पिछले दिनों पूर्व वित्त मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखकर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र की भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की. उनके निशाने पर सबसे अधिक वित्त मंत्री अरुण जेटली रहे. सिन्हा ने उस लेख में यह विस्तार से बताया कि अर्थव्यवस्था कैसे बुरी हालत में पहुंच गई है. इसके बाद वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके अरुण शौरी ने भी अपनी ही पार्टी पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की बुरी हालत के लिए नोटबंदी और जीएसटी जिम्मेदार हैं.

इसके बाद सरकार ने भी इन नेताओं पर पलटवार किया. अरुण जेटली ने एक पुस्तक के विमोचन के मौके पर कहा कि जो यशवंत सिन्हा आरोप लगा रहे हैं उनका खुद का कार्यकाल उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बुरा समय था. सिन्हा के बेटे और केंद्र में राज्य मंत्री की हैसियत से काम कर रहे जयंत सिन्हा ने भी एक जवाबी लेख लिखकर यह बताने की कोशिश की कि आर्थिक मोर्चों पर सरकार ने किस तरह से प्रभावी काम किया है. अरुण शौरी के आरोपों को भी निजी खुन्नस बताया गया. हालांकि सबके बावजूद पार्टी में आंतरिक तौर पर स्थिति यह है कि यशवंत सिन्हा के लेख या अरुण शौरी के बयान को लेकर कोई खास हलचल नहीं है. न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ऐसी कोई स्थिति है. पार्टी के कुछ नेताओं से अलग-अलग बात करने पर इसकी दो वजहें सामने आ रही हैं.

पहली वजह तो यह है कि पार्टी के अंदर यशवंत सिन्हा की स्थिति ठीक नहीं है. उनकी पहचान लालकृष्ण आडवाणी खेमे के नेता की रही है. अब जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में आडवाणी की स्थिति ही ठीक नहीं है तो फिर स्वाभाविक है कि यशवंत सिन्हा भी कमजोर हैं. दरअसल, 2014 का लोकसभा चुनाव वे भले न लड़े हों लेकिन झारखंड की राजनीति में वे सक्रिय रहे. पार्टी के एक नेता कहते हैं कि उनकी इच्छा झारखंड का मुख्यमंत्री बनने की थी. लेकिन वे इस पद के लिए नरेंद्र मोदी की पसंद बनने में नाकाम रहे.

दूसरी वजह यह है कि संघ के अंदर कभी भी यशवंत सिन्हा की छवि संगठन की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले नेता की नहीं रही. सिन्हा संघ की स्वयंसेवक परंपरा से भी नहीं हैं. उन्होंने राजनीति की शुरुआत जनता पार्टी से की थी. बाद में वे भाजपा में आए. जब वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री थे तो उस वक्त भी उनकी नीतियों को लेकर संघ और उसकी सहयोगी संगठनों में नाराजगी रहती थी. कुछ ऐसा ही अरुण शौरी के साथ भी है. उन्हें भी आडवाणी खेमे का नेता माना जाता है. कुल मिलाकर इन दो नेताओं के आलोचनात्मक रुख से भाजपा और संघ के अंदर कोई खास हलचल नहीं है.

लेकिन भाजपा पदाधिकारियों की मानें तो पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने अर्थव्यवस्था को लेकर जो चिंताएं जाहिर कीं और संघ के थिंक टैंक समझे जाने वाले एस गुरुमूर्ति ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लेकर जो चिंता जताई, उससे पार्टी और संघ में आंतरिक स्तर पर काफी खलबली है.

जीएसटी के क्रियान्वयन को लेकर काफी शिकायतें आ रही थीं. इसी परिप्रेक्ष्य में गुरुमूर्ति ने पिछले दिनों अपनी चिंताएं जाहिर कीं. जिस नोटबंदी को लेकर मोदी सरकार की खूब आलोचना होती है, उस पर गुरुमूर्ति काफी मजबूती से सरकार के साथ खड़े दिखते हैं. लेकिन जीएसटी पर उनके अलग रुख अपनाने से पार्टी और संघ में चिंता का माहौल है.

दरअसल, गुरुमूर्ति सक्रिय राजनीति में भले ही नहीं हों लेकिन संघ के कामकाज या यों कहें कि आर्थिक विचारों पर गुरुमूर्ति का खास प्रभाव रहता है. यह बात भाजपा, संघ और उसकी सहयोगी संगठनों में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ठीक से जानते हैं. ऐसे में जिस जीएसटी को मोदी सरकार अपनी ऐतिहासिक कामयाबी और आजादी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक सुधार कह रही है, उस पर गुरुमूर्ति द्वारा अलग रुख अपनाने से पार्टी और संघ में जीएसटी को लेकर चिंता की जा रही है.

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने विजयादशमी के सालाना संबोधन में सरकार की कई आर्थिक नीतियों की तारीफ की थी. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि छोटे व्यापारियों की चिंताओं का ख्याल भी सरकार को करना होगा. संघ और भाजपा में इसे संघ प्रमुख का जीएसटी को लेकर दिया गया संकेत माना जा रहा है. भागवत के भाषण का एक अंश कुछ ऐसा है जिसे सरकार के लिए उनकी तरफ से सलाह कहा जा सकता है. इसमें किसानों की चिंता करने की भी बात है. भाजपा में यह चर्चा चल रही है कि संघ प्रमुख के भाषण पर गुरुमूर्ति की चिंताओं का स्पष्ट असर दिख रहा थी.

भाजपा में जिन नेताओं से इस संवाददाता ने बात की, उनमें से किसी ने इस बात की पुष्टि तो नहीं की कि मोहन भागवत का यह भाषण गुरुमूर्ति से सलाह करके तैयार किया गया होगा लेकिन किसी ने गुरुमूर्ति से भागवत की आर्थिक विषयों पर चर्चा की संभावना को भी खारिज नहीं किया.

ऐसे ही सुब्रमण्यम स्वामी की बातों को लेकर भी चर्चा चल रही है. स्वामी केंद्र सरकार में किसी पद पर नहीं हैं. पार्टी में औपचारिक तौर पर उनके पास बड़ी जिम्मेदारी नहीं है. लेकिन पार्टी पदाधिकारियों, संघ और संघ के सहयोगी संगठनों में प्रमुख पदों पर बैठे लोग उनकी बातों को ध्यान से सुनते हैं. इस पृष्ठभूमि में स्वामी द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को लेकर जताई जा रही चिंताओं से इन लोगों के बीच में हलचल होना स्वाभाविक थी. स्वामी की बातों से हलचल बढ़ने की एक वजह यह भी रही कि पार्टी कार्यकर्ताओं और संघ स्वयंसेवकों के बीच भी स्वामी लोकप्रिय हैं. ऐसे में अगर वे सरकार के खिलाफ कुछ बोलते हैं तो इससे इन लोगों के बीच एक भ्रम की स्थिति बनने की आशंका पार्टी पदाधिकारियों और संघ के पदाधिकारियों की सता रही है.

लेकिन इन चिंताओं से निपटा कैसे जाए, इसे लेकर न तो पार्टी में कोई स्पष्टता है और न ही संघ के बारे में ऐसी कोई बात पार्टी पदाधिकारी बता पा रहे हैं. फिलहाल तो सरकार ने जीएसटी में कुछ सुधार कर दिए हैं. माना जा रहा है कि इनसे छोटे और मझोले कारोबारियों के साथ निर्यातकों को भी राहत मिलेगी. लेकिन जानकारों का मानना है कि सरकार को असली राहत तो तभी मिलेगी जब अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार दिखने लगेगा.