15 मई 2008 की रात नॉएडा के जलवायु विहार में दो हत्याएं हुई थी. यह हत्याएं किसने और क्यों की, यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है. हालांकि 2013 में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो लोगों को इन हत्याओं का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी थी. लेकिन कल इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस फैसले को पलटते हुए दोनों आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया. न्यायालय ने सबूतों के अभाव में आरोपितों को बरी किया है. ऐसा होने की पूरी-पूरी उम्मीद भी थी. लेकिन 15 मई 2008 की उस रात असल में क्या हुआ था, यह अब तक कोई नहीं जानता. यह तथ्य न तो निचली अदालत में ही सामने आ सका था और न ही भविष्य में ही ऐसा होने की कोई संभावना दिखती है.

‘आरुषि-हेमराज हत्याकांड’ नाम से चर्चित इस मामले को अगर बेहद संक्षेप में देखें तो यह बिलकुल सीधा और सुलझा दिखाई पड़ता है. 15 मई की रात उस घर में चार लोग मौजूद थे. अगली सुबह तक इनमें से दो लोगों की हत्या हो चुकी थी. उस रात घर में किसी बाहरी व्यक्ति के आने के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं. लिहाजा शक उन्हीं लोगों पर जाता है जो उस रात घर में मौजूद थे और अगली सुबह जीवित थे. सीबीआई अदालत ने भी मुख्यतः इसी संभावना को सच मानते हुए इस मामले में दोषियों को सजा सुनाई थी. लेकिन इस संक्षिप्त विवरण से इतर, इस मामले को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह बेहद पेंचीदा और रहस्यमयी होता चला जाता है.

इस मामले के बारे में यह भी कहा जाता है कि यदि इसकी शुरूआती जांच करने वाली टीम ने थोड़ी भी सावधानी से काम किया होता तो इसे बेहद आसानी से सुलझाया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह मामला हमेशा के लिए एक अनसुलझी गुत्थी बन गया. इस मामले को समझने की शुरुआत उसी क्रम में करते हैं जिसमें यह उलझना शुरू हुआ था.

राजेश और नुपुर तलवार दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं. वे नॉएडा के जलवायु विहार में अपनी इकलौती बेटी आरुषि के साथ रहते थे. आरुषि 14 साल की थी और दिल्ली पब्लिक स्कूल में कक्षा नौ की छात्रा थी. तीन लोगों के इस परिवार के साथ रहने वाला चौथा सदस्य हेमराज था. मूल रूप से नेपाल का रहने वाला हेमराज पिछले कई सालों से तलवार दंपति के घर का काम-काज किया करता था. 15 मई 2008 तक यह एक हंसता-खेलता छोटा-सा सामान्य परिवार था.

लेकिन 16 मई 2008 की सुबह इस परिवार के लिए सबकुछ बदल चुका था. आरुषि की उसके ही कमरे में हत्या कर दी गई थी और हेमराज घर से गायब था. ऐसे में राजेश और नुपुर तलवार के साथ ही पुलिस और मीडिया को भी पहला शक यही हुआ कि हेमराज आरुषि की हत्या करके फरार हो गया है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने तो हेमराज की जानकारी देने वाले को बीस हजार रूपये का इनाम देने की भी घोषणा कर दी. देश की राजधानी से सटे एक इलाके में एक जवान लड़की की अपने ही घर में हत्या होना, मीडिया के लिए बड़ी खबर थी. पहले ही दिन यह खबर देश भर की सुर्ख़ियों में शामिल हो गई.

यह खबर तब और बड़ी बन गई जब 17 मई की सुबह हेमराज की लाश भी घर की छत से बरामद हो गई. एक दिन पहले तक जिस व्यक्ति को आरुषि की हत्या का दोषी समझा जा रहा था, वह खुद भी आरुषि की तरह और उसके साथ ही अपनी जान गंवा चुका था. हेमराज की लाश मिलने के बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि इन दोनों हत्याओं के दोषी डॉक्टर तलवार भी हो सकते हैं. पुलिस के साथ ही मीडिया ने भी इस मामले की पड़ताल शुरू की और पुष्ट-अपुष्ट जो भी जानकारी उसे मिली, वह प्रकाशित कर दी गई. यहीं से यह मामला बिगड़ना भी शुरू हो गया. बिना किसी पुख्ता आधार के ऐसी कई ख़बरें छपीं जो कहती थीं - ‘तलवार दंपति बीवियों की अदला-बदली करते थे’, ‘आरुषि और हेमराज के अवैध संबंध थे’, ‘ऑनर किलिंग के चलते हुई आरुषि की हत्या’, ‘आरुषि तलवार दंपति की सगी बेटी नहीं थी’, ‘आरुषि और राजेश तलवार दोनों का चरित्र सही नहीं था’ आदि-आदि.

मामले की जांच अभी पूरी भी नहीं हुई थी और तलवार दंपति सारे देश में दोषी मान लिए गए थे. उन्हें ‘जल्लाद मां-बाप’ वाली छवि में पेश करती ख़बरें इतना असर पैदा कर चुकी थी कि एक युवक ने न्यायालय में ही डॉक्टर तलवार पर जानलेवा हमला कर दिया. लेकिन एक ओर जहां देश की बड़ी आबादी तलवार दंपति को आरुषि और हेमराज की हत्या का दोषी मान रही थी वहीँ दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जो मानती थी कि तलवार दंपति निर्दोष है. बल्कि तलवार दंपति को निर्दोष मानने वाले लोगों की संख्या में तब से लगातार बढ़ोतरी ही हुई है. इसका एक कारण अविरूक सेन की किताब ‘आरुषि’ और बॉलीवुड की बहुचर्चित फिल्म ‘तलवार’ को भी माना जाता है.

तलवार दंपति को निर्दोष इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इस मामले की जितने भी लोगों ने जांच की, उन सभी ने यह माना है कि तलवार दंपति को हत्या का दोषी मानने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं. इस दोहरे हत्याकांड की जांच कुल तीन अलग-अलग जांच दलों ने की थी. शुरूआती जांच नॉएडा पुलिस ने की, इसके बाद यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और कुछ समय बाद इस टीम को बदलकर यह जांच सीबीआई की ही एक नई टीम को सौंप दी गई थी. दिलचस्प यह भी है कि इस मामले में देश की सर्वोच्च जांच संस्था (सीबीआई) की दो अलग-अलग टीम बिलकुल विपरीत दिशाओं में जाती दिखती हैं. सीबीआई की पहली टीम यह मान रही थी कि यह हत्याएं हेमराज के दोस्तों - कृष्णा, राजकुमार और विजय - ने की हैं. जबकि सीबीआई की दूसरी टीम ने माना है कि हत्याएं तलवार दंपति ने की हैं.

सीबीआई की पहली टीम को कृष्णा, राजकुमार और विजय पर इसलिए शक था क्योंकि इन लोगों ने नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट में ऐसी कई बातें बोली थी जिसने यह पता लगता था कि ये लोग हत्या के दोषी हैं. दूसरी ओर डॉक्टर राजेश और नुपुर तलवार के नार्को या पॉलीग्राफ में ऐसी कोई भी बात सामने नहीं आई जिनसे इन लोगों के अपराध में शामिल होने की संभावना पैदा होती हो. इन टेस्टों के अलावा कृष्णा के कमरे से सीबीआई ने बैंगनी रंग का एक तकिया भी बरामद किया था जिस पर हेमराज के खून के निशान थे. यह सबूत इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ समझा जा रहा था. लेकिन जब यह मुद्दा अदालत में उठा तो नई सीबीआई टीम के अध्यक्ष ने इसे यह कहते हुए नकार दिया कि यह तकिया असल में हेमराज के ही कमरे से मिला था और टाइपिंग की गलती के चलते इस पर यह लिख दिया गया कि यह कृष्णा के कमरे से मिला है.

इस मामले को यह तथ्य भी कुछ रहस्यमयी बना देता है कि कई ‘निष्पक्ष गवाहों’ ने भी इस मामले में अपने बयान बदले हैं. उदाहरण के लिए आरुषि और हेमराज के शवों का पोस्टमॉर्टेम करने वाले डॉक्टर. आरुषि का पोस्टमॉर्टेम डॉक्टर दोहरे ने किया था. पोस्टमॉर्टेम के दौरान उन्होंने आरुषि के गुप्तांग में कुछ भी असमान्य नहीं पाया था. आरुषि की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में भी ऐसा कुछ नहीं था जो बताता हो कि उस पर यौन हमला हुआ था या उसके गुप्तांगों से कोई छेड़छाड़ हुई थी. पोस्टमॉर्टेम के बाद भी इस तरह की कोई बात डॉक्टर दोहरे ने न तो नॉएडा पुलिस को बताई थी, न सीबीआई को और न ही एम्स की उस डॉक्टरों की टीम को जिसके वे खुद भी सदस्य थे. लेकिन जब मामले की जांच सीबीआई की नई टीम करने लगी, जो तलवार दंपति को ही दोषी मान रही थी, तब पहली बार डॉक्टर दोहरे ने कहा कि आरुषि के गुप्तांग में असामान्य रूप से फैलाव था और ऐसा भी लग रहा था कि मरने के बाद भी उसके गुप्तांग साफ़ किये गए हैं.

डॉक्टर दोहरे का यह बयान पोस्टमॉर्टेम के लगभग डेढ़ साल बाद आया. पोस्टमॉर्टेम करने के बाद वे कुल पांच बार अपना बयान दर्ज करा चुके थे लेकिन ऐसी कोई भी बात उन्होंने पहले नहीं कही थी. कुछ ऐसा ही हेमराज के पोस्टमॉर्टेम के मामले में भी हुआ जो डॉक्टर नरेश राज ने किया था. उन्होंने भी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में कुछ असामान्य दर्ज नहीं किया था लेकिन न्यायालय में बयान देते हुए उन्होंने कहा कि हेमराज के गुप्तांग में सूजन थी जिससे यह संकेत मिलते हैं कि उसकी हत्या संभोग करते हुए या उससे ठीक पहले की गई थी. बचाव पक्ष के वकील ने उनके इस तर्क को काटते हुए और ‘चिकित्सा न्यायशास्त्र’ (मेडिकल ज्यूरिस्प्रूडेंस) का हवाला देते हुए जब यह कहा कि मौत के इतने समय बाद (हेमराज का शव मौत के दो दिन बाद मिला था) गुप्तांग में सूजन आना एक आम बात है, तो डॉक्टर नरेश राज का कहना था, ‘मैं चिकित्सा न्यायशास्त्र के हवाले से नहीं बल्कि अपने वैवाहिक जीवन के अनुभव के आधार पर यह बात कह रहा हूं.’

आरुषि हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को हुई सजा पर इसलिए भी प्रश्नचिन्ह लगता रहा क्योंकि इस मामले में कई गंभीर सवालों के जवाब न तो जांच के दौरान जांचकर्ता ढूंढ पाए और न ही न्यायालय में अभियोजन पक्ष साबित कर पाया. जैसे यह सवाल कि हेमराज की मौत कहां हुई? अभियोजन की कहानी के अनुसार हेमराज और आरुषि, दोनों की हत्या आरुषि के कमरे में हुई थी. लेकिन आरुषि का कमरा, जहां उसका खून बिखरा पड़ा था, वहां हेमराज के खून का एक भी निशान नहीं था. इससे यह तो साफ़ था कि हेमराज की हत्या कहीं और की गई थी. हेमराज का शव घर की छत से बरामद हुआ था. विशेषज्ञों ने जब इस जगह और हेमराज के शव का परीक्षण किया तो पाया कि उसके शव को किसी चादर में रखकर छत पर घसीटा गया था. इस कारण विशेषज्ञों ने माना कि हेमराज को छत पर भी नहीं मारा गया था. क्योंकि यदि उसकी हत्या छत पर ही हुई होती तो हत्या करने वाले को उसकी लाश घसीटने के लिए पहले उसे चादर में रखने की जरूरत नहीं पड़ती. घर के बाकी किसी हिस्से में भी हेमराज का खून नहीं था इसलिए यह तथ्य भी एक रहस्य ही है कि उसे कहां मारा गया.

राजेश और नुपुर तलवार के कपड़े भी उनके निर्दोष होने की संभावना बताते हैं. हत्या होने से कुछ ही घंटे पहले आरुषि ने अपने कैमरे से कुछ तस्वीरें ली थीं. इन तस्वीरों में जो कपड़े राजेश और नुपुर तलवार पहने हुए दिख रहे थे, वही कपड़े उन्होंने अगली सुबह भी पहने हुए थे. इन कपड़ो में कहीं भी हेमराज के खून के निशान नहीं थे. आरुषि का खून इनमें जरूर था लेकिन जांचकर्ताओं ने भी यह माना है कि यह खून तब लगा होगा जब वे अपनी बेटी की लाश से लिपट कर रो रहे थे.

इसके अलावा हत्या के उद्देश्य का पता न चलना, उस रात के घटनाक्रम का रहस्य ही रहना, नार्को टेस्ट में तलवार दंपति का निर्दोष पाया जाना और घर से बरामद की गई किसी भी चीज़ से यह साबित न हो पाना कि हत्या तलवार दंपति ने की है कुछ ऐसे कारण हैं जिनके चलते सीबीआई ने स्वयं भी इस मामले को बंद करने की अपील की थी. दिलचस्प यह भी है कि जब सीबीआई ने इस मामले को बंद कर देने की गुहार लगाई थी तो तलवार दंपति ने ही इसका यह कहते हुए विरोध किया था कि वे अपनी बेटी के हत्यारों को बचने नहीं देना चाहते लिहाजा यह जांच जारी रखी जाए. लेकिन न्यायालय ने न तो सीबीआई की बात मानकर केस बंद किया और न ही तलवार दंपति की बात मानकर जांच जारी रखवाई. बल्कि न्यायालय ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को ही आरोपपत्र मानते हुए तलवार दंपति के खिलाफ सुनवाई शुरू की और अंततः उन्हें दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी.

यह सजा सुनाने से पहले जब न्यायालय ने 39 सरकारी गवाहों, सबूत के 247 नमूनों, विशेषज्ञों की सैकड़ों रिपोर्टों, अभियोजन के हजारों दस्तावेजों और दोनों पक्षों की अनगिनत दलीलों को परखा तो माना कि इस मामले में भले ही कोई सीधा सबूत यह नहीं कहता कि हत्याएं तलवार दंपति ने ही की हैं लेकिन कई सबूत यह जरूर कहते हैं कि यह हत्याएं उनके अलावा किसी और ने नहीं की. इसलिए न्यायालय ने माना कि इस मामले में कुछ खामियों के बावजूद भी तलवार दंपति को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता. लेकिन सीबीआई अदालत के इस फैसले को अब उच्च न्यायालय ने गलत माना है और तलवार दंपत्ति को बरी कर दिया है.

‘आरुषि हेमराज हत्याकांड’ इस वजह से भी एक रहस्य समझा जाता है कि इस मामले में जितने तथ्य तलवार दंपति के निर्दोष होने की ओर इशारा करते हैं, उससे कहीं ज्यादा तथ्य अन्य आरोपितों - कृष्णा, राजकुमार और विजय - के निर्दोष होने की भी गवाही देते हैं. इस मामले में कई तथ्य ऐसे भी हैं जो भले ही सीधे तौर से तलवार दंपत्ति को दोषी नहीं ठहराते लेकिन उनके ही दोषी होने की तरफ इशारा जरूर करते हैं. मसलन घर की छत पर अमूमन ताला नहीं होता था. लेकिन हत्या वाली रात के बाद, जब हेमराज का शव छत पर रखा गया, छत पर ताला लगा मिला. यदि हत्या किसी बाहरी व्यक्ति ने की होती तो उसे छत पर ताला लगाने की क्या जरूरत थी? छत पर मिली एक चादर भी ऐसा ही इशारा करती है. यह चादर इस तरह से छत पर डाली गई थी कि पड़ोस की छतों से हेमराज का शव दिखाई न पड़े. किसी बाहरी व्यक्ति के ऐसा करने के कोई भी कारण समझ नहीं आते.

कानूनी पहलुओं पर बात करें तो ऊपरी अदालत से तलवार दंपति का बरी होना लगभग तय ही था. क्योंकि अपराध साबित करने का भार अभियोजन पक्ष का होता है और उसे ‘संदेह से परे’ ऐसा करना होता है. लेकिन इस मामले में तो अभियोजन स्वयं आरोपपत्र तक दाखिल करने को तैयार नहीं था. सीबीआई की जो टीम तलवार दंपत्ति को दोषी मान रही थी उसने भी इस मामले को बंद करने की ही संस्तुति की थी. सीबीआई ने न्यायालय को बताया था कि भले ही इस मामले में पूरी तरह से संदेह तलवार दंपत्ति पर जाता है लेकिन उन्हें दोषी साबित करने के लिए हमारे पास पर्याप्त सबूत नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद भी न्यायालय ने सीबीआई को आरोपपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए थे और कमज़ोर सबूतों के बावजूद तलवार दंपत्ति को दोषी करार दे दिया था. लिहाजा ऊपरी अदालत से उनका बरी होना प्रत्याशित ही था.

लेकिन जिस तरह तलवार दंपत्ति को सजा होने के बाद भी यह पुख्ता तौर से नहीं कहा जा सकता था कि हत्याएं उन्होंने ही की हैं, ठीक उसी तरह उनके बरी हो जाने के बाद भी यह पुख्ता तौर से नहीं कहा जा सकता कि हत्या उन्होंने नहीं की हैं. उन्हें सिर्फ सबूतों के अभाव में बरी किया गया है. इस मामले का कड़वा सच यही है कि आरुषि-हेमराज के साथ कभी भी न्याय नहीं हो पाएगा क्योंकि 16 मई 2008 की रात आखिर क्या हुआ था, इस रहस्य के सुलझने की सभी संभावनाएं अब समाप्त हो चुकी हैं.