ईरान परमाणु समझौता वैश्विक स्तर पर विवाद की एक बड़ी वजह बनता दिखाई दे रहा है. बीबीसी के मुताबिक शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को प्रमाणित करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ईरान पर इस समझौते की शर्तों का पालन न करने का आरोप लगाया. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सरकार कट्टरपंथी बताया और उस पर आतंकवाद को मदद पहुंचाने का भी आरोप लगाया.

ईरान के साथ 2015 में हुए इस परमाणु समझौते में सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी देश - अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, जर्मनी और रूस शामिल हैं. इसके तहत ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दिया था, जिसके बदले में अन्य देशों ने उस पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया था. इसकी शर्तों के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रत्येक 90 दिन पर यह प्रमाणित करना होता है कि ईरान सभी शर्तों का पालन कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले दो बार इसे प्रमाणित कर चुके हैं. हालांकि, उनके इनकार के बाद अब अमेरिकी संसद कांग्रेस को 60 दिन के भीतर फैसला करना है कि अमेरिका इस समझौते को जारी रखे या ईरान पर नए प्रतिबंध लगाकर इससे अलग हो जाए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले पर ईरान और अन्य देशों की तीखी प्रतिक्रिया आई है. डोनाल्ड ट्रंप के आरोपों को खारिज करते हुए ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने उनके फैसले को ईरानी जनता के साथ साजिश बताया है. उन्होंने आगे कहा, ‘उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप) अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं पढ़ा है. क्या कोई राष्ट्रपति बहुपक्षीय समझौते को अकेले अपने फैसले से रद्द कर सकता है?’ हसन रूहानी ने आश्वासन दिया कि ईरान इस परमाणु समझौते की शर्तों का पालन करता रहेगा.

उधर, इस समझौते में शामिल ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने खुद को इससे बंधा बताया है. इसके साथ उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम के संभावित असर को लेकर चिंता भी जताई है. वहीं, यूरोपीय संघ और रूस ने ट्रंप के इस फैसले को मध्य पूर्व में अस्थिरता फैलाने और उत्तर कोरिया के साथ विवाद को हल करने में बाधा डालने वाला बताया है.