महाराष्ट्र के विदर्भ और यवतमाल इलाके के किसान कर्ज के भारी बोझ से जूझने के साथ अब एक नई मुसीबत का सामना कर रहे हैं. बीते जुलाई से अब तक इन इलाकों में जहरीले कीटनाशक के छिड़काव की वजह से 35 से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा करीब 700 किसान अस्पताल में भर्ती हैं. बताया जाता है कि इनमें से कइयों की आंखों की रोशनी चली गई है. इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य की भाजपा सरकार से जवाब-तलब किया है. इसके अलावा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने इस बारे में एक कानून की मांग की है. उधर, देवेंद्र फड़नवीस सरकार ने इन मामलों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित की है.

महाराष्ट्र में किसानों की खुदकुशी के बाद अब इनकी कीटनाशकों से होने वाली मौत के मुद्दे को प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों ने संपादकीय के जरिए उठाया है. हालांकि, गुजरात में दलितों के खिलाफ होने वाले हमलों की तरह इस बार भी यह महत्वपूर्ण मुद्दा हिंदी प्रमुख अखबारों- हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका के संपादकीय पन्ने से गायब ही रहा. इस ज्वलंत मुद्दे पर केवल जनसत्ता और अमर उजाला ने संपादकीय के जरिए अपने विचार रखे हैं. दूसरी ओर, अंग्रेजी के प्रमुख अखबारों में द हिंदू, द इकनॉमिक टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स ने इस पर अपनी बात विस्तार से रखी है.

अमर उजाला का इस महत्वपूर्ण मसले पर कहना है कि राज्य के अधिकतर किसानों का कंधा कर्ज के बोझ से झुक जाता है. इसके बाद वे फसल बचाने के लिए जानलेवा कीटनाशकों का इस्तेमाल करने से भी गुरेज नहीं करते हैं. इसके अलावा बीटी कपास ने किसानों को ऐसे जाल में फंसा दिया है जिससे वे निकल नहीं पा रहे हैं. अखबार ने 17 अक्टूबर को अपने संपादकीय में कृषि जानकारों के हवाले से कहा है कि कपास पर लगने वाले कीटों पर कीटनाशक धीरे-धीरे बेअसर होने लगते हैं. इसके बाद किसान इनकी जगह और अधिक जहरीले कीटनाशक का इस्तेमाल करने लगते हैं. इनका आगे कहना है कि कंपनियां और इसके प्रतिनिधि भी इस त्रासदी के जिम्मेदार हैं जो किसानों को सही जानकारी नहीं देते हैं. इसके अलावा कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का साल 2008 से संसद में लंबित होना दिखाता है कि किसान सरकार (यूपीए सरकार के साथ-साथ मोदी सरकार) की प्राथमिकता में नहीं है.

जनसत्ता ने कीटनाशकों के इस्तेमाल के बाद किसानों की मौत और तबीयत बिगड़ने को लेकर कंपनियों के साथ-साथ सरकारी मशीनरी को भी निशाने पर लिया है. बीते बुधवार को प्रकाशित संपादकीय में अखबार का कहना है कि कंपनियां अपने फायदे के लिए कीटनाशकों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे करती हैं, लेकिन इनके खतरों की जानकारी किसानों को देने की जगह चुप्पी साध लेती हैं. दूसरी ओर, प्रशासन को भी इसकी जरुरत महसूस नहीं होती कि वह कंपनियों के झूठे दावे पर लगाम लगाए. इसके अलावा कीटनाशक के छिड़काव के वक्त किसानों द्वारा सुरक्षा उपकरणों जैसे-दस्ताने, मास्क आदि का इस्तेमाल न करने की वजह से भी खतरा बढ़ जाता है.

द हिंदू के मुताबिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से किसानों की मौत होना इस बात का सबूत है कि खेतों में जहरीले रसायनों के इस्तेमाल पर लगाम लगाने की सरकारी कोशिश विफल रही है. बीते सोमवार को प्रकाशित अपने संपादकीय में अखबार कहता है कि किसान कीटनाशक संबंधी जानकारी के लिए कृषि विशेषज्ञ की जगह दलालों और इसके दुकानदारों पर निर्भर हैं. यह बात इस ओर इशारा करती है कि सरकार का इसे लेकर अब तक लापरवाह रवैया रहा है. इसके अलावा किसानों को बड़ी मात्रा में नकली कीटनाशक बेचे जा रहे हैं और इनके कारोबार में भी लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. अखबार ने इस ज्वलंत मुद्दे पर डीडी किसान द्वारा अपने दर्शकों के साथ संवाद नहीं बना पाने की विफलता की ओर भी ध्यान दिलाने की कोशिश की है. इसके आखिर में जहरीले कीटनाशकों की जगह जैविक तरीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है. इसके अलावा पूरे देश में कीटनाशकों की गुणवत्ता और इसके नियमन की विफलता की जांच के लिए उच्च स्तरीय कमिटी गठित किए जाने की भी पैरवी की गई है.

हिंदुस्तान टाइम्स इस समस्या की जड़ को 1960 के हरित क्रांति आंदोलन से जोड़ कर देखता है. 18 अक्टूबर को अखबार अपने संपादकीय में कहता है कि उस वक्त खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फसल उत्पादन में तेजी से बढ़ोतरी पर जोर दिया गया. हालांकि, इसमें यह भी कहा गया है कि यह समस्या केवल भारत तक ही सीमित नहीं है. अखबार ने गैर-सरकारी संस्था ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि पूरी दुनिया में 1950 के बाद अब तक आबादी दोगुनी हो चुकी है लेकिन, खेती योग्य जमीन में केवल 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसके अलावा इसमें इस ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि अधिक उत्पादन और कम लागत के दबाव में खेतों की उर्वरा शक्ति कम होती गई है. इन सबकी वजह से भी भारी मात्रा में कीटनाशकों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिला है. इसके अलावा संपादकीय में कीटनाशकों का पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे असर का भी जिक्र किया गया है. अखबार ने इस समस्या के समाधान के तौर पर उन कीटनाशकों पर पूरी तरह रोक लगाने की पैरवी की है जिनसे हानिकारक कीटों के अलावा अन्य पक्ष भी इसकी चपेट में आते हैं.

इस अहम मुद्दे पर कारोबारी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स का मानना है कि देश की अर्थव्यस्था में कृषि के अहम योगदान के बावजूद सरकारों ने अब तक कीटनाशक बनाने और इसे बेचने के लिए उचित नियमन व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया है. बीते शुक्रवार को अपने संपादकीय में अखबार ने इसके लिए साल 1968 के कानून की जगह लाया जाने वाले कीटनाशक प्रबंधन विधेयक-2008 को जल्द से जल्द संसद से पारित किए जाने पर जोर दिया है. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कीटनाशकों के सही चुनाव और इनके उचित ढंग से इस्तेमाल के बारे में किसानों की समझ बेहतर बनाने पर ध्यान देने की भी पैरवी की है. दूसरी ओर, कंपनियों पर कीटनाशकों से जुड़ी जानकारियों को सार्वजनिक करने की जिम्मेदारी डालने पर ज़ोर दिया गया है. साथ ही खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा अनाजों में कीटनाशकों की मौजूदगी की जांच किए जाने की भी पैरवी की गई है.