सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाह के बाद शारीरिक संबंध बनाने के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है. बार एंड बेंच के अनुसार बुधवार को शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो इसे बलात्कार माना जाएगा. एनजीओ इंडिपेंडेंट थॉट की याचिका पर सुनवाई करने के बाद जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-375 के अपवाद-2 को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया. शीर्ष अदालत ने अपवाद-2 को संविधान के अनुच्छेद-14,15 और 21 के साथ-साथ बच्चों का यौन शोषण रोकने के लिए बने पॉक्सो एक्ट के भी खिलाफ बताया. आईपीसी की धारा-375 के अपवाद-2 में शादी के बाद 15 साल तक की नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार के बाहर माना गया है.

एनजीओ ने अपनी याचिका में अलग-अलग कानूनों में सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की आयु को लेकर दुविधा का सवाल उठाया था. आईपीसी की धारा-375 के अपवाद-2 को चुनौती देते हुए याचिका में कहा गया था कि इसमें शादी के बाद 15 साल तक की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना गया है, जबकि दूसरे कानूनों में आपसी सहमति से संबंध बनाने की आयु 18 वर्ष है. उदाहरण के लिए बाल यौन शोषण संरक्षण अधिनियम-2012 में 18 साल तक की लड़की को नाबालिग माना गया है और उसके साथ सभी तरह की यौन गतिविधि को दंडनीय माना गया है.

हालांकि, केंद्र सरकार आईपीसी की धारा-375 के अपवाद-2 का बचाव कर चुकी है. 10 अक्टूबर को उसकी तरफ से अदालत में पेश अधिवक्ता बीनू टम्टा ने कहा था कि यह विवाह संस्था को बचाने की कोशिश है, क्योंकि देश में शादीशुदा नाबालिग लड़कियों की संख्या 2.3 करोड़ है. इसी मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश में बड़े पैमाने पर जारी बाल विवाह को लेकर गहरी नाराजगी जताई थी.