मक कामों, जैसे - दलितों के घर भोजन करना आदि की भी आलोचना की है. उसका कहना है कि इनसे जमीन पर जो भयावह स्थिति है, उसमें कुछ भी बदलाव नहीं होगा. इसके साथ ही अखबार का मानना है कि जाति आधारित उत्पीड़न की समस्या कानून व्यवस्था से संबंधित न होकर सामाजिक है. इससे निपटने के लिए अखबार ने कानून को सख्ती से लागू करने के साथ ही दलितों के सशक्तीकरण के लिए कदम उठाने पर जोर दिया है.