लगता है कि अब बिना सर्किट के मुन्ना भाई को राजकुमार हिरानी नहीं मिल पाएंगे!

संजय दत्त की कमबैक फिल्म ‘भूमि’ क्या फ्लॉप हुई, संजू बाबा हमेशा के लिए भूमिगत होने से बचने के लिए वापस हिरानी की शरण में हाथ जोड़कर पहुंच गए हैं. जेल से बाहर आने के बाद से ही संजय चाहते तो रहे हैं कि हिरानी उनके साथ ‘मुन्नाभाई’ का अगला भाग बनाएं और उनके डूबते करियर को तिनके का नहीं टाइटेनिक का सहारा दें. लेकिन हिरानी अभी तक उनकी ही बॉयोपिक में व्यस्त थे जिस वजह से संजय को अपना कमबैक बंजर ‘भूमि’ से करना पड़ा. भविष्य के लिए भी उनके पास ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ व अजय देवगन की एक अनाम फिल्म जैसी मल्टीस्टारर फिल्में ही बची हैं और इसीलिए, खबर है, कि चिंता में गले तक डूबे संजय दत्त जल्द से जल्द ‘मुन्नाभाई 3’ शुरू करवाने के लिए हाथ धोकर हिरानी के पीछे पड़ गए हैं.

रणबीर कपूर अभिनीत ‘संजू’ की भी शूटिंग हिरानी जल्द पूरी करने वाले हैं जिस वजह से संजय चाहते हैं कि हिरानी अगली फिल्म ‘मुन्नाभाई 3’ ही बनाएं. लेकिन डूबते सूरज को सलामत बचाने से पहले फिल्म इंडस्ट्री के अच्छे लोग भी उगते सूरज को पहले सलामी देते हैं. शायद इसीलिए इस तरह की रिपोर्ट्स तेजी से सामने आ रही हैं कि हिरानी अपनी अगली फिल्म या तो आमिर खान के साथ करने वाले हैं या फिर शाहरुख खान के. जहां एक तरफ ‘मुन्नाभाई’ और ‘3 इडियट्स’ के लिए हिरानी की पहली पसंद शाहरुख थे, और वे हमेशा शाहरुख के साथ काम करना चाहते रहे हैं, वहीं आमिर भी चाहते हैं कि हिरानी ‘3 इडियट्स’ का सीक्वल बनाएं और उनकी जोड़ी एक बार फिर ‘पीके’ की तरह बॉक्स-ऑफिस पर कब्जा जमा ले.

अब ऐसी परिस्थितियों में तो ‘मुन्नाभाई’ की तीसरी फिल्म एक ही कीमत पर बन सकती है. अगर संजू बाबा सर्किट को भेजकर ऱाजकुमार हिरानी को किडनैप करवा लें और...!

ऐश्वर्या राय के नखरे बड़े महंगे हैं!

राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा प्रोड्यूस की जा रही ‘फन्ने खां’ एक बड़े संकट से गुजर रही है! फिल्म में अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय और राजकुमार राव की मुख्य भूमिकाएं हैं, और कुछ वक्त पहले सभी को यह बात पसंद आई थी कि इस फिल्म में ऐश्वर्या के अपोजिट राजकुमार राव नायक हैं. बहरहाल, फिल्म के हाल इसलिए बेहाल हैं क्योंकि अनिल कपूर और राजकुमार राव ने तो अपने-अपने हिस्से की शूटिंग अलग-अलग शुरू कर दी है, लेकिन ऐश्वर्या राय ने अपनी पहले ही दिन की शूटिंग कैंसिल करा दी है!

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके लिए जो कपड़े तैयार करवाए गए थे वो विश्व सुंदरी को पसंद नहीं आए. फिल्म में ऐश एक सिंगर बनी हैं जिनकी स्टाइलिंग अंतरराष्ट्रीय स्तर की पॉप सिंगर बियोंसे को ध्यान में रखकर की गई है. लेकिन मनीष मल्होत्रा के ये कपड़े ऐश को कम स्टाइलिश और ज्यादा भारतीय लगे, इसलिए शूटिंग रोक दी गई और यह अब तब तक शुरू नहीं होगी जब मनीष मल्होत्रा सारे परिधान फिर से ऐश की इच्छा अनुसार सिलवा लेंगे!

क्यों? क्योंकि महाव्यस्त ऐश ने फिल्म के पहले शूटिंग शेड्यूल के लिए मुश्किल से छह-सात अक्टूबर को दो दिनों का वक्त निकाला था, जोकि उनके नखरे उठाने में ही जाया हो गए. अब आठ अक्टूबर को ऐश्वर्या करवाचौथ मनाएंगी और उसके बाद ससुर अमिताभ बच्चन का जन्मदिन सेलिब्रेट करने के लिए सपरिवार लंबी छुट्टियों पर मालदीव चली जाएंगी. लौटकर दिवाली की खुशियों में शरीक होंगी और उसके बाद ही ‘फन्ने खां’ के निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा को थोड़ी राहत की सांस आएगी!


‘दर्शकों में अब एक सकारात्मक बदलाव आ रहा है और इसी वजह से फिल्में सिर्फ मनोरंजन देने के लिए नहीं बन रही हैं. अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की उन्हें खूब जानकारी है जिसके चलते कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा उनकी पसंद बन चुका है. न सिर्फ मेरी बल्कि राजकुमार राव की भी फिल्में इसीलिए चल रही हैं क्योंकि दर्शक इवॉल्व हो चुके हैं.’

— इरफान खान, अभिनेता

फ्लैशबैक | बॉलीवुड में बीआर चोपड़ा को स्थापित करने वाली उस फिल्म का किस्सा जिसे लाहौर में बनना था लेकिन ऐसा हो न पाया

कालजयी टीवी सीरियल ‘महाभारत’, और फिल्म ‘नया दौर’ निर्देशित और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्मों का निर्माण करने वाले बीआर चोपड़ा (1914-2008) पहले-पहल पेशे से फिल्म पत्रकार थे. रहते लाहौर में थे और ये आजादी से पहले की बात है. कॉलेज के दिनों से ही वे फिल्मों पर लिखा करते थे और कई मैग्जीन में उनकी समीक्षाएं और लघु कहानियां छपती थीं. उनके पिता उन्हें सरकारी अफसर बनाना चाहते थे लेकिन आईएएस की परीक्षा वे प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण नहीं कर पाए और दोबारा कोशिश करने से उन्होंने पिता को मना कर दिया था.

इसी दौरान, कॉलेज खत्म होने के बाद उनके लेखों से प्रभावित होकर एक सज्जन ने उन्हें अपनी उस फिल्म पत्रिका के लिए संपादक की नौकरी ऑफर की, जिसे वो शुरू करना चाहता था. इस तरह बिना किसी अनुभव के बलदेव राज चोपड़ा सिने हैराल्ड नामक फिल्म मैग्जीन के एडीटर बने और शुरुआती छह महीनों में ही यह पत्रिका न सिर्फ पाठकों द्वारा पसंद की जाने लगी बल्कि बीआर चोपड़ा भी बतौर एक अच्छे लेखक स्थापित होने लगे.

कुछ समय बाद, पिता के कुछ दोस्तों ने बलदेव को सवाल के रूप में यह सुझाव दिया कि चूंकि उन्होंने मिलकर इनवेस्ट करने के लिए थोड़ा धन जमा किया हुआ है, तो क्या वे उस पैसे से कोई फिल्म बनाना पसंद करेंगे. बलदेव तब तक लाहौर की कई फिल्मी हस्तियों को जानने लगे थे (आजादी से पहले हिंदुस्तान में फिल्म निर्माण मुख्यत: चार शहरों में होता था – बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता और लाहौर) इसलिए हाथ आए इस मौके को उन्होंने जाने नहीं दिया. जल्द ही फिल्म निर्माण का शून्य अनुभव होने के बावजूद अपने निर्देशन में ‘चांदनी चौक’ नाम की फिल्म की शूटिंग शुरू की, जिसमें तब के मशहूर संगीतकार गुलाम अहमद चिश्ती ने संगीत दिया. (बाबा चिश्ती बाद में चलकर पाकिस्तानी फिल्म संगीत के संस्थापकों में गिने गए और उनकी शागिर्दी में ही खय्याम ने फिल्म संगीत सीखा था)

लेकिन ‘चांदनी चौक’ के निर्माण के दौरान ही हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे की वजह से लाहौर में दंगे भड़क उठे. माहौल इतना खराब हुआ कि दो अगस्त 1947 को अपनी फिल्म मैग्जीन का आखिरी अंक निकालकर बलदेव को हमेशा के लिए नए वाले हिंदुस्तान रवाना होना पड़ा - पीछे अपना बरसों पुराना घर और एक अधूरी बनी फिल्म छोड़कर.

बंटवारे के बाद का शुरुआती वक्त फिर, बीआर चोपड़ा ने जालंधर में बिताया, और 20-25 की संख्या वाले अपने भरे-पूरे परिवार सहित, जिसमें यश चोपड़ा भी शामिल थे, कुछ वक्त बाद बॉम्बे आ गए. आने के कुछ समय बाद उखड़े हुए पैर फिर से जमाने के लिए ‘कुदरत’ (1947) नामक फिल्म का निर्माण किया जो कि बहुत बुरी तरह फ्लॉप हुई. कहते हैं कि इस फिल्म ने उन्हें व उनके परिवार को पूरी तरह दिवालिया कर दिया था और बलदेव ने फिल्मों से हमेशा के लिए तौबा कर बतौर पत्रकार नौकरी तलाशनी शुरू कर दी थी.

लेकिन इसी बीच, आईएस जौहर की सुनाई एक कहानी उन्हें इतनी पसंद आई कि उस पर फिल्म बनाने के लिए बलदेव ने फिर से फाइनेंसर ढूंढ़ना शुरू कर दिया. किस्मत से पैसा लगाने वाला फाइनेंसर जल्द मिला भी, जो उन्हें लाहौर के दिनों से जानता था, लेकिन उसकी इकलौती शर्त थी कि फिल्म को बीआर चोपड़ा ही निर्देशित करेंगे.

इस तरह, एक बार फिर, अनुभवहीन बीआर चोपड़ा ने अशोक कुमार के डबल रोल वाली ‘अफसाना’ (1951) निर्देशित की जो कि न सिर्फ हिट हुई बल्कि बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री ने भी इस हिट फिल्म के निर्देशक के लिए अपने दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए. तुरंत ही कई नयी फिल्मों को निर्देशित करने के ऑफर उनके पास आने लगे, लेकिन चूंकि पाकिस्तान में अधूरी बनी छोड़ आए फिल्म को बीआर चोपड़ा अभी भी भूले नहीं थे, इसलिए अपनी दूसरी निर्देशकीय फिल्म उन्होंने वह बनाई जो होनी उनकी पहली थी. ‘चांदनी चौक’ इस बार मधुबाला की मुख्य भूमिका से सजकर धूमधाम से 1954 में रिलीज हुई और जबरदस्त हिट रही.

इतिहास गवाह है कि इसी ‘चांदनी चौक’ की सफलता के बाद बलदेव राज चोपड़ा बीआर फिल्म्स की नींव रख पाए, और दिलीप कुमार अभिनीत इस बैनर की पहली फिल्म ‘नया दौर’ (1957) ने बीआर चोपड़ा की जिंदगी में भी एक नए दौर की शुरुआत की.