इस पुस्तक की एक कविता ‘दादी’ की कुछ पंक्तियां : ‘दादी, और कुछ भी न दे सका मैं तुझे / बस सुनाए अपने साथ फिल्मी गीत लोकगीत रेकार्ड टेप दुनिया भर के / कूट चर्चाएं अनुसन्धान की साहित्य की. कराए भोजन आधार आसरा / दीवार पकड़े चलते-चलते फेरने दिया हाथ रुआंसा सिर पर / ठूंठ का पल्लव से स्पर्श, और आखिर में पूरी की पूरी ज़िद घर वापस लौटने की / रोज़ करती थी तैयारी अन्धे हाथों से, टालते-टालते महीना-भर बड़ी मुश्किल से पहुंचाया आखि़र / बचपन में जैसे तूने मुझे वैसे मैंने तुझे गोद में उठाए घर में / दुबारा नहीं हुआ मिलना ख़बर दी मुंशी ने फोन आने की / आप की ग्रैंडमदर गुज़र गई कल शाम को, बहुत याद कर रही थी, कहा है. / दादी, मर गई तू पर न कोई रोया न आया किसी का गला भर / दिखाई दी तेरी टूटी खटिया लहंगा चोलियां जस्ते की थाली / जिसकी मीठी रोटी नोचकर खाते थे आराम से बच्चे बिल्ली के / और ताक में अनेक सालों के वैधव्य की गवाह दांत टूटी कंघी लकड़ी की / जिसमें फंसे श्वेत धवल बाल चिपक गए कसकर मेरी उंगलियों से / दादी, इक्यानवे सालों का तेरा उपला बन गया राख हमारे परिवार के दहकते भानचूल्हे में.’


कविता संग्रह : देखणी

लेखक : भालचन्द्र नेमाड़े

अनुवादक : डॉ गोरख थोरात

प्रकाशक : राजकमल

कीमत : 250 रुपये


कम शब्दों में गहरी और मार्मिक बात कहना एक कला है, जो अक्सर कविता विधा के जरिए सबसे सटीक तरीके से साधी जाती है. जब यह सधे हुए अंदाज में सामने आती है तो जादू करती है; लेकिन यदि भाषा अर्थ या संप्रेषणीयता, किसी एक भी स्तर पर चूक जाए तो खलिश पैदा करती है. ‘देखणी’ महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित लेखक भालचन्द्र नेमाड़े का काव्य संग्रह है, जिसे पढ़ते हुए कुछ ऐसी ही खलिश का अनुभव होता है. मराठी भाषा की इन कविताओं का अनुवाद डॉ गोरख थोरात ने किया है.

‘देखणी’ कोंकण में स्थानीय आबादी के बीच पुर्तगालियों के संपर्क से जन्मे लोकनृत्य का नाम है. लेखक ने कोंकण प्रवास के दौरान लिखी कविताओं को इस संग्रह में संकलित किया है. देखणी नाम के लोकनृत्य के प्रति अपने प्रेम के कारण इस संग्रह का नाम उन्होंने ‘देखणी’ रखा है. लेकिन आश्चर्य की बात है कि न तो संग्रह में इस नाम या नृत्य से जुड़ी कोई कविता है और न ही खास गोवा के परिवेश की झलक लिये ही कोई कविता यहां आपको मिलेगी.

कविताओं के विषय में विविधता काफी सुखद लगती है. लेकिन संग्रह की ज्यादातर कविताएं समझ में आने के स्तर पर चूकती हैं, इस कारण यह संग्रह रोचकता नहीं जगा पता. हालांकि कुछ कविताएं काफी मार्मिक हैं और भीतर तक छूने में सफल होती हैं, जैसे – ‘मास्साब’, ‘कसाईख़ाना’, ‘विदाई’, ‘खुदकुशी’, ‘मकड़जाल’, ‘वजूद’ और ‘दादी’ आदि. ‘मकड़जाल’ कविता में रोजी-रोटी की तलाश में गांव छूट जाने की तकलीफ बताते हुए भालचन्द्र लिखते हैं - ‘साल भर में पत्र मिले चार-पांच / तकाज़ा करने वाले उधार लौटाने का / डाकघर देखा तभी जब-जब किया मनी ऑर्डर. / स्वांग रचा मैंने / पराया नहीं, हूं मानो गांव का ही / कपड़े सिलाए, दोस्त बनाए दस-बीस / और इतने में गांव छूटा. / प्रणाम. / सपना था ध्वस्त / क़िले के गांव का.’

भालचन्द्र नेमाड़े की कविताओं में कई जगह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष व्यंग्य हैं जो पाठकों को नश्तर से चुभते हैं. यही चुभन इन कविताओं की सार्थकता है. जैसे ‘सन 1966’ नामक कविता में एक जगह कवि बच्चे को आज के जिन संदर्भों में मजबूत बनाने को कहते हैं, वह बेहद तंज भरा है. वे लिखते हैं - ‘मांस के दिशाशून्य आवरण में लपेटे शिशु को तेरे / सिखाए रखना करोड़ों पीढ़ियों का कोख से रिश्ता / प्रसव के वक़्त उसके कम हो यातनाएं तुम्हें / मज़बूत दांत हों अन्दरूनी बाहरी / मज़बूत फेफड़े सिगरेट के लिए और पक्का लीवर शराब के लिए / बुद्धि हो नाकामी के थपेड़े सहने लायक / समझ हो बड़े-बुजुर्ग़ों को सहने जितनी / पौरुष हो बीवी को संभालने जितना / वरना बेकार हैं कई जनम बिना इनके सभी ओर / बेकार न हो नाल शिशु का / बड़ा कठिन है समय बाहर.’

आज के दौर में जहां हर कोई अपने वजूद को सबसे ज्यादा अहमियत देने में लगा है, भालचन्द्र नेमाड़े परिवार के बिना अपने वजूद को खतरे में पाते हैं. वे मानते हैं कि व्यक्ति का परिवार के बिना अलग से कोई अस्तित्व नहीं है. ‘वजूद’ नामक कविता में वे कहते हैं - ‘गुज़रते दिन अपनी राह से / बीच-बीच में कोई पूछता है किसी शाम / जुड़ जाता है वह मूल सुर से / दिन समेत, रास्ते समेत, पूछने समेत, उस सुर समेत / यदि बता पाए एक वाक्य में तो बताओ. / बाप हमारा खेती बेचेगा, घर बेचेगा, पैसा बेचेगा / खरीददार हैं. लेकिन फिर भी बहुत कुछ है समेत मेरे / जो बचेगा ही / बाप के बिना मां नहीं, मां के बिना हम नहीं / हमारे बिना कुछ नहीं’.

भालचन्द्र नेमाड़े ने अपनी कविताओं में जिंदगी के कतरों को भी समेटा है, तो मौत से पैदा हुई खलिश को भी. इंसानों के भीतर गहरे दबे मनोभावों को भी उन्होंने पकड़ा है तो जानवरों की संवेदनाओं को भी करीब से देखा-समझा व दर्ज किया है. ऐसी ही एक बेहद छूने वाली कविता है, ‘कसाईख़ाना’. इसमें कवि ने जिस सूक्ष्मता से कसाईखाने में एक बकरे के काटे जाने का बेहद जीवंत वर्णन किया है, वह गौर किये जाने लायक है -

‘झर जाने पर एक बार आंखों का पानी बचता ही क्या है सिवा मांस के? / लगेगा कब फल गर्दन से कब होगी पीड़ा धड़ से अलग हिकरकर जीने की?/ तेज़ छुरे हैं तैयार अब देखना तू छुटकारा घड़ी भर में / रस्सी खोल खींच लड़के आती है चुपचाप पगली गूंगी जान पीछे-पीछे / खींच भीतर लगा अरगल, बांध दे सारे पैर सारे खुर कस ज़ोर से, ऐसा! / गिर रहा है धड़ लकड़ी लगा उधर से गर्दन के नीचे / नकेल पकड़ सींग पहले संभाल भडुए, चला दूं छुरा? एक ही घाव / कट गया गला फौआरा-दूर हट बहने दे तेज़ी से धार ख़ून की / तड़फड़ाता है कैसा-तड़तड़ाती हैं सारी टीसें चारों खुरों की गांठ पर /...नथूने की नकेल रहने दे ज़रा, मुंडी फोड़ने में आएगी काम गंड़ासे के वार से / आ गई ज़बान बाहर अपने आप, निकाल और लटका दे हुक में / हो गया काम ठंडा हो गया. निकाल कुल्हाड़ी छांट गर्दन जल्दी कर / पूंछ उड़ा छाट खुद दो उंगली ऊपर. करके टांगें अलग लटकाता हूं मै एकेक / लगा चीरा पेट के नीचे सरसर, खाल उतार, लाश को कर उलटा, समेट चमड़ा’.

पद्मश्री और ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित लेखक भालचन्द्र नेमाड़े की बहुत सी रचनाओं के अनुवाद अनेक भारतीय भाषाओं में हो चुके हैं. यह कविता संग्रह उनके विस्तृत लेखकीय सरोकारों से तो हमें रू-ब-रू कराता है, लेकिन ज्यादातर कविताएं समझ नहीं आने के कारण उदास करती हैं. कविताओं का अनुवाद एक जटिल काम है, लेकिन गोरख थोरात ने यहां उसे काफी हद तक साधने की कोशिश की है. लेकिन कहीं कुछ चूक जाता है जिससे आम पाठकों के अंर्तमन तक ये कविताएं नहीं पहुंच पातीं, यह बात बेहद निराशाजनक है.