भारतीयों के लिए यह बड़ी खुशी की खबर है कि इंग्लैंड हो या अमरीका या कनाडा, दीवाली वहां के राष्ट्रप्रमुखों की तरफ से धूमधाम से मनाई गई. इसकी एक व्याख्या इस प्रकार भी की जाती है कि देखिए, आखिर हिंदू धर्म का लोहा इन मुल्कों ने भी मान लिया. यह हिंदू धर्म की महानता की इनके द्वारा स्वीकृति है. जबकि वे यह भी कह सकते थे कि ईसाई बहुल इन देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने अगर अपने देश के एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के त्यौहार में शिरकत की है तो इसे उनका बड़प्पन माना जाना चाहिए. इस पर अगर उस मुल्क के बहुसंख्यकों ने हायतौबा नहीं मचाई है, अगर इसे हिन्दुओं का तुष्टीकरण नहीं कहा है तो इसे उस देश की जनता की उदारता के प्रमाण के रूप में लिया जाना चाहिए.

यह भी ध्यान रहे कि ऐसा वे देश कर रहे हैं जिनके लिए हिंदू धर्म वाकई नया है. सौ दो सौ साल बहुत नहीं होते. कनाडा में तो एक सिख को वहां के एक प्रमुख राजनीतिक दल का मुखिया चुना गया है. यह सिख धर्म की जीत नहीं, कनाडा की धर्मनिरपेक्षता का सबूत है. कनाडा के मंत्रियों में कई सिख हैं, अमरीका के प्रमुख सरकारी पदों पर भारतीय मूल के लोग हैं और इंगलैंड में तो ज़माने से भारतीय मूल के लोग सांसद रहे हैं. इन देशों के बहुसंख्यक समुदाय के लोगों में इसे लेकर कोई असुरक्षा नहीं दिखलाई पड़ी है. बल्कि इन देशों के दक्षिणपंथी दलों ने भी इस मामले में दरवाजा खुला रखा है.

हम अपने देश की तुलना अगर इन देशों से करते हैं तो खुद को कहां पाते हैं? जिस देश में हर कुछ समय बाद यह प्रश्न विचारणीय हो जाए कि ताजमहल और लाल किला भारतीय हैं या नहीं, उसे खुद को उदार कहने का कितना हक है? सिर्फ उदार नहीं, अक्लमंद भी? अभी कुछ साल ही हुए, यह संभावना भर बनी कि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन सकती हैं. इस पर भारत का सेंसेक्स तक धड़ाम से नीचे गिर पड़ा. अब तक याद है कि मुंबई के सट्टा बाज़ार के लोग सड़क पर निकल आए कि एक इटैलियन मूल की ईसाई महिला भारत की प्रधानमंत्री कैसे बन सकती हैं? पूंजीवाद तो विश्व को ही एक बाज़ार बना लेना चाहता है. फिर भारत की पूंजी की राजधानी में राष्ट्रवादी भय क्योंकर घर कर गया कि चिदंबरम साहब को ख़ास इसीलिए मुंबई जाना पड़ा कि उस भय को दूर कर सकें?

आज के शासक दल ने तो तब आसमान ही सर पर उठा लिया था. उसकी दो महिला नेताओं ने कहा था कि अगर भारत पर यह विपत्ति आती है तो वे अपना सर मुंडा लेंगी और नंगे फर्श पर सोना शुरू कर देंगी. आज वे दोनों मंत्री हैं. एक तो परराष्ट्र विभाग ही देखती हैं और सबसे उदारमना मानी जाती हैं!

जब सोनिया गांधी का ईसाई और इटैलियन मूल का होने के कारण इस कदर विरोध किया जा रहा था, किसी ने यह न सोचा कि कई ईसाई देश या समाज भारत और विशेषकर हिन्दुओं के बारे में क्या सोच रहे होंगे? उनकी संकीर्णता और कट्टरपन के बारे में उनका क्या ख्याल बन रहा होगा? इस विरोधाभास पर विचार नहीं किया गया कि दूसरे देशों में हिन्दुओं और सिखों के बड़े पदों पर होने को लेकर तो हम प्रसन्न होते हैं लेकिन अपने देश में इस कायदे का पालन करने में उलझन महसूस करते हैं.

मेडिसन चौक पर जब भारतीय प्रधानमंत्री का स्वागत करने सैंकड़ों भारतीय मूल के लोग पहुंचे तो उनके दिमाग में यह ख्याल न आया कि अमरीकी भारत के प्रति उनके उत्साह को देखकर क्या उनकी पहली प्रतिबद्धता के बारे में कुछ सोच रहे होंगे या नहीं! क्या इसी तरह के दृश्य की कल्पना वे भारत में कर सकते हैं कि चीनी राष्ट्र प्रमुख के दौरे पर भारत में बस गए चीनी उनका स्वागत करने कहीं इकठ्ठा हो जाएं और चीनी नेता अपने देश की राजनीति पर उनसे बातचीत करें और उनका सहयोग मांगें? इस मजमे में आए चीनियों को फौरन ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा ठहरा दिया जाएगा.

याद करें भारत चीन युद्ध के वक्त भारतीय राष्ट्रवादियों ने चीनियों पर किस कदर हमला किया था. अगर आप भीष्म साहनी की कहानी वांग्चू भर याद कर लें तो भारतीय बेदर्दी के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता न रह जाएगी.

भारतीय हिंदुओं को इन प्रश्नों पर विचार करना चाहिए. किसी और के लिए नहीं, अपने लिए! यह कहने की एक और वजह है. वह यह कि दिमागी संकीर्णता धीरे-धीरे उनकी सोचने-समझने की ताकत को कुंद कर डालेगी. एक उदाहरण बिलकुल हाल का है.

दीवाली के रोज़ कनाडा के प्रधान मंत्री जस्टिन त्रुदो ने त्यौहार की बधाई देते हुए लिखा - “दीवाली मुबारक!” इस पर ट्विटर की दुनिया में खासी प्रतिक्रिया हुई. एक साहब ने उन्हें नसीहत दी कि दीवाली की बधाई दी जाती है मुबारकबाद नहीं. दूसरे ने बताया कि सही शुभ दीपावली कहना है न कि दीवाली मुबारक. यह इसलिए कि मुबारक अरबी है भारतीय नहीं. एक भारतीय पर्व पर शुभकामना भारतीय शब्द का प्रयोग करते हुए ही दी जा सकती है. एक ने त्रुदो पर रहम खाते हुए कहा कि बेचारे को छोड़ दो, वह अभी कोशिश कर रहा है!

लेकिन बोलने वाले ने यह न सोचा कि अगर वह सिर्फ विशुद्ध भारतीय शब्दों का ही प्रयोग करने का प्रण लेगा तो हो सकता है उसकी जुबान पर ताला लग जाए. क्योंकि जुबान की जगह क्या हर बार वह जिह्वा बोलेगा? क्या हम ही ऐसा कर सकते हैं!

बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्र में बचपन गुजरा. प्रायः लोगों को कहते सुनता था, “फजीरे भेंट होई.” कुछ वक्त गुजर जाने पर मालूम हुआ फजीर तो फजर से बना शब्द है जो अरबी से चलकर सीवान की भोजपुरी में ठौर पा गया. बांग्ला में क़ानून के लिए आईन शब्द ही प्रचलित है जो फ़ारसी है. क़ानून ही कौन सा भारतीय मूल का है, उसका सफ़र तो अरब से शुरू हुआ है.

भाषा की यह बहस पुरानी है लेकिन इसने भारत में हिंदी और उर्दू, दोनों का ही ख़ासा नुकसान किया है. आप सौ साल पहले की हिंदी पढ़ें और उसकी प्रांजलता पर विचार करें. उसका कारण यह है कि उसके लेखक की दिमागी खिड़की तंग नहीं है. वह एक ओर संस्कृत के स्रोत से प्रवाहित जल में हाथ डुबोता है तो दूसरी ओर फ़ारसी हवा में सांस लेता है. और चलता वह स्थानीय भाषा की ज़मीन पर है. इसलिए उसे शब्दों का टोटा नहीं पड़ता. उन्हें मौके के मुताबिक़ लफ्ज़ बड़ी आसानी से मिल जाते थे.

शब्दों का इस्तेमाल करते वक्त मुख सुख का ख़याल भी रखा जाता है. इसलिए ख़याल कहां लिखना है और विचार कहां, यह भाषा प्रयोग में कुशल हुए बिना समझना मुश्किल है. भाषा की एक लय होती है, वह सिर्फ मायने ही नहीं पहुंचाती हम तक. ध्वनि सौंदर्य का सृजन भाषा के प्रयोक्ता का दायित्व है. इसलिए वह शब्द भी ध्यान से चुनता है. लेकिन जो दिल और दिमाग से आलसी हैं वे शब्दों की यात्रा की मेहनत में क्यों पड़ें? यह भी क्यों सोचें कि बहुत कुछ सांस्कृतिक हिचकिचाहटों और रुचियों से भी तय होता है.

‘शुभ प्रभात’ कहने में हमें जितनी देर लगती है उतनी गुड मॉर्निंग कहने में नहीं. गुड आफ्टरनून के लिए भारतीय प्रतिरूप अभी नहीं खोजा गया. उसी तरह गुड डे तो कहते हैं लेकिन क्या शुभ दिवस कहा जाता है? धन्यवाद कहने में हमें देर लगती है, थैंक यू या थैंक्स कहने में नहीं.

जो भैया और मां या माताजी की जगह मातृश्री और भ्रातृश्री कहने लगे, वे सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़े थे या कटे, यह सोचा नहीं गया. यह लिखते लिखते भीष्म साहनी की आत्मकथा आज के अतीत का एक प्रसंग याद आ गया:

गुरुकुल की शिक्षा-दीक्षा का ही प्रभाव रहा होगा कि एक दिन बलराज मुझसे बोले:

“सुन.”

“क्या है?”

“आगे से मुझे बलराज मत बुलाया कर. मैं तेरा ज्येष्ठ भ्राता हूं.”

“तो क्या बुलाया करूं?”

“भ्राताजी! तू मुझे भ्राताजी कहकर बुलाएगा. अब हो जा मेरे पीछे.”

जब हम बढ़ चले तो बोला:

“जब राम और लक्ष्मण दौड़ते भी थे तो आगे-पीछे. मैं तुम्हें उनके दौड़ने का ढंग सिखाऊँगा.”

मैं पहले तो उसके चहरे की ओर देखता रहा, फिर बड़ी अनिच्छा से कहा,

“अच्छा भ्राताजी !” और उसके पीछे पीछे हो लिया.

जब घर लौटने पर मैंने उसे “भ्राताजी!” बुलाया तो बहनें खिलखिला कर हंस पड़ीं.

“कौवा चला हंस की चाल!” बड़ी बहन ने कहा.

भ्राताजी बालक भीष्म के गले में अटकता था. बाद में स्कूल छोड़ने पर भ्राताजी पंजाबी के लोकप्रिय भापा में बदल गया और आजीवन चलता रहा.

आजीवन या ताजिंदगी? दूसरा लफ्ज़ इस्तेमाल करने पर मैं क्या विदेशी जीवन जीने लगूंगा!