क्या कभी रोहित शेट्टी नकली अक्षय कुमार भी थे?
यह तो सभी जानते हैं कि फिल्ममेकर बनने से पहले रोहित शेट्टी सहायक निर्देशक थे और 30 साल की उम्र में उन्होंने बतौर निर्देशक उन्हीं अजय देवगन के साथ अपनी पहली फिल्म ‘जमीन’ बनाई थी जिनकी पहली फिल्म में वे 17 वर्ष की आयु में पहली बार असिस्टेंट डायरेक्टर बने थे. यानी कि ‘फूल और कांटे.’ लेकिन हाल ही में ‘गोलमाल 4’ प्रमोट करते वक्त शेट्टी ने यह खुलासा किया कि एक जमाने में वे नकली अक्षय कुमार भी थे!

बात 1994 में आई ‘सुहाग’ की है जिसमें अक्षय कुमार के साथ अजय देवगन भी हीरो थे और करिश्मा कपूर व नगमा नायिकाएं थीं. रोहित शेट्टी, कुकू कोहली के निर्देशन में बन रही उस फिल्म में सह-निर्देशक थे और अजय-अक्षय को सर-सर कहकर सम्बोधित करते थे. साथ ही, फिल्म में वे अक्षय कुमार के बॉडी डबल बने थे और उनके जैसा चलना भी सीखा था. ताकि जरूरत पड़ने पर न सिर्फ कैमरे के लिए अक्षय कुमार की पीठ बन सकें, बल्कि जरूरत पड़ने पर पीठ दिखाकर अक्षय कुमार की तरह चलते हुए कैमरे से दूर भी जा सकें!
मनोज बाजपेयी की खरी-खरी
मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों द्वारा व्यक्त की गई चिंता कभी-कभी चिंतन लायक होती हैं. हाल ही में कुंदन शाह के गुजर जाने के बाद तकरीबन पूरी ही फिल्म इंडस्ट्री ने शोक मनाया, कइयों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी, और सबसे बेहतरीन ट्रिब्यूट नसीरुद्दीन शाह ने लिखा. लेकिन बेहतरीन फिल्मों में हमेशा ही बेहतरीन से आगे का अभिनय करने वाले मनोज बाजपेयी ने सबसे खरी बात कही.
अपनी आने वाली कम बजट की फिल्म ‘रुख’ पर बात करने के दौरान जब मनोज से कुंदन शाह के बारे में पूछा गया तो पहले तो उन्होंने कुंदन शाह के काम की वाजिब सराहना की, फिर उस सच को बोला जो कभी चलन से बाहर नहीं जाता, लेकिन बोला नहीं जाता. मनोज ने कहा कि कुंदन शाह सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में नहीं बनाते थे बल्कि जरूरी सामाजिक संदेश भी देते थे. वे एक निराले फिल्मकार थे और गजब के विचारक भी. चाहे ‘जाने भी दो यारों’ हो, या ‘कभी हां कभी न’ और ‘क्या कहना ‘, ये सभी कॉमेडी या रोमांटिक जॉनर की फिल्में भर नहीं थीं, बल्कि इन्होंने प्रतिबंधित सामाजिक विषयों पर बात की थी और हमारे समाज की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे.
आखिर में मनोज ने यह भी कहा कि, ‘(बावजूद यह जानते हुए भी कि कुंदन शाह महान फिल्मकार थे) हमारे बॉलीवुड में यह अकसर होता है...जब ग्रेट टैलेंट जिंदा होता है तब हम उसकी वाजिब तारीफ नहीं करते, और जब वो मर जाता है तो उसके बारे में महान-महान बातें करते हैं.’
‘तलवार दंपति की रिहाई के बाद से ही बहुत लोगों के फोन आ रहे हैं. मुख्य रुप से यही फीडबैक आ रहा है कि सिनेमा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक फिल्म ने हर किसी का ओपीनियन बदला हो…अदालत के फैसले से एक बात तो तय है कि ‘तलवार’ ने बहुत गहरे तक असर छोड़ा है.’
— विशाल भारद्वाज, तलवार फिल्म के निर्माता और लेखक
फ्लैशबैक | जब मधुबाला की वजह से बीआर चोपड़ा ने कोर्ट के चक्कर काटे…
यश चोपड़ा के बड़े भाई बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा) को फिल्मों में ‘नया दौर’ (1957) ने स्थापित किया था. दिलीप कुमार और वैजयंती माला अभिनीत इस फिल्म ने न सिर्फ अपने दौर में गोल्डन जुबली मनाई थी, बल्कि आज भी इसे हिंदी की महान फिल्मों में गिना जाता है. बनने के 50 साल बाद 2007 में इसका रंगीन संस्करण थियेटरों में रिलीज हुआ था और तब भी उसने दर्शकों को लुभाकर साबित किया था कि आदमी और मशीन के बीच की लड़ाई की कहानी आज भी पहले जितनी ही मौजू है.
लेकिन ‘नया दौर’ की नायिका के रोल के लिए वैजयंती माला निर्देशक बीआर चोपड़ा की पहली पसंद नहीं थीं. बलदेव राज चोपड़ा ने तो दिलीप कुमार के अपोजिट उस वक्त उनकी प्रेमिका रहीं मधुबाला को साइन किया था. मधुबाला ने फिल्म के लिए तकरीबन 10 दिन की शूटिंग भी की थी और फिल्म के संगीत निर्देशक ओपी नैय्यर ने खास उनको ध्यान में रखकर आशा भोंसले की आवाज में ‘इक दीवाना आते-जाते हमसे छेड़ करे, सखी री वो क्या मांगे’ के मुखड़े वाला गीत रचा था. लेकिन इनडोर शूटिंग पूरी होने के बाद जब बीआर चोपड़ा एक लंबे आउटडोर शूटिंग शेड्यूल के लिए भोपाल से सटे ग्रामीण इलाके बुधनी में जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी मधुबाला के पिता ने उनकी नायिका को साथ भेजने से साफ इंकार कर दिया.
यह वो दौर था जब दिलीप कुमार और मधुबाला का रोमांस परवान चढ़ रहा था और मधुबाला के पिता अताउल्ला खान इस रिश्ते से बेहद खफा थे. इसी के चलते उन्होंने अपनी बेटी को अपनी निगरानी से बहुत दूर कई महीनों के आउटडोर शूटिंग शेड्यूल पर भेजने से मना कर दिया. वे यह भी जानते थे कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और कई महीनों के लिए दोनों को अकेला छोड़ दिया, तो फिर उनके लिए दिलीप-मधुबाला का रिश्ता तोड़ना नामुमकिन हो जाएगा.
इतिहास जानता ही है कि भविष्य में उनकी मर्जी का ही हुआ, लेकिन उस वक्त बीच भंवर में फंसे बीआर चोपड़ा ने उन्हें लाख मनाने की कोशिशें करने के बाद झुंझलाकर मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया. मधुबाला के पिता को उनका यह निर्णय भी पसंद नहीं आया – क्योंकि वे चाहते थे कि पूरी फिल्म इनडोर ही मुंबई में शूट की जाए – और उन्होंने बीआर चोपड़ा के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज कर दिया.
जैसा कि बीआर चोपड़ा ने बहुत बाद में दिए साक्षात्कारों में बताया कि फिल्म बनने के साथ-साथ ही इस मामले की सुनवाई भी हुई और जज साहब ने उनसे यह भी पूछा कि क्या वे इस फिल्म को सिर्फ इनडोर ही नहीं शूट कर सकते, ताकि मधुबाला भी फिल्म का हिस्सा बनी रहें. अपनी फिल्म के प्रति पूरी तरह ईमानदार बीआर चोपड़ा ने साफ इंकार कर दिया और दिलीप कुमार ने भी उनके पक्ष में ही गवाही दी. इसके बाद बनकर जिस दिन फिल्म रिलीज हुई, उस दिन जज साहब फिल्म देखकर बीआर चोपड़ा के पास आए और कहा कि वे सही थे, यह फिल्म सिर्फ आउटडोर लोकेशन पर ही बन सकती थी. इस तरह बीआर चोपड़ा अपने खिलाफ दायर केस जीते और बाद में मधुबाला ने उनके घर आकर माफी भी मांगी कि वे मजबूर थीं, इसलिए कुछ कर नहीं पाईं.
अगर कर पातीं, तो शायद ‘नया दौर’ के इस कालजयी गीत में आज हम दिलीप कुमार के साथ मधुबाला को देखने का सुख उठा रहे होते.
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