गुजरात के मेहसाणा ज़िले के वडनगर गांव का अपना ऐतिहासिक महत्व है. लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसका राजनीतिक महत्व काफ़ी बढ़ गया. बीते तीन सालों में इस जगह को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात कोई है तो यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी यहां के रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे. उस समय उनकी उम्र छह साल थी. इसी दावे पर संदेह जताता एक सवाल इन दिनों सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त तरीके से वायरल है.

वायरल हो रहा मैसेज.
वायरल हो रहा मैसेज.

इस सवाल में पूछा गया है, ‘तुम्हारा (नरेंद्र मोदी) जन्म 1950 में हुआ और वडनगर में 1973 में ट्रेन चली. तब तुम 23 साल के थे. 20 की उम्र में तुमने घर छोड़ दिया तो चाय कब बेचते थे.’ फ़ेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेफ़ॉर्मों पर यह ‘राष्ट्रीय महत्व का सवाल’ बन गया है. सवाल के बहाने यह जताने की कोशिश की गई है कि वडनगर में चाय बेचने का नरेंद्र मोदी का दावा झूठा है, क्योंकि जिस उम्र में चाय बेचने की बात उन्होंने की उस समय वडनगर में कोई ट्रेन आती ही नहीं थी.

लेकिन ऐसा नहीं है. यह सवाल सही तथ्य पेश नहीं करता. वडनगर में 1973 से बहुत पहले ट्रेनों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी. अप्रैल 2007 में वडनगर ब्लॉगस्पॉट डॉट इन पर ‘वडनगर - एक प्राचीन नगर’ के नाम से ब्लॉग लिखा गया था. इसमें वडनगर के इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण चीज़ों का उल्लेख है. ब्लॉग में बताया गया है कि अंग्रेज़ी शासन के दौरान व्यापार के लिए गुजरात के कई ज़िलों में रेलवे लाइन बिछाई गई थी. इनमें मेहसाणा भी शामिल था. वडनगर इसी ज़िले में पड़ता है.

स्क्रीनशॉट
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ब्लॉग के मुताबिक़ 1907 तक वडनगर में रेल आ गई थी. यह भी दावा है कि रेलवे स्टेशन भी बन चुका था. इसमें 1933 की एक तस्वीर दिखाई गई है जिसमें वडनगर के उस समय के व्यापारी देखे जा सकते हैं. 1907 में रेल सेवा की शुरुआत से संबंधित एक दस्तावेज़ की भी तस्वीर है. आप नीचे दोनों देख सकते हैं.

ब्लॉग पर जाने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें.
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पहली तस्वीर 1933 में मौजूद वडनगर रेलवे स्टेशन की बताई गई है जिसमें कई लोग दिख रहे हैं. इन्हें वडनगर के व्यापारी बताया गया है. दूसरी तस्वीर में एक दस्तावेज़ है जिसके बारे में बताया गया है कि किसी जेठाभाई मरफ़ातिया ने इसे संभालकर रखा था. इस पर ‘वडनगर’ और ‘14 दिसंबर, 1907’ की तारीख़ लिखी है. यह वही साल है जिसमें रेलों की आवाजाही शुरू होने की बात कही गई थी.

ऐतिहासिक तथ्य भी ब्लॉग का समर्थन करते हैं. ‘शोधगंगा’ विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा लिखे गए लेखों (थीसिस) का ऑनलाइन संग्रह है. इनमें 19वीं सदी के गुजरात से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं. एक लेख में बताया गया है कि 1887 तक मेहसाणा ज़िले के कई हिस्सों तक रेलवे लाइन बिछाई जा चुकी थी (रेल 1907 में आई). इनमें मेहसाणा से वडनगर और वडनगर से खेरालू लाइन भी शामिल थी.

ब्लॉग में बताया गया है कि 1893 में वडनगर स्टेशन के पास एक ऐंग्लो-वर्नैक्यूलर स्कूल भी खोला गया था. यानी स्टेशन पहले से मौजूद था. इसके भी शोध आधारित ऐतिहासिक साक्ष्य हैं. जानकारी के मुताबिक़ स्कूल के निर्माण में 11 हज़ार रुपये का ख़र्च आया था. दस्तावेज़ों में इसका ज़िक्र मिल जाता है. यानी ब्लॉग में दी गई जानकारी विश्वसनीय लगती है. बाद में 1906 के आसपास अप्रभावी कामकाज के चलते स्कूल को कहीं और ट्रांसफ़र कर दिया गया था.

इस आधार पर तो सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा सही नहीं लगता. यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि यहां वडनगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चाय बेचने वाले बयान की पुष्टि नहीं की जा रही, केवल यह बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया में वडनगर में रेलवे स्टेशन के बारे में जो दावा किया जा रहा है वह गलत है. ऊपर दी गई जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि वडनगर में रेल सेवा 1973 से काफ़ी पहले शुरू हो चुकी थी और वहां स्टेशन भी था.