सुप्रीम कोर्ट ने नौ अक्टूबर को एक बड़ा फैसला लेते हुए दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर एक नवंबर तक रोक बढ़ाने का फैसला किया है. शीर्ष अदालत ने एक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह इस पाबंदी से दीवाली के बाद क्षेत्र में प्रदूषण के स्तर पर पड़ने वाले असर का आकलन करना चाहती है.

इसके बाद दिल्ली-एनसीआर के पटाखा कारोबारियों ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ एक याचिका दायर की. इसमें शीर्ष अदालत के एक आदेश का हवाला देते हुए कारोबारियों ने कहा था कि उन्होंने दीवाली को ध्यान में रखकर पटाखों का काफी स्टॉक जमा कर लिया है और अब इस पाबंदी से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है. इससे पहले सितंबर, 2017 में शीर्ष अदालत ने पटाखों की बिक्री पर पूर्ण पाबंदी को ‘अतिवादी’ कदम बताया था और इसे आंशिक तौर पर हटा लिया था. बीते शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कारोबारियों की इस याचिका को भी खारिज कर दिया.

देश के करीब-करीब सभी प्रमुख अखबारों ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के स्वागत करते हुए इसके अलग-अलग पहलुओं को पाठकों के सामने रखा है. हिंदी के कुछ अखबारों ने दीवाली के मौके पर पटाखे छोड़ने को परंपरा और लोगों की खुशी का हिस्सा बताया है. इसके अलावा कइयों ने पटाखा कारोबारियों पर अदालत के इस फैसले के बुरे असर की भी बात पुरजोर तरीके से उठाई है. इन सब बातों के अलावा कुछ अखबारों ने पटाखों को प्रदूषण बढ़ाने के लिए जिम्मेदार कारणों का केवल एक हिस्सा माना है. इनका कहना है कि पटाखों पर रोक के अलावा भवन निर्माण से होने वाले प्रदूषण और पड़ोसी राज्यों में फसल के बाकी बचे हिस्से को जलाने पर उचित नियमन की जरूरत है.

दैनिक भास्कर ने पटाखों की वजह से प्रदूषण की बात स्वीकार करते हुए इसके परंपरा का हिस्सा होने और धार्मिक-सांस्कृतिक पक्ष की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से पटाखा कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ने की भी बात उठाई है. 11 अक्टूबर को अखबार का संपादकीय अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहता है कि दिल्ली-एनसीआर में पटाखों का कारोबार 1,000 करोड़ रुपये का है. यदि इन्हें सुप्रीम कोर्ट से अस्थायी अनुमति न मिली होती तो वे शायद ही पटाखों का इतना स्टॉक रखते. आखिर में कहा गया है कि यदि सुप्रीम कोर्ट किसी मुद्दे पर जोर का झटका धीरे से लगाए तो समाज को सुधरने और संभलने का मौका मिलता है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर प्रमुख कारोबारी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स का मानना है कि नुकसानदेह सामाजिक परंपराओं को दूर करने में अति न्यायिक सक्रियता शायद ही कभी कारगर साबित होती है. अखबार ने 11 अक्टूबर को प्रकाशित संपादकीय में लिखा है कि ऐसी परंपराओं को तब ही दूर किया जा सकता है, जब न्यायपालिका लोगों के स्वास्थ्य का हवाला देते हुए इसकी जिम्मेदारी सरकार पर डाले. साथ ही. लेख के मुताबिक ऐसे फैसले अचानक देने का नतीजा यह होता है कि ये लागू नहीं हो पाते और इससे न्यायपालिका की ही मानहानि होती है.

हिन्दुस्तान ने वायु प्रदूषण के लिए पटाखों के साथ-साथ खेतों में फसल निकालने के बाद इसके बाकी बचे हिस्से को जलाने को भी जिम्मेदार ठहराया है. बीते शनिवार को प्रकाशित संपादकीय में अखबार लिखता है कि अब तक न तो पटाखों से फैलते जहर से निजात पाने का स्थाई इंतजाम हुआ है और न ही खेतों से उठती आग से छुटकारा पाने का कोई कारगर समाधान खोजा गया है. इसने आगे दोनों मामलों में सरकारी मशीनरी को जिम्मेदार ठहराया है. साथ ही, इन खतरों को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने की पैरवी भी की है.

द हिंदू ने दीवाली से केवल 10 दिन पहले दिए गए इस फैसले को लेकर आपत्ति जाहिर की है. साथ ही, अखबार ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के अन्य कारणों जैसे- निर्माण कार्य से पैदा होने वाली धूल, वाहनों से होने वाले प्रदूषण, कचरे को जलाए जाने और खेतों में आग की बात उठाई है. अखबार कहता है कि इन सब समस्याओं से निपटने के लिए सुनियोजित और व्यापक नीति की जरूरत है न कि लोगों की मुश्किलें बढ़ाने और बिना विचार किए लगाए जाने वाली रोक की.

अमर उजाला ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के व्यावहारिक पहलुओं की तरफ ध्यान खींचा है. अखबार ने संपादकीय के जरिए कहा है कि पटाखों की बिक्री पर रोक तो लगाई गई है लेकिन, इन्हें छोड़ने पर कोई रोक नहीं है. साथ ही, इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि पटाखों से हजारों कारोबारियों की रोजी-रोटी का सवाल भी जुड़ा हुआ है.

दैनिक जागरण ने पटाखे छोड़ने से होने वाले नुकसान को लेकर आम लोगों को जागरूक करने की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश पर कुछ आपत्तियां दर्ज की हैं. बीते मंगलवार को प्रकाशित संपादकीय में अखबार कहता है कि शीर्ष अदालत ने अपने एक आदेश में करीब एक महीने पहले संशोधन कर कुछ शर्तों के साथ पटाखे बेचने की इजाजत दे दी थी. इसके बाद पटाखे बनाने और इसे बेचने वालों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दीं. अब सुप्रीम कोर्ट को भी इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा कि इनके नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?