कोका कोला कंपनी में काम करने वाले किसी कर्मचारी से कभी पूछिये कि क्या वह पेप्सी पीता है? वह पेप्सी की इतनी बुराइयां गिनवा देगा कि आप फिर कभी जिंदगी में पेप्सी पीने के बारे में सोचेंगे नहीं. ठीक इसी तरह कभी पेप्सी के कर्मचारी से बात कीजिये तो वह कोका कोला के बारे में कुछ ऐसी ही राय रखता होगा.

कोला बाजार पर लड़ी लड़ाई यानी कोला वॉर की शुरुआत 70 के दशक में ही हो गयी थी. दोनों कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे कोला ड्रिंक के टेस्ट में कुछ ख़ास अंतर नहीं था. लिहाज़ा, उन्होंने एक दूसरे को मात देने के लिए बेहद दिलचस्प मार्केटिंग के तरीके ईजाद किए.

‘पेप्सी चैलेंज’ और कोका कोला की गलतियां

1975 में पेप्सी या पेप्सीको ने उभरते हुए नए बाजारों पर पकड़ बनाने के लिए एक विज्ञापन शुरू किया. ‘पेप्सी चैलेंज’ के नाम से चला यह विज्ञापन बेहद मशहूर हुआ. इसके तहत पेप्सी ने भीड़ भरे इलाकों में ग्राहकों के सामने दोनों ड्रिंक्स- पेप्सी और कोकाकोला- पेश किये. परिणाम में बताया गया कि ज़्यादातर लोगों ने पेप्सी को कोका कोला के ऊपर तरजीह दी. बाद में पेप्सी ने एक नौ सेकंड का एक टीवी विज्ञापन दिया जिसमें एक बुज़ुर्ग और कोक प्रेमी महिला पेप्सी को पसंद करती दिखाई देती है. इस विज्ञापन ने कोका कोला कंपनी में हलचल मचा दी थी. इससे निपटने लिए उसने कई कदम उठाए जो उल्टे पड़े और नौबत यह आ गई कि कंपनी को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा.

ज़मीन से उठकर यह लड़ाई अंतरिक्ष में पहुंच गई

यकीन करना मुश्किल है, पर सच है कि 80 के दशक में दोनों कंपनियां इस होड़ में लग गयी थीं कि अन्तरिक्ष में कौन सा पेय पसंद किया जाएगा. दरअसल, 1985 में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को अंतिरक्ष में स्पेस शटल चैलेंजर भेजना था. इसके अंतरिक्ष यात्रियों के लिए दोनों कंपनियों ने अपने-अपने उत्पाद में आमूलचूल बदलाव करके उन्हें ‘जीरो ग्रेविटी’ या भारहीनता प्रभाव में भी पिये जा सकने के क़ाबिल बनाया. कोका कोला ने दावा किया कि उसने ढाई लाख अमेरिकी डॉलर इस पर ख़र्च किये हैं. वहीं पेप्सी ने दुनिया को बताया कि उसने भारहीनता प्रभाव मुक्त कैन बनाने पर डेढ़ करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च किये हैं. हालांकि अंतरिक्ष यात्रियों ने दोनों ने कंपनियों के ड्रिंक्स नकार दिए थे.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने पेप्सी को वाइट हाउस से फिंकवा दिया था

40 के दशक में अमेरिका में भी कंपनियों को चीनी की एक निश्चित मात्रा में मिलती थी. पेप्सी ने इस कोटे को बढ़ाने के लिए अमेरिकी सीनेटर जोसेफ मैकार्थी को लामबंद करने की कोशिश की. इसके लिए कंपनी ने कर्ज़ में डूबे जोसेफ मैकार्थी की आर्थिक सहायता की. ये भेद जनता के सामने के खुल गया और मैकार्थी पेप्सी के लिए चीनी का कोटा नहीं बढ़वा पाए.

दोनों कंपनियां चुनावों में खुलकर अपनी पसंद की पार्टियों को चंदा देती हैं. 1984 के चुनावों में कोका कोला ने रिपब्लिक पार्टी के उम्मीदवार रोनाल्ड रीगन का समर्थन किया था. दिलचस्प बात यह है कि जब रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति बने तो उन्होंने चैलेंजर स्पेस शटल के लिए पेप्सी का समर्थन किया.

रीगन से पहले राष्ट्रपति रहे जेम्स अर्ल कार्टर जिन्हें जिमी कार्टर के नाम से भी जाना जाता है, कोका कोला के समर्थक थे. जिमी कार्टर और कोक के रिश्ते जगज़ाहिर थे. चुनावी सभाओं में जाने के लिए जिमी कार्टर कोका कोला कंपनी का जहाज़ इस्तेमाल करते थे. उन्होंने एक बार वाइट हाउस में किसी कर्मचारी को पेप्सी पीते हुए देख लिया था. इसके बाद जब तक जिमी कार्टर राष्ट्रपति रहे, पेप्सी कभी भी वाइट हाउस में दाखिल नहीं हो सकी.

उधर, राष्टपति रिचर्ड निक्सन पेप्सी पसंद करते थे. उनके और पेप्सी के बीच पनपा रिश्ता भी बेहद दिलचस्प था. उन्होंने पेप्सी को सोवियत रूस के मुखिया खुश्चेव का पसंदीदा पेय बना दिया था जिसकी बदौलत पेप्सी सोवियत रूस के बाज़ारों में घुस पाई थी.

खेलों के ज़रिये टक्कर देने की कोशिश

विश्वभर में कोका कोला का मार्केट शेयर पेप्सी से कुछ ज़्यादा है. लिहाज़ा, पेप्सी चुनौती देने वाली भूमिका निभाती है. कोका कोला जो करेगी, पेप्सी उसकी देखादेखी कुछ उलट. और यह बात खेलों के विज्ञापनों में भी ज़ाहिर होती है. 1996 में भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट के वर्ल्ड कप सीरीज की कोका कोला कंपनी अधिकारिक स्पॉन्सर थी. चार साल पहले आई कोका कोला तब भारत में पैर जमाने की कोशिश कर रही थी. लिहाज़ा,स्पॉन्सर बनकर कोक को उम्मीद थी कि इससे उसके मार्केट शेयर में काफ़ी इज़ाफ़ा होगा.

कोक ने शानदार विज्ञापन सीरीज बनवाई थी जो कुछ इस तरह थी. इस विज्ञापन में जो आवाज़ आप सुनेंगे वह महान नुसरत फ़तेह अली खान की है.

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पेप्सी ने इसकी काट के लिए हर मैच में अपने विज्ञापन थोक के भाव डाले. इनकी टैगलाइन थी - ‘नथिंग ऑफिशियल अबाउट इट.’ पेप्सी के विज्ञापन ने कोक की नाक के नीचे से पूरी चैम्पियनशिप ही जीत ली थी.

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किसी भी खेल की बड़ी सीरीज में दोनों कंपनियों का कमोबेश यही हाल होता है . विश्वभर में लोकप्रिय फुटबॉल के खेल में तो दोनों कंपनियां सारी हदें पार कर जाती हैं. जर्मनी में 2006 में हुए फुटबाल विश्व कप की अाधिकारिक स्पॉन्सर कोका कोला थी. यहां भी पेप्सी ने ‘पेप्सीमैक्स चैलेंज अभियान’ विज्ञापन जारी किया था. 2010 में अफ्रीका में हुए फुटबॉल वर्ल्ड कप का भी कुछ यही आलम रहा. स्पॉन्सर कोका कोला कंपनी थी. पेप्सी ने अफ्रीका महाद्वीप को आधार बनाकर एक विज्ञापन जारी किया जिसमे अर्जेंटीना के मशहूर फुटबॉल खिलाडी मेसी भी थे.

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प्रोडक्ट पोर्टफोलियो और अर्थ के आंकड़े

जहां कोका कोला मुख्य रूप से एक पेय कंपनी ही है वहीं पेप्सी या पेप्सीको आज एक बहुत बड़ी फ़ूड चेन बन गयी है.

कोका कोला का प्रोडक्ट पोर्टफोलियो
कोका कोला का प्रोडक्ट पोर्टफोलियो

कोका कोला का सालाना टर्नओवर तकरीबन पौने तीन लाख करोड़ रुपये है. पेप्सीको का सालाना टर्नओवर तकरीबन चार लाख करोड़ है.

पेप्सीको का प्रोडक्ट पोर्टफोलियो
पेप्सीको का प्रोडक्ट पोर्टफोलियो

कोला वॉर अंततः कौन जीता है

आज भी तमाम कोशिशों के बावजूद कोल्ड ड्रिंक की दौड़ में पेप्सी कोका कोला से पीछे ही है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ दुनियाभर में कोक ही हिस्सेदारी लगभग 42% है वहीं पेप्सी की हिस्सेदारी 30% ही है. अमेरिका के अर्थशास्त्री और वॉक्स मगज़ीन के एडिटर मैथ्यू इग्लेसिअस एक लेख में कहते हैं, ‘यह सच है कि1975 में पेप्सी द्वारा किए गए चैलेंज में लोगों ने पेप्सी को कोका कोला के ऊपर तरजीह दी थी. इसके बाद कोका कोला एक के बाद एक गलतियां करती गई. यहां तक कि कंपनी ने ‘न्यू कोक’ नाम से नया उत्पाद जारी कर दिया. यह अमेरिकी लोगों को पसंद नहीं आया. कोक की बिक्री धड़ाम से नीचे आ गिरी. तब उस दौर में पेप्सी कोला वॉर जीत गया थी. यहां तक कि इस जीत की ख़ुशी में पेप्सी कंपनी ने अपने कर्मचारियों को पांच दिन की छुट्टी दी थी.

बाद में कंपनी ने अपनी ग़लती मानकर पुराने वाले कोका कोला ड्रिंक को बाज़ार में उतारा और दोबारा अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा प्राप्त की. मैथ्यू इग्लेसिअस लिखते हैं, ‘पेप्सी के लिए ये बड़ी हताशाजनक बात है पर जब इस बात पर शोध किया गया तो ये पाया गया कि लोग टेस्ट चखकर कोल्ड ड्रिंक नहीं ख़रीदते. दरअसल, कोका कोला की जीत के पीछे कंपनी का मार्केटिंग कैंपेन था. इसलिए कोका कोला आज भी पेप्सी से ज़्यादा विज्ञापन पर अपना पैसा ख़र्च करती है. अंततः, इस कोला वॉर की विजेता कोका कोला ही साबित हुई है.’

अब आगे क्या होगा? इंदिरा नूयी बनाम वारेन बफ़ेट

2006 में भारतीय मूल इंदिरा नूयी पेप्सीको की सीईओं नियुक्त की गईं थीं. उनकी सरपरस्ती में पेप्सी ने राहें ही बदल ली हैं. उसका नतीजा यह है कि आज कोका कोला की तुलना में पेप्सी ज़्यादा बड़ी कंपनी है. दरअसल, इंदिरा नूयी ने भांप लिया था कि आने वाले समय में कोला के बनिस्बत हेल्थ ड्रिंक्स बाज़ार में ज्यादा चलेंगे लिहाज़ा उन्होंने जूस, पानी, चाय आदि में कंपनी के पैर जमाने शुरू कर दिए थे. आज पेप्सी कंपनी के टर्नओवर में खाद्य उत्पादों की हिस्सेदारी 50% है जबकि कंपनी के सोडा कोल्डड्रिंक महज 30% की हिस्सेदारी रखते हैं. वहीं कोका कोला कंपनी में आज भी शीतलपेय का लगभग 60% हिस्सा है.

उधर, स्टॉक मार्केट की समझ रखने वाले पेप्सी को कोका कोला से बेहतर स्टॉक मानते हैं. पर कुछ साल पहले वारेन बफ़ेट ने एक धमाकेदार बात कही थी. उन्होंने कहा था कि अगर किसी शख्स ने 1919 में कोकाकोला कंपनी में चालीस डॉलर का निवेश किया होता तो 2012 में यह बढ़कर पांच लाख डॉलर हो गया होता!.

देखना दिलचस्प होगा कि 1886 में फार्मेसिस्ट जॉन पेम्बेरटन द्वारा शुरू की गई कोका कोला आगे भी आगे रहती है या 1893 में फार्मेसिस्ट सेलेब ब्रेडहम द्वारा बनाई गई पेप्सी उसे मात दे देती है. क्या वारेन बफ़ेट की यह बात सही साबित होती है कि वे अगर 100 साल तक भी अगर अच्छा खाना खाएं तो शायद जिंदा न रहें जबकि कोका कोला में निवेश 100 सालों के बाद भी लाभदायक है, या इंदिरा नूयी की सेहत के प्रति जागरूकता जीतती है? फ़िलहाल तो आंकड़े इंदिरा नूयी के साथ हैं. विडम्बना देखिये कि दुनिया के उलट हिंदुस्तान में पेप्सी की कोल्ड ड्रिंक कोका कोला से ज़्यादा बिकती है! भारत अजब-गजब देश है.