निर्देशक : रोहित शेट्टी

लेखक : रोहित शेट्टी, यूनुस साजवाल, साजिद-फरहाद

कलाकार : अजय देवगन, अरशद वारसी, तब्बू, परिणीति चोपड़ा, तुषार कपूर, श्रेयस तलपड़े, कुणाल खेमू, प्रकाश राज, जॉनी लीवर, नील नितिन मुकेश, मुकेश तिवारी, संजय मिश्रा

रेटिंग : 2 / 5

2006 में आई पहली ‘गोलमाल’ बहुत बुरी फिल्म नहीं थी. ‘गोलमाल रिटर्न्स’ (2008) और ‘गोलमाल 3’ (2010) सबसे बुरी फिल्में थीं क्योंकि उनमें कहानी कुछ नहीं थी. था तो सिर्फ बेसिरपैर का हास्य जिसे टीवी पर देखते वक्त आज भी एक ही सवाल बार-बार जवाब की तलाश में जेहन में लौट आता है – ये हास्य है या गले की फांस?

रोहित शेट्टी ने शायद हिंदुस्तान भर की इसी शिकायत को दूर करने के लिए ‘गोलमाल अगेन’ में ठूंसकर कहानी भरी है. हॉरर कॉमेडी जॉनर का हाथ पकड़ा है और अपने पांच सिर्री-बावरे नायकों को (गोपाल, माधव, लकी और दो लक्ष्मण) भूत-प्रेत और अंधविश्वास में न सिर्फ खूब उलझाया है बल्कि दिलचस्पी जगाने के लिए एक ऐसी प्रेतात्मा को भी कहानी में शामिल किया है जो खलनायकों से अपनी मौत का बदला लेना चाहती है.

कोई भी मानेगा कि रोहित शेट्टी की फिल्मों के लिहाज से यह एक स्तरीय प्रिमाइस है! पहले से मशहूर पांचों नायक किरदारों के सहारे और हास्य व कन्फ्यूजन को मिलाकर सस्ता ही सही लेकिन अच्छा मनोरंजन इस धागेभर की मोटाई वाली कहानी पर रचा जा सकता है. ऊपर से दिमाग घर रखकर आने वाली चेतावनी का फायदा भी इसे मिलना तय था. लेकिन ‘गोलमाल अगेन’, इंटरवल के बाद इस प्रिमाइस में अतिवादी बॉलीवुड क्लीशे भर देती है और धागे को रस्सी समझकर इतनी सारी चीजें उस पर टांग देती है कि इस बोझ तले उसे तोड़ देती है.

किसे? कहानी के अलावा खुद को भी!

इंटरवल से पहले तक फिल्म आपके धैर्य की परीक्षा नहीं लेती. पांचों नायक ऊटी की हरी-भरी वादियों में मौजूद उस अनाथालय में पहुंचते हैं जहां उनका बचपन बीता था और वहां उनकी मुलाकात तब्बू और परिणीति चोपड़ा से होती है. कहानी में भूत-प्रेत का प्रवेश होता है और चूंकि फिल्म का मुख्य नायक गोपाल (अजय देवगन) भूतों और रात से बहुत डरता है, इसलिए कहानी में कई कॉमिक सिचुएशन्स पैदा होती हैं.

ये मजेदार हैं और इस बार रोहित शेट्टी ने हमेशा की तरह हद दर्जे की स्लैपस्टिक कॉमेडी का इस्तेमाल नहीं किया है, इसलिए हंसने से आप गुरेज नहीं करते. संजय मिश्रा, शत्रुघ्न सिन्हा की नकल बेहद दर्शनीय तरीके से उतारते हैं, जॉनी लीवर को अरसे बाद एक अच्छी फिल्म नसीब होती है और एक पुराने जमाने के मशहूर अभिनेता के आगमन के बाद कई मजाकिया छोटे-मोटे दृश्य आपकी नजर होते हैं. एक बड़े से भूत बंगले के इर्द-गिर्द दो बढ़िया तेज रफ्तार सीक्वेंस भी रचे जाते हैं जो रोहित शेट्टी की इस फिल्म को उसके औसत दर्जे से दो बार ऊपर उठा देते हैं.

इंटरवल के बाद लेकिन, फिल्म का फोकस हास्य और कन्फ्यूजन का मेल-जोल कराने से ज्यादा इंसाफ दिलाने की तरफ शिफ्ट हो जाता है और हॉरर कॉमेडी जॉनर की जगह यह फिल्म हॉरर ड्रामा की तरह ज्यादा पेश आने लगती है. जितेंद्र-जयाप्रदा की ‘मां’ (1992) नहीं देखने पहुंचा दर्शक फिर मेलोड्रामा, दूर से ही सूंघ लिए जाने वाले ट्विस्ट एंड टर्न्स और अमर मोहिले साहब का कर्कश बैकग्राउंड स्कोर सुनने को मजबूर होता है.

हास्य की आवाजाही चलती रहती है - जिससे फिल्म औसत बनी रहती है - लेकिन कहानी पर जोर देने वाली रोहित शेट्टी की पहली कॉमेडी फिल्म को लेकर जो संभावनाएं जन्मीं थीं वो नील नितिन मुकेश के आते ही धराशायी हो जाती हैं. फ्लैशबैक में जाने के बाद से ही ‘गोलमाल अगेन’ दर्जनभर बॉलीवुड क्लीशे ओढ़कर खुद को मालामाल समझती है और क्लाइमेक्स तो इतना नीरस रचती है कि पहली बार रोहित शेट्टी ट्रेडमार्का पागलपंती आप मिस करने लगते हैं. अविश्वसनीय किंतु सत्य!

अभिनय की पड़ताल करें तो फिल्म में पांचों नायकों को भूत-प्रेत की दुनिया से जोड़ने वाली नायिका की भूमिका में तब्बू हैं और उनके किरदार के पास न ह्यूमर का साथ है न गंभीरता का हाथ. फिर उन्होंने क्यों उनके लायक नहीं यह फिल्म चुनी, हम नहीं जानते.

परिणीति चोपड़ा ने शायद इसलिए चुनी क्योंकि उनके पास हंसने, सुंदर लगने और नाचने के अलावा बुत की तरह खड़े रहने का काम ज्यादा था.

कुणाल खेमू फिल्म के पांच मुख्य नायकों में से एक हैं और ‘गो गोवा गॉन’ में जैसा उनका अभिनय था वैसा ही अब वे हर कॉमेडी फिल्म में करते हैं इसीलिए यहां भी ठीक वैसा ही करते हैं. श्रेयस तलपड़े फिल्म में तुतलाकर हास्य पैदा करते हैं और बिना अपमानजनक हुए शऊर से अपना काम करते हैं. तुषार कपूर के जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय निस्संदेह रूप से ‘गोलमाल’ फिल्में रही हैं और इस बार भी उनकी मुख्य भूमिका वाले दृश्यों में कोई कमी निकालना संभव नहीं है. देवगन से हरदम पंगा लेने वाले अरशद वारसी तो अब माधव जैसे छोटे-मोटे हास्य किरदार सोते-सोते प्ले कर सकते हैं, इसलिए इस फिल्म में सोते-सोते करते भी हैं. बिना कोई खास दिलचस्पी लिए.

मुख्य नायक अजय देवगन अपने किरदार गोपाल में भरपूर दिलचस्पी लेते हैं और कम से कम इस सीरीज की पिछली फिल्मों से बेहतर अभिनय करते हैं. उन्हें इसका भी फायदा मिलता है कि फिल्म ‘सिंघम’ के घिसे-पिटे रेफरेंस कम लेती है और उनके किरदार को दिन में हीरो तो रात में दब्बू दिखाती है. इस तरह का विरोधाभास उनके कैरेक्टर आर्क को मजबूती देता है और उनके पिछले कुछ नाकाबिले बर्दाश्त कॉमेडी किरदारों की याद साफ कर देता है.

बस कि शेट्टी साहब अपनी कहानी की साफ-सफाई भी अच्छे से कर लेते, तो इस बार हास्य की जगह कहानी, हमारे गले की फांस न बनती!