अयोध्या में इस बार दीवाली के खर्चीले सरकारी ताम-झाम की बड़ी चर्चा है. दीयों के विश्व रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं. यह वही अयोध्या है जहां के बारे में माना जाता है कि चौदह वर्ष बाद राजा रामचंद्र वनवास से वापस लौटे थे तब यहां दीवाली मनी थी. लेकिन अयोध्या के निवासियों के लिए उस दीवाली का एक खास मतलब था. उनका असली राजा उन्हें वापस मिला था. वह आदर्श रामराज्य की कल्पना के साकार होने की घड़ी थी.

इसलिए जब ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों और असहयोग आंदोलन के दौरान भी जब लोग वैसी ही आतिशबाजी वाली दीवाली मनाने से बाज नहीं आ रहे थे, तो गांधी ने 31 अक्टूबर, 1920 को नवजीवन में एक लेख लिखकर लोगों से पूछा था- ‘अगर हम ऐसा कहें कि इस कलियुग में हमें ठाठ-बाट के साथ दीवाली मनाने का कोई अधिकार नहीं है, तो अतिशयोक्ति न होगी. दीवाली मनाने का अर्थ यह हुआ कि हम रामराज्य में रहने की कल्पना कर रहे हैं. क्या आज हिन्दुस्तान में रामराज्य है?’

इस लेख के आखिर में गांधी ने लिखा था- ‘जब हम अपने मनोनुकूल राज्य की स्थापना करने में समर्थ हो जाएंगे, तब हम निःसंदेह कुछ निर्दोष आनंदों का उपभोग कर सकेंगे. लेकिन इस समय तो जनता शोक में डूबी हुई है, यह प्रजा का वैधव्य काल है. ऐसे समय में जनता रागरंग में कदापि नहीं डूब सकती.’

गांधी के रामराज्य का मतलब था ‘स्वराज्य’. और स्वराज्य से उनका तात्पर्य गोरों के राज की जगह भारतीयों के राज से नहीं था. स्वराज्य मनुष्यमात्र की संपूर्ण स्वतंत्रता की स्थिति वाला राज्य है, जहां भय, सांप्रदायिक विद्वेष, जातिगत भेदभाव, जातीय टकराव, धन के संकेंद्रण, प्रचंड भोगवाद, शोषण और अन्याय, हिंसा और युद्धोन्माद जैसी अमानवीय बुराइयों के लिए कोई जगह नहीं होती. चलिए गांधी के अर्थों वाले इस स्वराज्य को हम एक आदर्श स्थिति ही मान लेते हैं. लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के दिनों से तुलना करते हुए यह जरूर सोचा जाना चाहिए कि इस स्वराज्य की दिशा में हम कितना आगे बढ़ पाए हैं?

11 सितंबर, 1921 को ‘नवजीवन’ में फिर से एक लेख लिखकर गांधी ने कहा था- ‘यदि दीवाली से पहले हमें स्वराज्य न मिल सके तो हमें क्या करना चाहिए? बस मातम मनाना चाहिए. न बढ़िया खाने बनाए जाएं, न दावतें दी जाएं, न नाच-गान किया जाए. बस संयम के साथ रहकर ईश्वर की प्रार्थना की जाए. भरत ने जब चौदह वर्ष तक तपस्या की थी, तब कहीं दीवाली मनाने का समय आया था. अब क्या हम इससे उल्टा चलें. कु-समय में गाना किस काम का? बिना भूख के खाना किस काम का? स्वराज्य के बिना उत्सव किस बात का? ...इस तरह दीवाली मनाने की दो विधियां हैं— एक स्वराज्य प्राप्त करके दीवाली मनाई जाए और दूसरी स्वराज्य प्राप्त करने की तैयारी की जाए. अब इन दो में से किस रीति से दीवाली मनाएं, यह बात तो हमारी शक्ति के ऊपर अवलंबित है.’

अक्टूबर 1928 में किसी ने गांधीजी को चिट्ठी लिखकर कहा कि वे ऐसे लोगों को चेतावनी दें जो आगामी दीवाली में आतिशबाजियों, रद्दी-सद्दी मिठाइयों, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रोशनी के ऊपर अपनी कमाई का पैसा फूंकने की सोच रहे हैं. इसके जवाब में गांधी ने 25 अक्टूबर, 1928 को यंग इंडिया में लिखा- ‘मैं हृदय से इस बात का समर्थन करता हूं. यदि मेरी चले तो मैं इन छुट्टियों के दौरान लोगों को घरों की सफाई करने, हृदयों को शुद्ध बनाने और बच्चों के लिए निर्दोष प्रकार का शिक्षाप्रद मनोरंजन जुटाने पर विवश कर दूं. मैं जानता हूं कि आतिशबाजियों में बच्चों को बड़ा मजा आता है, पर वह इसलिए कि हम वयस्कों ने उनको इस चीज का आदी बना दिया है. मैंने देखा है कि सरल-प्रकृति के अफ्रीकी बच्चों को ऐसा कोई चाव नहीं है. वे इसके बदले नृत्य करते हैं.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘बच्चों के लिए इससे अधिक स्वास्थ्यप्रद और श्रेष्ठ मनोरंजन क्या हो सकता है कि उनको खेल-कूद में लगाया जाए या ऐसे गोठ या वन-विहार का आयोजन किया जाए, जिनमें वे बाजार की सड़ी-गली मिठाइयों के बजाए ताजा फल और सूखे मेवे अपने साथ ले जाएं? धनी और गरीब दोनों ही घरों के बच्चों को अपने घरों की सफाई और पुताई करना भी सिखाया जा सकता है. आरंभ में छुट्टियों के दौरान ही यदि उनको प्यार के साथ श्रम का सम्मान करना सिखाया जाए, श्रम का महात्म्य महसूस कराया जाए, तो यह एक बड़ी बात होगी.’

अंत में उन्होंने लिखा था- ‘पर यहां मैं जोर इस बात पर देना चाहता हूं कि आतिशबाजी इत्यादि से बचाया हुआ, यदि पूरा नहीं तो, कुछ पैसा भी खादी के लिए अवश्य ही दिया जाना चाहिए, या यदि खादी से चिढ़ ही हो तो किसी ऐसे काम के लिए दिया जाना चाहिए जिससे दरिद्रनारायण की सेवा हो सके. स्त्री-पुरुषों, बच्चों और वृद्धों के लिए इससे बढ़कर हर्ष की बात और कोई नहीं हो सकती कि वे छुट्टियों के दिनों में देश के दरिद्रनारायण की बात सोचें और उनसे अपना कुछ नाता जोड़ें.’

बात 1946 की है. विभाजन की चर्चाओं के बीच देश में सांप्रदायिक तनाव अपने चरम पर था. ऐसे माहौल में भी आतिशबाजी करनेवालों की कमी नहीं थी. 18 अक्टूबर, 1946 को अपने एक वक्तव्य में गांधीजी ने कहा- ‘मेरे पास कुछ पत्र आए हैं, जिनमें पटाखे छोड़ने के बारे में शिकायत की गई है. शिकायत उचित है. मैं तो इसके बारे में ‘नवजीवन’ में लिख चुका हूं. मैं नहीं जानता कि किसी पर उसका असर हुआ या नहीं. इस वक्त जब चारों तरफ होली जल रही है, तब दीवाली पर पटाखे चलाना, घी-तेल के दीये या बिजली के लट्टू जलाना या मिठाई आदि खाना पाप समझना चाहिए.’

यदि आज गांधी होते तो शायद आज भी पूछे बिना नहीं रहते कि जिस रामराज्य के आने पर दीवाली मनाई गई थी, क्या वह रामराज्य आज वास्तव में आ गया है? और यही सवाल जब वापस गांधी से पूछा जाता तो वह शायद यही कहते कि रामराज्य तो नहीं आया, लेकिन राम के नाम पर विभाजनकारी राजनीति करनेवालों का राज्य जरूर आ गया है. अय्याशी और भुखमरी दोनों की विचित्र पराकाष्ठा वाले इस राज्य में कम से कम गांधी की दीवाली तो नहीं ही मनती. बहुत संभावना है कि गांधी का आज उपवास होता और उनकी प्रार्थना-सभा में झारखंड की उस बच्ची की चर्चा होती जिसने पिछले दिनों भूख के मारे तिल-तिल करके दम तोड़ दिया, और शायद उन बच्चों की भी जिन्होंने ऑक्सीजन के अभाव में अस्पतालों में दम तोड़ दिया.