निर्देशक : सात्विक मोहंती

लेखक : सात्विक मोहंती

कलाकार : सौंदर्या शर्मा, हिमांश कोहली, पितोबाश, जिमी शेरगिल, अनुपम खेर, सतीश कौशिक, ताहा शाह, हैरी बाला, प्रदीप सिंह

रेटिंग : 1 / 5

वक्त आ गया है कि हमारे यहां भी अमेरिका की तर्ज पर कुछ आलसी और बेमतलब की फिल्मों को सीधे टीवी और डीवीडी पर रिलीज किया जाए. या फिर सीधे उस इंटरनेट पर जोकि सिनेमा से लगन लगा चुके नवागंतुकों के शुरुआती प्रयासों के लिए एकदम मुफीद जगह बन चुका है.

इन अझेल फिल्मों के बोझ से थियेटर वाले स्पेस को बचाए रखना इसलिए भी जरूरी है,क्योंकि तभी दर्शकों की लगन बड़े परदे से लगी रहेगी, और ‘रांची डायरीज’ जैसी फिल्म देखने के बाद कोई शोकाकुल दर्शक यह नहीं कहेगा –‘भाई टिकिट के छोड़, इस फिल्म से तो पार्किंग तक के पैसे वसूल नहीं हुए!’

‘रांची डायरीज’ नए-नवेले निर्देशक सात्विक मोहंती ने लिखी और बनाई है जिसके अगर वे सिर्फ अच्छे हिस्से इकट्ठे कर लेते तो भी आराम से 15-20 मिनट की बेहतर शॉर्ट फिल्म बना सकते थे. लेकिन फीचर फिल्म बनाने की महत्वाकांक्षा स्थापित निर्देशकों तक से दो अंगुल बराबर कहानी पर दो घंटे लंबी यातनाएं बनवाती रही है इसलिए कसूर अकेला मोहंती साहब का भी नहीं है. उन दर्शकों का भी है जो ऐसी फिल्मों को देखने का सोचता भी है.

इस फिल्म की कहानी झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले कुछ युवा नमूनों और अजूबों की है, जो बिहारी एक्सेंट के साथ हास्य पैदा करने वाली फिल्मी हिंदी बोलते हैं और अपना कर्जा पटाने के लिए बैंक डकैती को अंजाम देते हैं. इन युवाओं में ही फिल्म का नायक मनीष शामिल है (हिमांश कोहली, जिन्हें अभिनय का अ ढूंढ़ने में ही अभी दो-तीन साल और लगेंगे) जिसे अपने स्कूल दोस्त के साथ एक मुश्किल में फंसने के बाद बुर्का पहनकर बैंक लूटना पड़ता है. स्कूल के इस दोस्त की भूमिका ताहा शाह ने निभाई है जिन्होंने फिल्म का इकलौता प्रभावी अभिनय किया है. नायिका सौंदर्या शर्मा भी इन दोनों के ही गैंग का हिस्सा हैं और न सिर्फ वे प्रेमी संग भागकर पॉप सिंगर बनना चाहती हैं बल्कि ‘सीक्रेट’ नामक बहुचर्चित किताब पढ़कर नायक को हमेशा पॉजिटिव रहने का पाठ भी पढ़ाती हैं! अभिनय का मत पूछिए, क्योंकि बिना शक उनके अभिनय में कोई सौंदर्य नहीं है.

इनके अलावा फिल्म में नक्सली हैं, जमींदार के रूप में अनुपम खेर हैं (जिन्होंने फिल्म में केसरिया सलाम की जगह ‘लाल सलाम’ बोला है!) और जिमी शेरगिल युक्त पुलिस है. ये सारे पात्र जब आपस में टकराते हैं तो किसी भी क्राइम कैपर फिल्म की तरह उम्मीद जगाते हैं कि कन्फ्यूजन और हास्य मिलकर हमारा मनोरंजन करेगा. लेकिन फिल्म की पटकथा इतनी टूटी-फूटी और दिशाहीन है कि ज्यादातर बार तो वो होता है जो हजारों बार हिंदी ही फिल्मों में देखा हुआ होता है. इसके अलावा बाकी बार कभी भी कुछ भी होने लगता है (यशराज की ‘बैंक चोर’ की भी तरह) और सिर्फ कुछ चतुर संवाद और अजीबोगरीब सिचुएशन ही कभी-कभी स्तरीय होकर ध्यान खींचती हैं.

इन्हीं संवादों और सिचुएशन्स के दौरान पता चलता है कि मोहंती साहब के पास उन बेहद छोटी और महीन चीजों को सीन में शामिल करने का हुनर है, जो बैकग्राउंड का हिस्सा होकर परदे पर तुरंत ध्यान नहीं खींच पातीं. वे कभी अंग्रेजी फिल्मों से रेफरेंस लेकर ‘गॉडफादर’ और ‘ओशन इलेवन’ जैसी फिल्मों को हिंदी में ‘माई-बाप’ और ‘समंदर ग्यारह’ का रूप दे देते हैं, तो कभी एक मारुति वैन पर अमेरिकी रेफरेंस लेकर ‘शेरिफ’ और ‘एफबीआई पुलिस’ लिख देते हैं. ह्यूमर की चाह में गढ़ी गईं ये छोटी-छोटी चीजें उम्मीद देती हैं कि यह निर्देशक-लेखक आगे चलकर काम उम्दा करेगा.

दृश्यों को अजीबोगरीब बनाने का उनका हुनर भी देखिए, एक जगह बैंक डकैती के दौरान बाहर गाड़ी में इंतजार कर रहे दो साथियों में से एक कहता है कि यार अंदर बहुत टाइम लग रहा है, तू तब तक मुझे कार चलाना सिखा दे! इसके बाद कुछ देर बकैती करने के बाद दोनों अंधेरी रात में कार चलाने निकल जाते हैं और इस बेवकूफी की वजह से जो गफलत होती है वो आगे कहानी में जुड़कर थोड़ा और हास्य पैदा करती है.

लेकिन दिक्कत यह है कि यह सारी चीजें देखने वाले को तभी भा सकती हैं जब उसे फिल्म से कोई खास उम्मीद न हो या फिर वो उन्हें मुफ्त में घर बैठकर टेलीविजन पर देख रहा हो, और टुकड़ों में देख रहा हो. या फिर अंजान सी कोई हिंदी वेब सीरीज देख रहा हो और बोर होने पर फॉर्वर्ड करने का विकल्प साथ लेकर बैठा हो. डेढ़-दो घंटे तक एकाग्र होकर थियेटर में बैठे दर्शक के लिए तो सिर्फ चुस्त पटकथा और उसका नयापन ही किसी फिल्म को दुरुस्त बना सकता है, और यह काबिलियत ‘रांची डायरीज’ के पास है नहीं. क्योंकि वो फिल्म नहीं है, फिल्म बनाने की एक कोशिश भर है.

‘रांची डायरीज’ में जिमी शेरगिल भी हैं जो तब तो बहुत सही लगते हैं जब अपने आसपास मौजूद मूर्ख पुलिस वालों की हरकतों पर हैरान हो-होकर थक जाते हैं, लेकिन बाकी जगहों पर उनका होना उनके स्तर का काम नहीं लगता.

एफटीआईआई के नए सर्वेसर्वा अनुपम खेर भी फिल्म में हैं. बतौर अभिनेता कुछ नहीं करते हुए, और बतौर निर्माता मोदी सरकार के एक बेहद विवादित फैसले की तारीफ करते हुए!