केरल के कन्नूर में बीते हफ्ते एक रैली थी. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इसको संबाेधित कर रहे थे. स्वाभाविक तौर पर इसमें उन्होंने राज्य की पिनरायी विजयन सरकार काे निशाने पर लिया. मुख्यमंत्री विजयन की आलोचना करते हुए उन्होंने आरोप लगाए कि विजयन सरकार राज्य में आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)-भाजपा के कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने में नाकाम रही है. शाह ने दावा किया कि अब तक राज्य में भाजपा-आरएसएस के क़रीब 120 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है.

इस रैली का आयोजन भाजपा की जनरक्षा यात्रा की शुरुआत के मौके पर किया गया था. यह यात्रा केरल के 14 में से 11 जिलाें से गुजरने वाली है. 17 अक्टूबर को यह राजधानी तिरुअनंतपुरम में एक बड़ी रैली के साथ पूरी होगी. जनरक्षा यात्रा की अगुवाई राज्य भाजपा के अध्यक्ष कुम्मनम राजशेखरन कर रहे हैं. लेकिन इसमें अन्य राज्यों के भाजपा नेताओं को भी बुलाया जा रहा है.

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इस क्रम में शाह के बाद अगले दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कन्नूर में ही एक और रैली को संबोधित किया. इसमें भी उन्होंने राज्य में भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या का मसला उठाया. उन्होंने कहा, ‘राज्य में अब तक भाजपा-आरएसएस के 283 कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या की जा चुकी है.’

यानी शाह ने जो तादाद बताई थी उसके दोगुने से ज़्यादा आंकड़ा योगी ने दिया. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दोनों नेताओं में से किसी ने भी यह नहीं बताया कि जो आंकड़ा वे बता रहे हैं वह कब से कब तक का है.

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जनरक्षा यात्रा के मुद्दे

जनरक्षा यात्रा में भाजपा-आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याओं के साथ ही विजयन सरकार की असफलताओं को भी ख़ास तौर पर सामने लाने की कोशिश की जा रही है. इसके अलावा पार्टी का एक अन्य पसंदीदा मुद्दा ‘लव जिहाद’ भी जोर-शोर से उठाया जा रहा है. इसके ज़रिए हिंदुत्व के मुद्दे को भी भुनाने का प्रयास भी किया जा रहा है. क्योंकि ‘लव जिहाद’ का मामला फिलहाल मुख्य रूप से हिंदू संगठनों के प्रमुख मसलों में शुमार होता है. इसमें आरोप यह होता है कि मुस्लिम युवक एक साज़िश के तहत अन्य धर्मों की लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाते हैं, उनसे शादी करते हैं और उनका धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें मुस्लिम बना देते हैं.

लड़ाई का केंद्र कन्नूर

भाजपा ने अपने संघर्ष के केंद्र में कन्नूर को ख़ास तौर पर रखा है. इसका प्रमाण अमित शाह के बयान में कन्नूर के विशेष जिक्र से भी मिलता है. उन्होंने जनरक्षा यात्रा की शुरुआत के मौके पर हुई रैली में कहा, ‘कन्नूर में ही भाजपा-आरएसएस के 84 से ज़्यादा कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं. मैं पिनरायी विजयन से पूछना चाहता हूं... इन लोगों को किसने मारा?’

राजधानी तिरुअनंतपुरम से करीब 500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कन्नूर का भाजपा के लिए ख़ास महत्व है. यह जिला वामपंथियों का गढ़ माना जाता है. इसके अलावा पिछले कई दशक से यह राजनीतिक हत्याओं के लिए भी कुख़्यात रहा है. संभवत: इन्हीं वज़हों से आरएसएस ने भी इसी जिले को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया हुआ है. पिछले कई दशक से भाजपा की यह मातृ संस्था यहां अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है.

1960 का दशक तो कन्नूर में ऐसा रहा जब राजनीतिक संघर्षों में क़रीब-क़रीब सभी दलों के कार्यकर्ताओं का खून बहा. इनमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भाजपा-आरएसएस, कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, जनता दल और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा सभी के कार्यकर्ता शामिल थे. यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है.

राजनीतिक हत्याओं का आधिकारिक आंकड़ा क्या कहता है?

दावे और आरोप अपनी जगह हैं. और इनके अपनी जगह होने की वजह यह है कि अब तक पूरे राज्य में राजनीतिक हत्याओं का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन जहां तक कन्नूर की बात है तो 101रिपोर्टर्सडॉटकॉम नामक एक वेब पोर्टल ने सूचना के अधिकार के तहत स्थानीय पुलिस से कुछ जानकारी हासिल की. इसके मुताबिक जिले में भाजपा और आरएसएस ही नहीं वाम दलों के कार्यकर्ताओं की भी लगभग बराबर संख्या में हत्या हुई है. 2000 से 2016 तक जिले में कुल 69 राजनीतिक हत्याएं हुईं. इनमें वाम दलों के 30 और भाजपा-आरएसएस के 31 कार्यकर्ता थे. पिछले साल यानी 2017 में भी यही स्थिति थी जब भाजपा-आरएसएस के चार कार्यकर्ताओं की हत्या हुई जबकि माकपा के तीन. यानी एक ज़्यादा.

हालांकि भाजपा के आक्रामक अभियान के बाद माकपा भी अपना बचाव करती हुई नज़र आ रही है. बीते बुधवार को ही उसने एक फैक्टशीट ज़ारी की है. इसमें बताया गया है कि राजनीतिक संघर्षों में भाजपा-आरएसएस की तुलना में उसके ज़्यादा कार्यकर्ताओं की मौत हुई है. फैक्टशीट में केरल पुलिस के आंकड़ों का हवाला दिया गया है. इसके मुताबिक 2000 से 2017 के बीच वाम दलों क 85 कार्यकर्ता राजनीतिक संघर्ष में मारे गए जबकि भाजपा-आरएसएस के सिर्फ 65.

तो क्या भाजपा झूठ फैला रही है?

यानी जितने और जो भी आंकड़े उपलब्ध हैं उन्हें देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का अांकड़ा कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बता रही है. कभी भाजपा की ही कन्नूर इकाई के अध्यक्ष रहे ओके वासु भी कहते हैं, ‘उन्हें (भाजपा के बड़े नेताओं) तो यह भी नहीं पता कि उनकी पार्टी के कितने कार्यकर्ता मारे गए. लेकिन वे आंकड़े गिना रहे हैं. इससे साबित होता है कि वे जानबूझकर झूठ फैला रहे हैं. राजनीतिक फायदे के लिए ग़लतफहमी फैला रहे हैं.’

वासु 2014 में माकपा में शामिल हो चुके हैं. वे आगे कहते हैं, ‘कन्नूर में 1967 से 2017 तक भाजपा और संघ परिवार के 59 कार्यकर्ता मारे गए. इनमें से आठ तो बम बनाते समय हुए हादसे में मारे गए, जबकि दो अन्य की हत्या राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने की. वहीं दूसरी तरफ माकपा ने कन्नूर में भाजपा के मुकाबले कहीं ज्यादा कार्यकर्ता खोए हैं. ऐसे में हमारी राज्य सरकार से अपेक्षा है कि वह एक पैनल बनाए. वह पैनल यह पता लगाए कि अब तक राज्य में किस संगठन के कितने कार्यकर्ता राजनीतिक संघर्ष में मारे गए हैं. असल आंकड़े सामने आएंगे तो उनके (भाजपा नेताओं के) झूठ का अपने आप भांडा फूट जाएगा.’