अमेरिकी प्रोफेसर रिचर्ड एच थेलर को अर्थशास्त्र का नोबेल | सोमवार, 09 अक्टूबर 2017

बीते सोमवार को साल 2017 के लिए अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार का ऐलान हो गया. इस बार यह पुरस्कार व्यवहारिक अर्थशास्त्र में योगदान के लिए अमेरिकी प्रोफेसर रिचर्ड एच थेलर को दिया गया है. पुरस्कार विजेता का चयन करने वाली संस्था रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के अनुसार रिचर्ड एच थेलर ने सीमित तार्किकता, सामाजिक वरीयता और आत्म नियंत्रण की कमी जैसे मानवीय लक्षणों के बीच संबंधों की खोज करते हुए इनसे व्यक्ति के निर्णय और बाजार पर आने वाले असर की व्याख्या पेश की है. एकेडमी ने आगे कहा है कि उनके योगदान से व्यवहारिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र को विस्तार मिला है, जिसने आर्थिक शोध और नीति निर्माण के दूसरे पहलुओं पर भी असर डाला है.

72 वर्षीय रिचर्ड एच थेलर शिकागो यूनिवर्सिटी में व्यवहारिक विज्ञान और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. वे बेस्टसेलर किताब ‘नज’ के सह-लेखक भी हैं. इसमें उन्होंने व्यवहारिक अर्थशास्त्र पर चर्चा की है, जिसका इस्तेमाल सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में होता है. अर्थव्यवस्था और मनोविज्ञान को मिलाते हुए रिचर्ड एच थेलर ने मानसिक लेखांकन (मेंटल अकाउंटिंग) का एक सिद्धांत भी विकसित किया है जो बताता है कि लोग अपने वित्तीय फैसलों को किस तरह से सरल बनाते हैं.

आयरलैंड के जॉन कोलिजन अपने बूते अरबपति बनने वाले दुनिया के सबसे कम उम्र के शख्स बने | मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

आयरलैंड के जॉन कोलिजन पहली पीढ़ी के दुनिया के सबसे कम उम्र के अरबपति बन गए हैं. दुनिया के अरबपतियों की सूची तैयार करने वाली पत्रिका फोर्ब्स के अनुसार उन्होंने महज 26 साल में यह उपलब्धि हासिल की है. इससे पहले सोशल नेटवर्किंग साइट स्नैपचैट के सीईओ ईवान स्पाइजेल के नाम यह रिकॉर्ड था, जो 26 साल दो महीने की उम्र में इस सूची में शामिल हुए थे.

जॉन कोलिजन इंटरनेट के जरिए पैसों के लेन-देन की सेवा देने वाली कंपनी ‘स्ट्राइप’ के सह-संस्थापक और अध्यक्ष हैं. उन्होंने सितंबर 2011 में अपने भाई पैट्रिक कोलिजन के साथ मिलकर यह कंपनी शुरू की थी. फोर्ब्स के अनुसार स्ट्राइप का कुल मूल्य 9.2 अरब डॉलर आंका गया है. स्ट्राइप फिलहाल 25 देशों में अपनी सेवाएं दे रही है. इस कंपनी में अभी करीब सात सौ लोग काम करते हैं.

फ़ीफ़ा ने पाकिस्तान की फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन पर बैन लगाया | बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

फ़ुटबॉल की सबसे बड़ी संस्था फ़ीफ़ा ने पाकिस्तान की फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन (पीएफ़एफ़) पर बैन लगा दिया है. द इंडिपेंडेंट की ख़बर के मुताबिक़ यह फैसला ‘तीसरे पक्ष के अनुचित हस्तक्षेप’ की वजह से लिया गया. बुधवार को जारी किए बयान में फ़ीफ़ा ने कहा कि यह रोक हटने तक पीएफ़एफ़ की राष्ट्रीय और क्लब टीमों को फुटबाल की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा.

यह मामला साल 2015 में फ़ैसल सालेह हयात के पीएफ़एफ़ के अध्यक्ष चुने जाने से जुड़ा है. उनके अध्यक्ष बनने के बाद चुनाव में वोटों की हेराफेरी के आरोप लगे थे. इस पर हुए विवाद के चलते पाकिस्तान में फुटबाल का खेल लगभग थम गया था. मामले को सुलझाने के लिए वहां के एक हाई कोर्ट ने एक प्रबंधक की नियुक्ति की थी जिसने पीएफ़एफ़ के दफ्तरों और बैंक खातों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया था. फीफा के मुताबिक यह फुटबाल प्रशासन को किसी बाहरी दखल से स्वतंत्र रखने के उसके नियमों का उल्लंघन है.

डोनाल्ड ट्रंप को उत्तर कोरिया का जवाब, शब्दों से नहीं आग के गोलों से हिसाब बराबर होगा | गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

उत्तर कोरिया और अमेरिका एक बार फिर एक-दूसरे को धमकियां देते नज़र आ रहे हैं. बुधवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से उत्तर कोरिया पर सख़्त कार्रवाई करने के संकेत दिए जाने के बाद अब उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री री योंग हो ने अमेरिका को चेतावनी दी है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ एक रूसी न्यूज़ एजेंसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया से लड़ाई के बम की बत्ती सुलगा दी है. उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया को धमकी देने की क़ीमत अमेरिका को आग के गोलों से चुकानी होगी. योंग हो का यह भी कहना था कि उनके देश की परमाणु परियोजना कोरियाई प्रायद्वीप में शांति व सुरक्षा को लेकर आश्वस्त करती है और यह बहस का मुद्दा नहीं है.

न्यूज़ एजेंसी को दिए अपने बयान में योंग हो ने कहा, ‘आप कह सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में अपने युद्धप्रिय और उन्मादी भाषण से ट्रंप ने हमारे ख़िलाफ़ लड़ाई के बम की बत्ती सुला दी है. हमें शब्दों से नहीं, आग के गोले बरसाकर (यानी मिसाइल हमला) हिसाब बराबर करना है.’ उत्तर कोरियाई विदेश मंत्री ने पहले ट्रंप को ‘दुष्ट राष्ट्रपति’ बताया था. उनके ताज़ा बयान पर योंग ने कहा, ‘हम अमेरिका से शक्ति संतुलन बनाए रखने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के काफ़ी नज़दीक आ गए हैं. यह हमारा प्रमुख सिद्धांत है कि हम ऐसी कोई बातचीत नहीं करेंगे जिसमें हमारे परमाणु हथियारों को मुद्दा बनाया जाएगा.’

इज़रायल और अमेरिका ने यूनेस्को से हटने की घोषणा की | शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

अमेरिका ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र संघ की अहम इकाई यूनेस्को (यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन) से हटने की घोषणा की है. उसने इज़रायल के समर्थन में यह कदम उठाया है.

द हिंदू के मुताबिक अमेरिका ने आरोप लगाया है कि यूनेस्को लगातार और पक्षपातपूर्ण तरीके से इज़रायल विरोधी रुख़ अपनाए हुए है. लिहज़ा अमेरिकी घोषणा के मुताबिक 31 दिसंबर 2018 से वह यूनेस्को का सदस्य नहीं रहेगा. तब तक वह संगठन में पूर्ण सदस्य के तौर पर अपनी भूमिका निभाता रहेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन की ओर से यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा को इस फैसले के बाबत अधिकृत सूचना पहुंचा दी गई है.

अमेरिका के साथ इज़रायल ने भी यूनेस्को से हटने का ऐलान किया है. इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू की ओर से ज़ारी बयान में कहा गया, ‘प्रधानमंत्री कार्यालय ने विदेश विभाग को यूनेस्को से हटने का प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है.’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान परमाणु समझौते को प्रमाणित करने से पीछे हटे | शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

ईरान परमाणु समझौता वैश्विक स्तर पर विवाद की एक बड़ी वजह बनता दिखाई दे रहा है. बीबीसी के मुताबिक शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को प्रमाणित करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ईरान पर इस समझौते की शर्तों का पालन न करने का आरोप लगाया. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सरकार कट्टरपंथी बताया और उस पर आतंकवाद को मदद पहुंचाने का भी आरोप लगाया.

ईरान के साथ 2015 में हुए इस परमाणु समझौते में सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी देश - अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, जर्मनी और रूस शामिल हैं. इसके तहत ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दिया था, जिसके बदले में अन्य देशों ने उस पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया था. इसकी शर्तों के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रत्येक 90 दिन पर यह प्रमाणित करना होता है कि ईरान सभी शर्तों का पालन कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले दो बार इसे प्रमाणित कर चुके हैं. हालांकि, उनके इनकार के बाद अब अमेरिकी संसद कांग्रेस को 60 दिन के भीतर फैसला करना है कि अमेरिका इस समझौते को जारी रखे या ईरान पर नए प्रतिबंध लगाकर इससे अलग हो जाए.