भारतीय जनता पार्टी में एक ऐसी सीट खाली हुई है जिसके दावेदार देश के 12 मुख्यमंत्री हैं और 50 से ज्यादा केंद्रीय मंत्री. यह एक ऐसी सीट है जिसे पाकर भाजपा का कोई भी नेता अचानक शक्तिशाली बन जाता है. अभी भाजपा में सिर्फ 11 ऐसे नेता हैं जो इस सीट पर बैठे हैं और 12वीं अभी-अभी खाली हुई है. यह सीट है भाजपा के सर्वशक्तिशाली पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य की.

कभी लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी भाजपा के संसदीय बोर्ड के सदस्य हुआ करते थे. लेकिन अब ये सभी मार्गदर्शक मंडल के सदस्य हैं और अमित शाह पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष. अब तक इस बोर्ड में 12 सदस्य थे और भाजपा के संविधान के मुताबिक इसमें किसी तेरहवें की एंट्री नहीं हो सकती थी. लेकिन वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने की वजह से पार्लियामेंट्री बोर्ड में भी एक सीट खाली हुई. अब इसी इकलौती सीट को भरने के लिए भाजपा और आरएसएस में जबरदस्त सियासत चल रही है.

वेंकैया नायडू भाजपा के पूर्व अध्यक्ष थे इस नाते उन्हें अपने आप ही पार्लियामेंट्री बोर्ड में जगह मिल गई थी. आखिरी बार शिवराज सिंह चौहान को बोर्ड में लाया गया था. जब राजनाथ सिंह अध्यक्ष बने तो उन्होंने नरेंद्र मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड का सदस्य बनाया था. इसी फैसले से मोदी की केंद्रीय सियासत में वापसी हुई थी. लालकृष्ण आडवाणी उस वक्त नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाने के खिलाफ थे. उस वक्त लगातार तीन विधानसभा चुनान जीतने की कसौटी तय की गई थी जिस पर शिवराज सिंह चौहान भी खरे उतरते थे. लेकिन राजनाथ ने सिर्फ मोदी को मौका दिया.

जब अमित शाह अध्यक्ष बने तो शिवराज सिंह चौहान की भी जगह संसदीय बोर्ड में पक्की हो गई. अब एक सीट खाली हुई है तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पूरी ताकत लगा रहे हैं. उनकी दलील है कि तीन विधानसभा चुनाव लगातार जीतने की कसौटी पर सबसे खरे वही उतरते हैं.

सुनी-सुनाई है कि रमन सिंह ने अपनी बात पूरी मजबूती से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और संघ के नेताओं तक पहुंचाई है. लेकिन भाजपा की खबर रखने वाले सूत्र साफ बताते हैं कि इस बार रमन सिंह को संसदीय बोर्ड में बैठने का टिकट नहीं मिलेगा. भाजपा के एक बड़े नेता ने कुछ पत्रकारों को अनौपचारिक बातचीत में बताया कि पार्लियामेंट्री बोर्ड के हिसाब से रमन सिंह काफी लाइटवेट नेता हैं, इसलिए उनका नंबर आने की संभावना ना के बराबर है. अब चर्चा है कि चार और मुख्यमंत्री और करीब पांच कैबिनेट मंत्री अपना नाम आगे बढ़ाने में जुट गए हैं. इन सबकी पैरवी भी कोई छोटे नेता नहीं बल्कि बड़े-बड़े सूरमा कर रहे हैं.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को पार्लियामेंट्री बोर्ड में लाना चाहते हैं. इसकी वजह है कि अमित शाह को उन पर पूरा भरोसा है. वे महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं और तीसरी सबसे बड़ी बात ये कि वे अंदर की खबर बाहर नहीं करते और मीडिया से दूरी बनाकर रखते हैं. लेकिन संघ के कुछ नेता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संसदीय बोर्ड में लाने की वकालत कर रहे हैं. उनकी दलील है कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद इस वक्त भाजपा में योगी ही सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं. हर राज्य में उन्ही की मांग है.

संघ के हिसाब से योगी आदित्यनाथ प्रखर हिंदुवादी छवि वाले इकलौते नेता बचे हैं. ऊपर से उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की कमान भी उनके पास है. इसलिए संसदीय बोर्ड में जाने के लिए उनसे ज्यादा उपयुक्त नेता कोई और नहीं है. लेकिन कुछ ऐसे धाकड़ नेता हैं जो योगी और देवेंद्र फड़णवीस को संसदीय बोर्ड में नहीं जाने देना चाहते. उन्होंने दलील दी है कि महाराष्ट्र से पहले ही नितिन गडकरी संसदीय बोर्ड के सदस्य हैं. और राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से आते हैं. इसलिए नया सदस्य किसी और राज्य से होना चाहिए.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकदम नया चेहरा लाना चाहते हैं और उस नाम को सुनकर आप एकदम चौंक जाएंगे. याद कीजिए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जब विभागों का बंटवारा हुआ तो सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम किसका था. देश की नई रक्षा मंत्री निर्मला सीतरमण का. अगर सारे समीकरण ठीक बैठ गए तो निर्मला सीतारमण का एक और जबरदस्त प्रमोशन हो सकता है. कहने वाले कह रहे हैं कि नया सदस्य भी दक्षिण भारत से ही होना चाहिए.

अभी पार्लियामेंट्री बोर्ड में 11 सदस्य हैं, लेकिन इसमें सिर्फ एक महिला हैं - विदेश मंत्री सुषमा स्वराज. अब ऐसी तो भाजपा में सिर्फ एक ही महिला नेता हैं जो पार्लियामेंटरी बोर्ड में जाने जितनी वरिष्ठ हों और दक्षिण भारत से भी हों.