सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी का मामला पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंप दिया है. खबरों के मुताबिक शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने यह फैसला सुनाया. सबरीमाला मंदिर में 10 साल से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है. मंदिर प्रशासन के मुताबिक इस नियम का मकसद मासिक धर्म वाली महिलाओं को मंदिर से दूर रखना है. भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी को बताया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक संवैधानिक पीठ इस मामले में छह सवालों पर विचार करेगी. इसमें लैंगिक भेदभाव के आधार पर इस प्रथा पर रोक लगाने और आस्था की आजादी का मुद्दा शामिल है. इसके अलावा संवैधानिक पीठ इस सवाल पर विचार करेगी कि क्या यह प्रथा हिंदू धर्म का अभिन्न अंग है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को दखल देने का हक नहीं है. इसके साथ इस सवाल पर भी विचार करेगी कि 1991 में केरल हाई कोर्ट द्वारा इस पाबंदी को सही ठहराने वाले फैसले को जारी रखा जा सकता है या नहीं? इसमें यह मुद्दा भी शामिल है कि अगर किसी मंदिर का प्रबंधन वैधानिक समिति के हाथ में है तो वह नैतिक मान्यताओं के आधार पर फैसला कर सकती है या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पाबंदी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर इस साल जनवरी में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. पिछले साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रशासन से पूछा था कि क्या परंपरा संवैधानिक अधिकारों से ऊपर हो सकती है? शीर्ष अदालत ने मंदिर ट्रस्ट से यह भी बताने को कहा था कि वह किस आधार पर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने से रोकता है, क्या भगवान में आस्था रखने वाले इंसानों के बीच लिंग के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है? हालांकि, सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन के लिए जिम्मेदार त्रावणकोर देवस्थानम बोर्ड ने अदालत को चेताया था कि महिलाएं के प्रवेश पर पाबंदी को हटाने के गंभीर परिणाम होंगे. वहीं, मंदिर प्रशासन का कहना था कि वह मंदिर के गर्भ गृह में महिलाओं को प्रवेश देने का विरोध करता रहेगा.