पटाखों पर चलने वाली बहस को दीवाली की शुरूआत समझा जा सकता है. हर साल जब भी रोशनी का यह त्यौहार आता है, बहस शुरू हो जाती है कि पटाखे फोड़े जाने चाहिए या नहीं. ये बहसें भी शहरी इलाकों में ज्यादा सुनने को मिलती है. अब भी गांवो की हरियाली और खुले माहौल में इनका उतना असर पता नहीं चलता है.

शहरों में पटाखे चलाने का विरोध करने वाले भी अपनी जगह पर सही हैं. सर्दियों की शुरूआत होते ही, जैसे ही तापमान थोड़ा कम होता है ज्यादातर शहर सुबह-शाम स्मॉग यानी धुएं औऱ धुंध में घिरना शुरू हो जाते हैं. बेशक, इसकी पहली वजह वाहनों और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं है लेकिन दीवाली के बाद बम-पटाखों-फुलझड़ियों से निकलने वाला धुआं भी कई दिनों के लिए आसमान में जहरीले बादल बढ़ा देता है.

पटाखे न चलाने के पक्ष में एक दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि यह त्यौहार 14 साल बाद घर लौटे भगवान राम का स्वागत रोशनी से करने के लिए मनाया गया था, न कि पटाखों के शोर से उनके कानों को बहरा कर देने के लिए. बेशक यह कहते हुए इस बात का भी जिक्र किया जाता है कि राम के समय में पटाखों का अस्तित्व ही नहीं था इसलिए इन्हें परंपरा का हिस्सा नहीं होना चाहिए. यह बात पूरी तरह सही है या नहीं, इस बात की जानकारी तो नहीं है लेकिन पटाखे उससे कहीं ज्यादा पुराने हैं जितना कि इनका विरोध करने वाले इन्हें बताते हैं.

चीन ने छठी सदी में ही सॉल्टपीटर (पोटैशियम नाइट्रेट) और सल्फर मिलाकर बारूद बना लिया था और पटाखे भी इसी की देन हैं. भारत में पटाखे फूटने के प्रमाण 15वीं सदी से मिलने शुरू होते हैं. ऐसा नहीं है कि इनका जिक्र सिर्फ इतिहास की किताबों में ही मिलता हो, सदियों पुरानी पेंटिंग्स में भी फुलझड़ियों और आतिशबाजी के दृश्य देखने को मिलते हैं. इसका मतलब है कि उस दौर में भी पटाखों का जिक्र मिलता है जिस दौर का लिखित साहित्य हमारे पास नहीं है या न के बराबर है.

मुहम्मद अफजल के महल में पटाखे चलाती हुई महिलाएं ( सन 1740-1780) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट
मुहम्मद अफजल के महल में पटाखे चलाती हुई महिलाएं ( सन 1740-1780) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट

1953 में, इतिहासकार और ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट पुणे’ के पहले क्यूरेटर पीके गौड़ ने ‘द हिस्ट्री ऑफ फायरवर्क्स इन इंडिया बिटवीन एडी 1400 एंड 1900’ शीर्षक से एक किताब लिखी. यह किताब भारतीय इतिहास में आतिशबाजी और पटाखों के दिलचस्प इतिहास का एक दुर्लभ दस्तावेज है. वे बताते हैं कि हमारे देश में दीवाली ही पटाखे फोड़ने का इकलौता मौका नहीं हुआ करता था. अपनी किताब में गौड़ बताते हैं कि आतिशबाजी शादियों – जिनमें आज की ही तरह पटाखों का शोर बारात की पहचान हुआ करता था – और त्योहारों के जरूरी हिस्से हुआ करते थे. वे एक पुर्तगाली यात्री दुआर्ते बार्बोसा के हवाले से कहते हैं कि 1518 में, गुजरात में एक ब्राह्मण परिवार की शादी में जोरदार आतिशबाजी की गई और यह उस दौर में पटाखों की पर्याप्त उपलब्धता की तरफ इशारा करता है.

दारा शिकोह की बारात (1740 का दशक) | साभार - नेशनल म्यूजियम दिल्ली
दारा शिकोह की बारात (1740 का दशक) | साभार - नेशनल म्यूजियम दिल्ली

इसके अलावा लोग पटाखों का इस्तेमाल हाथी जैसे बड़े जानवरों को प्रशिक्षण देने में भी किया करते थे. सत्रहवीं सदी में दिल्ली और आगरा की यात्रा पर आए फ्रांसीसी यात्री फ्रैंकोसिस बर्नियर अपने आश्चर्य को कुछ इन शब्दों में व्यक्त करते हैं –

‘...ल़ड़ते हुए जानवर केवल उन पटाखों की आवाज के जरिए ही अलग किए जा सकते थे. इसके लिए उनके पास बम का धमाका या आतिशबाजी की जाती थी. इसका कारण था कि वे स्वभाव से थोड़े डरपोक होते थे और उन्हें आग से डर भी लगता था. यही कारण था कि बम-गोलों के आने के बाद युद्ध में हाथियों का इस्तेमाल थोड़ा कम हो गया.’

जहांगीर हाथियों की लड़ाई देखते हुए (1605) | साभार - मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट
जहांगीर हाथियों की लड़ाई देखते हुए (1605) | साभार - मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट

पटाखों का इस्तेमाल देश के किसी एक हिस्से तक ही सीमित नहीं था. अलग-अलग इलाकों की छानबीन करते हुए गौड़ को उड़ीसा में भी बारूद बनाने वाले सामान की एक सूची मिली. यह सोलहवीं सदी की शुरूआत में तैयार किया दस्तावेज था जो संस्कृत में लिखा था. दिलचस्प यह है कि इस सामग्री में गौमूत्र का भी जिक्र था. हालांकि इसके 300 साल बाद लिखे गए दस्तावेजों में इसे जगह नहीं दी गई है.

'शब-ए-बारात के मौके पर आतिशबाजी' डेविस के एल्बम से एक फोलियो (18वीं सदी) | साभार - मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट
'शब-ए-बारात के मौके पर आतिशबाजी' डेविस के एल्बम से एक फोलियो (18वीं सदी) | साभार - मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट

ये तस्वीरें हमें बताती हैं कि पटाखे सिर्फ हिंदू त्योहारों यानी दीवाली-दशहरा का ही हिस्सा नहीं थे बल्कि मुसलमानों के कुछ त्यौहारों जैसे शब-ए-बारात में भी आतिशबाजी एक जरूरी रस्म हुआ करती थी.

महाराणा अरि सिंह अपने महल में जश्न मनाते हुए (भीमाराम, केसूराम -1764) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट
महाराणा अरि सिंह अपने महल में जश्न मनाते हुए (भीमाराम, केसूराम -1764) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट

अपनी किताब में गौड़ मराठी संत कवि एकनाथ की, साल 1570 में लिखी एक कविता का जिक्र करते हैं. इसमें रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह में आतिशबाजी होने की बात कही गई है. शादी में आतिशबाजी का यह चलन 19वीं सदी में भी रहा जब 1820 में बड़ौदा के महाराज सयाजी राव द्वितीय ने अपनी दूसरी शादी में तीन हजार रुपए केवल आतिशबाजी पर खर्च कर दिए. उस समय के हिसाब से यह बड़ा खर्चा था इसलिए इतिहास में दर्ज हो गया.

मुगल महिलाएं आतिशबाजी देखते हुए (17वीं सदी) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट
मुगल महिलाएं आतिशबाजी देखते हुए (17वीं सदी) | साभार - फ्रीअर गैलरी ऑफ आर्ट

आखिर में पीके गौड़ यह बताते हैं कि उनके शोध में काफी गुंजायशें हैं. उदाहरण के तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि पटाखे चीन से भारत तक कब और कैसे पहुंचे. इसके अलावा यह बता पाना भी संभव नहीं है कि जब देश भर में पटाखों का इस्तेमाल हो रहा था, तब इन्हें बनाने वाले लोग कौन थे. कुछ और भी सवाल हैं जैसे - कैसे पटाखे एक सदी से दूसरी सदी तक पहुंचने में रूप बदलते चले गए या कब ये रंगीन हो गए. इनके जवाब तलाशने का काम गौड़ अपने बाद की पीढ़ी के लिए छोड़ गए हैं.

फरहत बख्श के महल का रंगीन रोशनी से जगमगाता हुआ बाहरी नजारा (सीताराम 1814) | साभार - ब्रिटिश लाइब्रेरी
फरहत बख्श के महल का रंगीन रोशनी से जगमगाता हुआ बाहरी नजारा (सीताराम 1814) | साभार - ब्रिटिश लाइब्रेरी