भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बाद अब चुनाव आयोग की साख पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं. बीते साल नोटबंदी के फैसले को लेकर आरबीआई की स्वायत्तता और कार्यशैली आलोचना के घेरे में थी. अब हिमाचल प्रदेश में चुनाव की तारीखें घोषित करने के बाद चुनाव आयोग से सवाल पूछे जा रहे हैं. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा है कि जब हिमाचल प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं का कार्यकाल एक साथ खत्म हो रहा है तो चुनाव की तारीख का ऐलान सिर्फ एक के लिए क्यों. कुरैशी ने चुनाव आयोग के इस फ़ैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले हफ्ते के गुजरात दौरे से जोड़ दिया है. उन्होंने कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात दौरे को देखते हुए गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीख़ों का ऐलान नहीं करने का फैसला ‘शक करने का आधार’ पैदा करता है.

एसवाई कुरैशी के अलावा विपक्षी पार्टियां भी इस पर सवाल उठा रही हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, ‘अगर यदि प्रधानमंत्री आचार संहिता लागू होने के बाद जाते तो फिर वे एक कैंपेनर की हैसियत से जाते और लोकलुभावन और जुमलेबाजी भरे वायदे वहां नहीं कर पाते.’ इनके अलावा भाजपा की सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के राज्य सभा सांसद पवन वर्मा ने भी आयोग से इस फैसले पर जवाबदेही की मांग की है. उनका कहना है, ‘चुनाव आयोग को केवल पारदर्शी नहीं होना है, बल्कि दिखना भी है.’

इस बीच, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कांग्रेस पर आरोप लगाने के साथ ही चुनाव आयोग पर भी निशाना साधा है. उन्होंने कहा, ‘2012 में चुनावों में कांग्रेस की मदद के लिए चुनाव आयोग ने एक साथ गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया था.’ उनका आगे कहना था कि उस वक्त नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार को काम करने से रोकने के लिए आयोग ने कांग्रेस की शह पर चुनावी आचार संहिता लागू कर दी है. उधर, उस वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपथ ने विजय रूपाणी के आरोप बेबुनियाद बताते हुए खारिज किया है. उनका कहना है कि आयोग हमेशा स्वतंत्रता और उच्चतम परंपरा का पालन करता है, वह कभी अपने संवैधानिक कर्तव्यों से समझौता नहीं करता है.

संभावनाएं जताई जा रही थीं कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान साथ होगा. इसकी वजह यह थी कि दोनों राज्यों की मौजूदा विधानसभाओं का कार्यकाल जनवरी में ही पूरा हो रहा है. हिमाचल प्रदेश की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अगले साल सात जनवरी को खत्म हो रहा है जबकि गुजरात के लिए यह तारीख 22 जनवरी, 2017 है. लेकिन आयोग ने गुरुवार को सिर्फ हिमाचल प्रदेश के लिए चुनाव और मतगणना की तारीख की घोषणा की. इसके अलावा उसने एक और चकित करने वाला कदम उठाया. गुजरात चुनाव के लिए मतदान की तारीखें बताए बिना ही उसने नतीजे घोषित करने की तारीख (18 दिसंबर) का ऐलान कर दिया. शायद यह देश के चुनावी इतिहास में पहला मौका है जब किसी चुनाव के लिए इस तरह का ऐलान किया गया है.

उधर, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक चुनाव आयोग ने माना है कि गुजरात सरकार ने औपचारिक तौर पर उनसे यह गुजारिश की है कि राज्य के सात बाढ़ प्रभावित जिलों में राहत और पुनर्वास का काम चल रहा है और ऐसे में अगर चुनाव आचार संहिता लागू हुई तो यह काम बुरी तरह प्रभावित होगा. इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोति का कहना था, ‘आयोग नहीं चाहता कि हिमाचल चुनाव के नतीजों का असर गुजरात के चुनावों पर पड़े इसलिए, गुजरात में चुनाव 18 दिसंबर से पहले होंगे.’ इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों राज्यों में चुनाव की तारीखों का एक साथ ऐलान न किए जाने को बड़ा मुद्दा मानने से इनकार किया. उन्होंने इसके पक्ष में साल 2002-03 के चुनावों का उदाहरण भी दिया.

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक आयोग की यह बात सच है कि साल 2002-03 में दोनों राज्यों के चुनाव की तारीखों का ऐलान एक साथ नहीं किया गया था. हालांकि, इसके साथ चुनाव के नतीजे घोषित करने की तारीखें भी अलग-अलग थीं. उस साल आयोग ने गुजरात चुनाव के लिए 28 अक्टूबर, 2002 को तारीखों का ऐलान किया था. इसके मुताबिक 12 दिसंबर को मतदान हुआ था और 15 दिसंबर को इसके नतीजे घोषित किए गए थे. दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश चुनाव के लिए 11 जनवरी, 2003 को तारीखों का ऐलान किया गया था. राज्य में 26 फरवरी को मतदान और एक मार्च को नतीजों के ऐलान की तारीख तय की गई थी. इसके अलावा साल 1998, 2007 और 2012 में दोनों राज्यों के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान एक साथ ही किया गया था. इन चुनावों में मतदान की तारीखें अलग- अलग थीं लेकिन, इसके नतीजे एक ही दिन घोषित किए गए थे. एसवाई कुरैशी की आशंका को इस बात से भी बल मिलता है कि इस साल की शुरुआत में पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में होने वाले चुनावों की तारीखों का भी ऐलान एक साथ ही किया गया था. उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नसीम जैदी थे.

अचल कुमार जोति का चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति मई, 2015 में की गई थी. इसके एक साल बाद छह जुलाई, 2017 को उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी संभाली. 1975 बैच के प्रशासनिक अधिकारी अचल कुमार जोति चुनाव आयुक्त नियुक्त होने से पहले गुजरात में कई महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं. इनमें 2010 से 2013 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य सचिव की जिम्मेदारी भी थी.

जानकार बताते हैं कि कांग्रेस के आरोप और एसवाई कुरैशी की आशंका कितनी वाजिब है, इसकी पुष्टि आने वाले दिनों में हो सकती है. इनका मानना है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने गुजरात दौरे में बड़े लोकलुभावन ऐलान करते हैं तो आयोग के इस फैसले पर और मजबूती से सवालिया निशान लगाए जा सकते हैं. इसके अलावा आगे चुनाव आयोग गुजरात के लिए मतदान की तारीख 14 दिसंबर के आस-पास तय करता है तो भी विपक्ष आयोग को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर सकता है. इससे पहले भाजपा ने चुनाव आयोग से 14 दिसंबर के बाद चुनाव कराने की मांग की थी.

जानकारों ने आयोग की इस दलील पर भी सवाल उठाया है कि यदि गुजरात चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान अभी किया जाता है तो बाढ़ प्रभावित जिलों में राहत और पुनर्वास के काम प्रभावित होंगे. आचार संहिता के मुताबिक चुनावी तारीखों के ऐलान बाद सरकार नई घोषणाएं नहीं कर सकती, लेकिन पहले से की गई घोषणा और कार्यक्रमों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है. इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के मामले में आयोग के फैसले को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. राज्य के लोगों को नई सरकार के लिए एक महीने से अधिक का इंतजार करना होगा. साथ ही, प्रशासनिक स्तर पर भी पंगुता की स्थिति रहने की आशंका जताई जा रही है. आयोग के इस कदम से उसके उस हालिया दावे पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं जिसमें उसने कहा था कि वह सितंबर, 2018 के बाद लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए तैयार है.

चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए अब तक कोई कानूनी प्रावधान नहीं

संविधान लागू होने के 67 साल बाद भी देश की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए कोई तय प्रक्रिया नहीं है. अब तक की परंपरा के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा चुनाव आयुक्त के पद के लिए चुने गए नाम पर राष्ट्रपति अपनी मुहर लगाते हैं. साथ ही, आयोग में तीन आयुक्तों में से सबसे वरिष्ठ को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नियुक्ति की जाती है. इस बारे में बीते जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से पूछा था कि आयोग में नियुक्ति को लेकर कानून क्यों नहीं है. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता होना जरूरी है क्योंकि, वे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने जैसा महत्वपूर्ण काम करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग में नियुक्ति को लेकर चल रही सुनवाई के बीच बीते अगस्त में सरकार ने संसद को बताया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कानून बनाने पर फिलहाल कोई विचार नहीं किया जा रहा है. इससे पहले मार्च, 2015 में चुनाव सुधार संबंधी अपनी रिपोर्ट में विधि आयोग ने कहा था कि चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त सहित सभी आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तीन सदस्यीय कॉलेजियम या चयन समिति की सलाह पर की जानी चाहिए. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में नेता विपक्ष या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होने चाहिए.

विधि आयोग के अलावा साल 2012 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी चुनाव आयोग के लिए कॉलेजियम व्यवस्था बनाने की मांग की थी. उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था कि केवल प्रधानमंत्री की सिफारिश पर होने वाली ये नियुक्तियां लोगों में भरोसा नहीं जगा पाती हैं और इनमें पक्षपात का जोखिम बना रहता है. हालांकि लगता है कि पार्टी ने अब यह बात बिसरा दी है.