यदि कोई कहे कि आर्य भारत में बाहर से नहीं बल्कि भारत से बाहर गए थे, तो उसकी विचारधारा का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है. यदि वह शख्स यह भी कहे कि भारत को समझने के लिए वेदों सहित तमाम संस्कृत साहित्य को पढ़ना होगा, तब तो यह काम और भी आसान हो जाएगा. वहीं यह जानने के बाद कि यह इंसान वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास जैसे कवियों का बेहद प्रशंसक है, तब तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति ‘पुनरोत्थानवादी’ या ‘दक्षिणपंथी’ सोच का है. लेकिन हमें तब झटका लग सकता है जब ये पता चले कि यह शख्स देश के बड़े मार्क्सवादी चिंतकों में शुमार किया जाता है. जी हां यह विद्वान कोई और नहीं डॉ रामविलास शर्मा हैं. हिंदी के महान आलोचक, कवि, निबंधकार, भाषाविद और इतिहासकार रामविलास शर्मा को मौलिक मार्क्सवादी विचारकों में भी शुमार किया जाता है.

डॉ शर्मा रामचंद्र शुक्ल के कद के आलोचक थे

हिंदी आलोचना में रामचंद्र शुक्ल सबसे बड़े आलोचक माने जाते हैं. कहा जाता है कि उन्होंने जिन साहित्यकारों की तारीफ कर दी, वे हिंदी साहित्य में अमर हो गए. वहीं शुक्ल जी की कलम ने जिनके योगदान को खारिज किया, उन्हें फिर से स्थापित करने में बाकी आलोचकों के पसीने छूट गए. यही बात रामविलास शर्मा के बारे में भी कही जाती थी. उन्हें हिंदी साहित्य की ‘प्रगतिवादी (मार्क्सवादी) आलोचना का पितामह’ कहा जाता है. लगभग साढ़े छह दशक के सक्रिय रचनाकाल में उन्होंने सौ से ज्यादा (112) किताबें लिखीं, जिनमें ज्यादातर आलोचना के ग्रंथ हैं. हालांकि उन्होंने भाषा विज्ञान, इतिहास और राजनीति में भी बेमिसाल काम किया.

रामविलास शर्मा मार्क्सवादी मूल्यों के आधार पर साहित्य की आलोचना करते थे. लेकिन जहां भी उचित लगा उन्होंने मार्क्सवाद की लीक छोड़ने में कभी कोई गुरेज नहीं किया. वे केवल आर्थिक पक्ष को आधार मानने के मार्क्सवादी सिद्धांत से कभी पूरी तरह सहमत नहीं रहे. उन्होंने भारत के संदर्भ में मजदूरों के अलावा किसानों को भी क्रांति का सिपाही बताया था. वे यह भी नहीं मानते थे कि साहित्य केवल क्रांति के लिए होता है, आनंद के लिए नहीं. महाकवि निराला का मूल्यांकन करते हुए तो रामविलास शर्मा ने ‘जन्मजात प्रतिभा’ जैसी चीज को भी स्वीकार कर लिया, जो मार्क्सवादी मूल्यों के खिलाफ जाती है.

प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का महान कथाकार बताने वाले शुरुआती आलोचकों में रामविलास शर्मा भी थे. उनसे पहले ऐसी राय हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे बड़े आलोचक ने ही रखी थी. नहीं तो आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी जैसे विद्वानों ने तो प्रेमचंद को ‘बी’ ग्रेड का कथाकार घोषित कर दिया था. लेकिन रामविलास शर्मा ने पूरी ठसक से कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में भारत की आत्मा को पूरी सच्चाई और सहजता के साथ उकेरा है, इसलिए वे महान हैं.

रामविलास शर्मा ने ही सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को आधुनिक हिंदी कविता का सबसे महान कवि बताया था. हालांकि निराला पहले से स्थापित कवि थे, लेकिन उनकी रचनाओं का सबसे गहन और बेहतर मूल्यांकन उन्हीं का माना जाता है. कई आलोचक तो यहां तक कहते हैं कि हिंदी साहित्य में निराला को उन्होंने स्थापित किया और फिर इस काम ने खुद उन्हें भी एक ऊंचा मुकाम दिलाया. ‘निराला की साहित्यिक साधना’ नाम से तीन भाग में लिखे गए आलोचनात्मक ग्रंथ के लिए ही रामविलास शर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था.

वामपंथी विद्वान जिन तुलसीदास को हमेशा खारिज करते रहे उन्हें भी रामविलास शर्मा ने मध्यकालीन भारत का महान कवि बताकर लोगों को चौंकाया था. ज्यादातर वाम विचारकों की नजर में उस दौर में कबीर सबसे बड़े कवि थे. दरअसल प्रगतिवादियों का मानना था कि कविता के रूप और शिल्प से ज्यादा उसके तथ्यों का महत्व होता है. इसलिए मार्क्सवादी आलोचकों की नजर में शिल्प की कमजोरियों के बावजूद कबीर तुलसी से बड़े कवि थे. वे मानते थे कि कबीर के विचार क्रांतिकारी और तुलसी के प्रतिगामी हैं. ऐसे आलोचकों का आरोप था कि महिलाओं और दलितों के बारे में तुलसीदास के विचार प्रतिक्रियावादी थे और उन्होंने मध्यकाल में ढहते सामंतवाद को फिर से जमाने की कोशिश की थी.

लेकिन रामविलास शर्मा ने बताया कि तुलसी का पूरा साहित्य ही सामंतवाद विरोधी मूल्यों से भरा पड़ा है. इसके लिए उन्होंने ‘तुलसी-साहित्य के सामंत विरोधी मूल्य’ नाम से लंबा निबंध लिखकर आलोचकों को चुप रहने पर मजबूर कर दिया. इस आलेख में उन्होंने कहा कि तुलसी के बारे में वे ही आक्षेप लगाते हैं, जिन्होंने उन्हें पूरा नहीं पढ़ा. तुलसीदास की विवादित पंक्तियों के बारे में उनके साहित्य से प्रमाण ढ़ूंढ़कर रामविलास शर्मा ने बताया था कि कुछ लोगों ने अपना स्वार्थ साधने के लिए तुलसी साहित्य से छेड़खानी की है.

रामविलास शर्मा भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल जैसे साहित्यकारों के बड़े प्रशंसक थे. हालांकि वे अपनी विध्वंसात्मक आलोचना शैली के लिए भी जाने जाते हैं. सु​मित्रानंदन पंत के वे कटु आलोचक थे. उन्होंने उनकी इतनी आलोचना की कि कई विद्वानोंं ने यहां तक कहा कि वे पहले अपना शत्रु चुनते हैं और फिर उसे आलोचना से धराशायी करते हैं. हालांकि अपने आलोचकों से रामविलास शर्मा हमेशा यही कहते थे कि अगर उन्होंने कुछ भी गलत कहा हो तो उसका तर्कपूर्ण ढंग से खंडन किया जाए.

साहित्य के बाहर भी रामविलास शर्मा का बड़ा दखल था

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 10 अक्टूबर, 1912 को पैदा होने वाले डॉ रामविलास शर्मा साहित्य की दुनिया में ही नहीं, इसके बाहर भी खासा दखल रखते थे. वे पेशे से अंग्रेजी के प्रोफेसर थे. उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में ही लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी की थी. यह भी एक वजह है कि साहित्य जगत के बाहर के लोग भी उनकी बातें कान देकर सुनते थे.

मार्क्सवादी विचारधारा के बारे में उनकी पक्की राय थी कि भारत के अनुकूल बनाए बगैर इसे जस का तस स्वीकार करने से यह भारत में फल-फूल नहीं पाएगी. उन्होंने अपने इतिहास और राजनीति विषयक ग्रंथों के जरिए हमेशा यह कोशिश भी की. इस कड़ी में उनके लिखे ‘भारतीय इतिहास और ऐतिहासिक भौतिकवाद’ जैसे कालजयी ग्रंथ का अहम स्थान है. वहीं ‘पश्चिम एशिया और ऋगवेद’ में उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास के बारे में जो कहा, उससे तो कम ही वामपंथी सहमत हो पाए.

साहित्य की दुनिया के बाहर भी वे कितने लोकप्रिय थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 30 मई, 2000 को इनके निधन के बारे में लगभग सभी अखबारों ने अपने पहले पन्ने पर विस्तार से बताया था. इस बारे में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे वीरभारत तलवार ने कहा था -‘रामविलास जी की मृत्यु के बाद हिन्दी के सभी अखबारों ने अपने पहले पन्ने पर इस खबर को प्रमुखता से छापा. बड़ी-बड़ी सुर्खियां लगाईं. ऐसा सम्मान उनके अलावा हिन्दी के कुछेक साहित्यकारों को ही नसीब हुआ होगा.’