राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने पिछले हफ्ते जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदी लगाने का आदेश जारी किया है. इस आदेश पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और देश की राजधानी में लोकतांत्रिक तरीके असहमति जताने की गुंजाइश सिमटने पर चिंता जताई जा रही है. ये सवाल और चिंताएं बिल्कुल वाजिब हैं.

एनजीटी ने केंद्रीय दिल्ली के इस इलाके के आसपास बसे लोगों की याचिका पर यह फैसला सुनाया है. याचिका में कहा गया था कि विरोध प्रदर्शनों के चलते यहां ध्वनि प्रदूषण होता है और इससे यहां रहने वाले लोगों को असुविधा होती है. एनजीटी ने इन वजहों को सही माना है और दिल्ली सरकार समेत संबंधित प्रशासनिक इकाइयों को निर्देश दिया है कि चार हफ्ते के भीतर प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर से हटाकर अस्थायी धरनास्थल रामलीला मैदान में भेजा जाए. एनजीटी के इस फैसले को चुनौती मिलना जरूरी है. और जब तक इस फैसले पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता यहां मौजूद प्रदर्शनकारियों को प्रदर्शन करने की अनुमति मिलनी चाहिए.

एनजीटी ने यह पाबंदी तीन आधारों पर लगाई है : पहला आधार यह कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के लिए कोई आधिकारिक स्थल नहीं है. यानी ऐसा कोई सरकारी आदेश नहीं है जो इसे प्रदर्शन स्थल घोषित करता हो; दूसरा आधार यह कि दिल्ली के मास्टर प्लान के मुताबिक जंतर-मंतर रोड आवासीय इलाका है और इसका किसी दूसरे मकसद के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता. इसके साथ ही एनजीटी ने माना है कि प्रदर्शनकारियों के कारण इलाके में प्रदूषण, खासकर ध्वनि प्रदूषण फैलता है. इस तीसरे आधार के पक्ष में कहा गया है कि आंदोलनकारी लाउड स्पीकर और बैंड-बाजे का मनमाना इस्तेमाल करते हैं तो वहीं दूसरी तरह की गंदगी भी फैलाते हैं.

हालांकि यह फैसला देते हुए एनजीटी ने इस बात की पूरी उपेक्षा कर दी कि मास्टर प्लान और नगर नियोजन के नियम स्थायी नहीं होते. शहर जैसे-जैसे विकसित होते हैं, उसी हिसाब से इनमें बदलाव भी होते रहते हैं. हर शहर की अपनी एक जीवंतता होती है. इसे सालों पहले बने एक मास्टर प्लान, जिसमें कई खामियां हों, के तहत बांधना एक बेकार की कवायद है.

पहले ऐसे प्रदर्शन इंडिया गेट के पास बोट क्लब के खुले मैदान में होते थे. लेकिन जब सुरक्षा कारणों से यहां प्रदर्शनों पर पाबंदी लगी तो धीरे-धीरे जंतर-मंतर ऐसे स्थल के रूप में उभरा जहां देशभर के लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपनी असहमति जताते हुए प्रदर्शन कर सकते थे. जंतर-मंतर संसद के नजदीक है. अगर कोई संसद के आसपास विरोध जताना चाहता है तो उसके लिए यह स्थान बिल्कुल उचित है. जबकि रामलीला मैदान यहां से अपेक्षाकृत दूर भी है और यह शहर की तंग बसाहट के बीच स्थित है.

हाल के सालों में जंतर-मंतर कई असरदार नागरिक आंदोलनों का गवाह रहा है. अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, रोहित वेमुला को न्याय दिलाने की मांग हो या फिर भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला हो, पूरे देश ने इन मुद्दों को जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों के जरिए समझने की कोशिश की है. ये प्रदर्शन भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रतीक हैं और इन्होंने देश की सार्वजनिक संस्थाओं और विधायिका को नागरिकों के अधिकारों और उनकी चिंताओं की तरफ ध्यान देने के लिए मजबूर किया है.

यही वजह है कि एनजीटी के ताजा आदेश की समीक्षा होनी चाहिए. इसमें ध्यान रखा जाए कि कानूनों की व्याख्या तर्कसंगत तरीके से हो ताकि वे घमंडी और लापरवाह सरकारों के खिलाफ नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार की राह में रोड़ा न बन पाएं. (स्रोत)