केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एक नया प्रस्ताव तैयार कर रही है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस प्रस्ताव के तहत व्यक्ति विशेष, आवासीय साेसायटियों, टाउनशिप्स, अपार्टमेंट्स, औद्योगिक इकाईयों, क्लबों आदि सभी से जल संरक्षण फीस भी वसूली जाएगी. यह फीस उनके पानी के बिल में जुड़कर आएगी.

अख़बार के मुताबिक केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय दिशा-निर्देशों का प्रस्ताव तैयार कर रहा है. इसके मुताबिक संबंधित इकाई द्वारा बोरवैल के ज़रिए ज़मीन के नीचे का जितना पानी इस्तेमाल किया जाएगा उसके हिसाब से ही जलसंरक्षण फीस ली जाएगी. इसके साथ ही औद्योगिक और खनन इकाइयों सहित मूलभूत ढांचे से संबंधित निजी परियोजनाओं के लिए यह अनिवार्य किया जाएगा कि बोरवैल खोदने से पहले सक्षम अधिकारी से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लें. एनओसी की अनिवार्यता से सिर्फ किसानों को छूट हासिल होगी.

केंद्र सरकार के सूत्रों के मुताबिक देश में ज़मीन के नीचे के पानी का दोहन बेतहाशा हो रहा है. इससे इसकी स्थिति भी लगातार चिंताजनक होती जा रही है. आंकड़े बताते हैं कि देश के 6,607 विकासखंड, मंडल, तालुका और जिलों में से 1,071 में ज़रूरत से बेहद ज़्यादा ज़मीन के नीचे के पानी का दोहन हो रहा है. इनमें से 217 इलाके तो अतिगंभीर और 697 जगहें गंभीर स्थिति में पहुंच गए हैं. इसीलिए इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए देशव्यापी स्तर पर एक समान दिशानिर्देशों आदि की ज़रूरत महसूस की गई है.

हालांकि जलसंरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय संगठन और कार्यकर्ता इंतज़ाम से नाखुश हैं. साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल्स (एसएएनडीआरपी) के संयोजक हिमांशु ठक्कर सरकार के दिशा-निर्देशों की आलोचना करते हैं. उनके मुताबिक, ‘दिशा-निर्देशाें में पेनाल्टी फीस का तो बंदोबस्त है पर ज़मीन के नीचे के पानी के रीचार्ज की आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया गया है. इन दिशा-निर्देशों का मतलब तो ये है कि अाप भुगतान कीजिए और जितना चाहे उतना पानी इस्तेमाल कीजिए. इससे तो स्थिति और गंभीर ही होगी.’