कर्नाटक के आगामी विधानसभा चुनाव में इस बार थोड़ी-थोड़ी झलक उत्तर प्रदेश की भी नज़र आएगी. वैसे पूरी चुनावी तस्वीर तो चुनाव की घोषणा के बाद ही साफ होगी, लेकिन इसके शुरुआती संकेत मिलने लगे हैं.

चुनाव मैदान में आदित्यनाथ से प्रभावित कुछ ‘योगी’ नज़र आ सकते हैं

कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के चुनाव का पहला साम्य ‘योगी’ हैं. चूंकि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार की कमान एक योगी और गोरखनाथ मठ के महंत आदित्यनाथ को सौंपी है इसलिए कर्नाटक के ‘योगी’ भी उत्साहित हैं. उन्हें लग रहा है कि थोड़ा ज़ोर लगाएं तो 2018 में होने वाले विधानसभा या फिर उसके अगले साल लोकसभा चुनाव में भाजपा उन्हें टिकट दे सकती है. लिहाज़ा उनमें से कइयों ने ज़ोर लगाना भी शुरू कर दिया है.

डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक धारवाड़ तालुक के मनगुंडी गांव में स्थित श्रीगुरु बासवा महामने मठ के बासवानंद स्वामी ने तो प्रचार अभियान ही शुरू कर दिया है. उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पत्र लिखकर इच्छा ज़ताई है कि वे पार्टी के टिकट पर चुनाव में उतरना चाहते हैं. वे कलघटगी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. बासवानंद देख नहीं सकते, लेकिन वे राजनीतिक व्यवस्था को बदलने का ऊंचा सपना देखते हैं.

बागलकोट के रामारुद स्वामी ने तो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख दिया है. वे बिलागी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है, ‘विकास के मामले में बिलागी काफी पीछे रह गया है. इसलिए मैंने भाजपा के नेताओं से अपील की है कि परिवारों को आगे बढ़ाना बंद करें. इसके बजाय मुझे टिकट दें. इस इलाके की 50 फीसदी आबादी मेरे मठ की भक्त है. अगर मुझे भाजपा टिकट नहीं देगी तो मैं निर्दलीय चुनाव लड़ूंगा.’

हावेरी जिले के शरणबासवेश्वर मठ के प्रणवानंद स्वामी की चुनावी तैयारी भी पूरी है. वे तो अपने साथ श्रीराम सेना के नेता विवादित नेता प्रमोद मुतालिक को भी भाजपा का टिकट दिलाने के लिए अभियान चला रहे हैं. इन सबके अलावा 2019 में चित्रदुर्ग की आरक्षित लोकसभा सीट से मदारा चेन्नइया स्वामी को भाजपा का टिकट दिए जाने की बात भी चल रही है. इससे उनके समर्थकों में भी ख़ासा उत्साह देखा जा रहा है.

‘मुलायम सी झलक’ देवेगौड़ा परिवार में दिख सकती है

उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा. समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव का भरा-पूरा परिवार चुनावों में ज़रूर नज़र आता है. वह भी एक नहीं चार-पांच सीटों पर. ऐसी ही ‘मुलायम सी झलक’ अब कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में देवेगौड़ा परिवार की दिख सकती है. वैसे तो जनता दल-सेकुलर (जद-एस) के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा का निर्देश है कि उनके परिवार के सिर्फ दो लोगों (दोनों पुत्रों)- एचडी कुमारस्वामी और एचडी रेवन्ना को ही विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट दिया जाए. लेकिन परिवार के भीतर से ही दो और दावेदार ताल ठोक रहे हैं.

द हिंदू के मुताबिक देवेगौड़ा परिवार के दो अन्य दावेदारों में एक हैं- एचडी कुमारस्वामी की पत्नी अनीता और दूसरे- रेवन्ना के पुत्र प्रज्वल. प्रज्वल कई अवसरों पर चुनाव लड़ने की इच्छा ज़ता चुके हैं. अनीता 2008 में मधुगिरी सीट से जीतकर विधायक भी बन चुकी हैं. लेकिन 2013 में वे चन्नपटना सीट से हार गई थीं. हालांकि इस बार उनका दावा है कि चन्नपटना के लोग उन्हें जिताने का भरोसा दे रहे हैं इसलिए वे फिर यहीं से किस्मत आजमाना चाहती हैं.

दिलचस्प बात यह है कि एचडी कुमारस्वामी अभी पिता और पत्नी की इच्छाओं के बीच फंसे हुए नज़र आ रहे हैं. एक तरफ तो वे पिता की बात दोहरा रहे हैं कि परिवार से सिर्फ दो लोगों को ही टिकट मिलेगा. लेकिन साथ ही, पत्नी और भतीजे की चुनाव लड़ने की इच्छाओं को ‘स्वाभाविक’ भी बता रहे हैं. और इसके बाद यह भी जोड़ देते हैं कि इस पर ‘अंतिम फैसला पिता (देवेगौड़ा) करेंगे.’ हालांकि पार्टी सूत्रों की मानें तो चार न सही पर परिवार के तीन सदस्य तो चुनाव मैदान में दिख ही सकते हैं. प्रज्वल की उम्र चूंकि अभी कम ही है, इसलिए उन्हें शायद न उतारा जाए.

भाजपा की रणनीति भी उत्तर प्रदेश वाली हो सकती है

कर्नाटक में भाजपा की चुनाव रणनीति भी उत्तर प्रदेश वाली हो सकती है. ख़ास तौर पर उम्मीदवारों के चयन के मामले में. पार्टी की राज्य इकाई के महासचिव सीटी रवि द हिंदू से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हैं. वे कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में प्रत्याशी चयन के लिए पार्टी ने नई रणनीति अपनाई थी. इसके लिए पहले पार्टी कार्यकर्ताओं से रायशुमारी कराई गई. फिर पार्टी से बाहर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय लोगों के साथ यही क़वायद की गई. हर विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न आयु वर्ग व अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले दो-ढाई हजार लोगाें से पूछा गया था कि वे कैसा प्रत्याशी चाहते हैं.’

रवि बताते हैं, ‘जनता और कार्यकर्ताआें से मिले फीडबैक के आधार पर ही उत्तर प्रदेश और दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी प्रत्याशियों का चयन किया गया. और दोनों जगहों के नतीजे सबके सामने हैं. उत्तर प्रदेश में डेढ़ दशक बाद पार्टी फिर सत्ता में हैं तो दिल्ली नगर निगम में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को तगड़ी पटखनी देकर सभी निकायों में कब्ज़ा बरकरार रखा है. लिहाज़ा हल्के-फुल्के बदलाव के साथ यही रणनीति कर्नाटक में आजमायी जाएगी.’

हालांकि डेक्कन क्रॉनिकल की एक अन्य ख़बर भाजपा की रणनीति से जुड़े दूसरे पहलू की तरफ भी इशारा करती है. इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश ही नहीं उत्तराखंड, असम, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर जैसे तमाम राज्यों में भाजपा ने दूसरी पार्टियों के दमदार नेताओं को तोड़ा है. उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर चुनावी सफलता हासिल की है. यह परंपरा कर्नाटक में भी शिद्दत से निभाई जा सकती है. बल्कि कांग्रेस के कुछ दिग्गज नेता तो भाजपा में आ भी चुके हैं. ख़बरों की मानें तो 10-15 कांग्रेस विधायक जल्द ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं. क्योंकि इन्हें कांग्रेस में टिकट मिलने की संभावना इस बार कम नज़र आ रही है. बताया जाता है कि कांग्रेस 50 सीटों पर नए चेहरे तलाश रही है.

यही नहीं, राज्य की कांग्रेस सरकार के कद्दावर मंत्री डीके शिवकुमार पर भ्रष्टाचार के आरोपों और आयकर विभाग के छापों बावज़ूद उनके प्रति भी भाजपा की प्रदेश इकाई ने नरम रुख़ अपना रखा है. इसकी वज़ह यह है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बीएस येद्दियुरप्पा के साथ उनके अच्छे ताल्लुक़ात बताए जाते हैं. यानी पार्टी संभवत: इस उम्मीद में है कि ये ताल्लुक़ात चुनाव में किसी न किसी रूप में तो काम आ ही सकते हैं. सो, देखना दिलचस्प होगा कि उसकी ‘उम्मीद’ कितनी पूरी होती है.