क्या लिखें और क्या न लिखें? क्या छापें और क्या न छापें? ये प्रश्न हमेशा ही लेखकों,संपादकों और प्रकाशकों के सामने आते हैं. खबरनबीसों के लिए इसकी एक कसौटी जॉर्ज ऑरवेल ने बना दी थी. उनके मुताबिक़ खबर तो वह है जिसे ताकतवर या कोई भी दबाने या छिपाने की कोशिश करता है. इसके अलावा बाकी सब जो छपता है वह जन संपर्क या प्रचार है.

साहित्य के मामले में भी लगभग यही बात लागू होती है. क्या उसे पढ़ने में आनंद आता है? क्या उसमें नयापन है और क्या उसे पढ़कर कहा जा सकता है कि हां! इससे फर्क पड़ता है? बर्तोल्त ब्रेख्त इस बात को एक दूसरे तरीके से कहते हैं. उनका कहना है कि लिखा वह जाना चाहिए जो महत्त्वपूर्ण हो. बारिश में बूंदें नीचे को गिरती हैं और कुर्सी में एक पीठ होती है, यह भी सच है या यथार्थ है लेकिन वह कुछ ऐसा नहीं जो क्षण या समय के महत्त्व को चिह्नित करता हो. ऐसा लिखते चले जाने का, जो यथार्थ के वर्णन का भ्रम पैदा करे, कोई अर्थ नहीं.

जो लिखें वह यथार्थ की हमारी समझ में कुछ इजाफा करे. फिर तो उसके मायने हैं. वरना वह शब्द का अपव्यय है. यह बात सामान्य समय के लिए जितनी ज़रूरी है, गैरमामूली वक्तों के लिए और भी अहम हो उठता है. यही बात पढ़ने या कुछ करने के बारे में कही जा सकती है. पढ़ना हो या लिखना या कुछ करना उसे यथार्थ की हमारी समझ तो बदलनी ही चाहिए,उसमें उसे एक प्रकार का सार्थक हस्तक्षेप भी होना चाहिए.

कुछ वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद में एक के रामानुजन के लेख ‘तीन सौ रामायण’ पर बहस हो रही थी. वह हिन्दू भावनाओं को आहत करनेवाला लेख है, यह आरोप उसपर लगाया गया था. परिषद् में कुलपति ने उसे हटाने का प्रस्ताव रखते समय सुविधा का तर्क पेश किया. उन्होंने और उनके समर्थकों ने कहा कि बात पढ़ने की ही तो है और लेख आखिर इतिहास विभाग के छात्रों को पढ़ना है तो फिर इसकी जगह उन्हें महत्त्वपूर्ण इतिहासकारों के दूसरे लेख दिए जा सकते हैं.

लेकिन सवाल एक एक बदले दूसरा लेख पढ़ लेने भर का न था. रामानुजन का लेख देखने और पढ़ने के तरीकों के बारे में था. एक ही राम की कितनी कथाएं हो सकती हैं और वे सब एक दूसरे के साथ में ही जीवंत होती हैं, यह कहने की कोशिश इस लेख में थी. इसे पढ़ने के स्थान पर कुछ भी पढ़ लेने का कोई अर्थ न था. परिषद् के किसी सदस्य ने यह भी कहा कि अगर एक लेख नहीं ही पढ़ा तो क्या फर्क पड़ जाएगा.

यह तर्क प्रायः सुनने को मिलता है. महात्मा गांधी के समक्ष यह समस्या दूसरे रूप में आई. समय दूसरे विश्व युद्ध का था. अंग्रेजों के जर्मनों से युद्ध में भारत को अंग्रेजों का सहयोग तभी करना चाहिए जब अंग्रेज़ भारत छोड़कर जाने को राजी हो जाएं, यह गांधी और कांग्रेस का कहना था. अंगरेज़ यह मानने को तैयार न थे. गांधी ने अंग्रेजों के रवैये के खिलाफ विरोध जाहिर करने के लिए व्यक्तिगत अवज्ञा आन्दोलन की घोषणा की.

यह सामूहिक आन्दोलन न था. जिसे गांधी चुनें वही अकेला युद्ध में किसी भी सहयोग से इन्कार की अपील करते हुए बढ़ता रहेगा. जब वह गिरफ्तार हो जाए, दूसरा आन्दोलनकारी अपना काम शुरू कर देगा. गिरफ्तारी ख़त्म होने पर फिर पहले की तरह ही युद्ध विरोधी अभियान शुरू कर देना था.

विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही चुना गया था. गांधी ‘हरिजन’ नामक अखबार भी निकालते थे. विनोबा का अभियान शुरू होने पर उसकी खबर ‘हरिजन’ में छपती ही. लेकिन उसके पहले ही सरकारी फरमान आ गया कि ‘हरिजन’ में विनोबा के अभियान से जुड़ी कोई खबर या लेख नहीं छापा जा सकता. उसे छोड़कर शेष कुछ भी छापने की आज़ादी थी.

गांधी ने अपने पाठकों को यह समस्या बताई. यह ठीक है कि हरिजन में सिर्फ राजनीतिक विषय पर लेख नहीं छपते थे. भीषण राजनीतिक उथल पुथल के बीच भी गांधी इस तरह के विषय पर लेख लिखना भी ज़रूरी समझते थे कि क्यों खादी रुखड़ी पहनी जानी चाहिए. अभी भी पाबंदी तो एक ही प्रकार के विषय पर लगी थी. दूसरे विषयों पर लिखा जा ही सकता था.

गांधी के लिए मसला इतना सीधा न था. सरकारी फरमान ने यह साफ़ कर दिया था कि क्या लिखना या पढ़ना उस वक्त सबसे आवश्यक था. ऑरवेल की परिभाषा मुताबिक़ भी यह वही हो सकता था जो ब्रिटिश हुकूमत छपने नहीं देना चाहती थी. लेकिन उसे छापने का मतलब था ‘हरिजन’ की जब्ती या उसपर जुर्माना.

गांधी ने अपने पाठकों को लिखा कि अभी उन्होंने व्यक्तिगत अवज्ञा या सत्याग्रह का ही निर्णय किया है और उनका कोई इरादा दूसरे क़ानून को तोड़ने का नहीं है. लेकिन विनोबा भावे के अभियान के बारे में लिखना ही अभी का सबसे ज़रूरी काम है. उसपर कुछ न छापकर दूसरे विषयों पर लिखकर ‘हरिजन’ को बचाया तो जा सकता था लेकिन उसकी प्रासंगिकता जाती रहती.

गांधी ने निर्णय किया कि अगर वे विनोबा भावे के अभियान पर नहीं लिख सकते तो फिर ‘हरिजन ’ के निकलते रहने का अभी कोई अर्थ नहीं है. उन्होंने पाठकों को सूचित किया कि वे अभी ‘हरिजन’ का प्रकाशन स्थगित कर रहे हैं.

गांधी का सिद्धांत बहुत सरल है, भले ही उसपर अमल कठिन हो. वह यह है कि मैं अगर वह नहीं बोल सकता जो अभी बोला ही जाना चाहिए तो मैं चुप हो जाना बेहतर समझता हूं. यह चुप निरर्थक बोलते रहने से कहीं अधिक मुखर है. हमारे कवि के शब्दों में इस चुप में एक दहाड़ है. लेकिन इसमें आत्मनिषेध के अलावा भी कुछ है. अगर अखबार निकलता रहे और उसमें कुछ न कुछ छपता ही रहे तो सब कुछ सामान्य होने का भ्रम बना रहता है. लेकिन अगर कुछ छपे ही नहीं या कुछ बोला ही न जाए तो यह खामोशी तुरंत बता देती है कि कहीं कुछ गड़बड़ है. सत्ता हमेशा माहौल के सामान्य होने का दावा करती है. यह दावा उसके हाथ से छीन लिया जा सकता है, बोलकर नहीं, न बोलने का फैसला करके.

फर्ज कीजिए, आज हमारे अखबार या चैनल जिनके सम्पादक या मालिक निजी बातचीत में दबाव और ऊपर से निगरानी का रोना रोते हैं अगर दीवाली और स्वच्छता अभियान की खबरें दिखाते रहकर जीवित रहने की जगह निर्णय कर लें कि वे न कुछ छापेंगे न दिखाएंगे. यह अपने आप में न तो किसी क़ानून का उल्लंघन होगा, न किसी को चुनौती होगी. यह सिर्फ अपनी और अभी की स्थिति का स्वीकार होगा.

लेकिन क्या यह किया जा सकता है? क्योंकि इतना करने के लिए फिर गांधी की नैतिक स्पष्टता की ज़रूरत होगी और वह दुर्लभ है.