हिंदी फिल्मों में स्विट्जरलैंड की हसीन वादियों और शिफॉन साड़ी का चलन स्थापित करने का श्रेय यश चोपड़ा को दिया जाता है. ‘किंग ऑफ रोमांस’ कहे जाने वाले यश चोपड़ा को पलायनवादी सिनेमा के अग्रणी फिल्मकारों में गिना जाता है और आज भी उनकी इस विरासत को ही यशराज फिल्म्स आगे बढ़ा रहा है.

लेकिन पलायनवादी सिनेमा का सिरमौर बनने से बहुत पहले यश चोपड़ा की फिल्में न सिर्फ सामाजिक विषयों को उठाती थीं बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता की ध्वजवाहक भी हुआ करती थीं. ऐसा होने की एक वजह तो यश चोपड़ा के बड़े भाई बीआर चोपड़ा थे, जिनकी फिल्में समाज में गहरे रची-बसी रहतीं, और दूसरी वजह विभाजन के वक्त भोगी गई त्रासदी थी, जिसने यश चोपड़ा को इंसानियत की अहमियत सिखाई थी.

यश चोपड़ा की पैदाइश लाहौर की थी और उनका लड़कपन भी वहीं बीता था. लेकिन बंटवारे की आग में झुलसते हुए वे अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा और भरे-पूरे परिवार के साथ पहले जालंधर आए थे और वहां से काम की तलाश में मुंबई पहुंचकर हमेशा के लिए उमस से भरे इस शहर के हो गए थे.

कई सालों तक फिर, बीआर चोपड़ा की फिल्मों में सहायक निर्देशक बनकर उन्होंने काम सीखा और 27 साल की उम्र में अपनी पहली फिल्म निर्देशित की. फिल्म का नाम था ‘धूल का फूल’ (1959) जिसमें सिल्वर जुबली स्टार के तौर पर जाने गए राजेंद्र कुमार के अलावा माला सिन्हा, नंदा और अशोक कुमार मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म की कहानी उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिहाज से बोल्ड थी, जिसमें नायक-नायिका द्वारा ठुकरा दिए जाने के बाद उनके ‘नाजायज’ हिंदू बच्चे को एक सहृदय मुसलमान ने पाला-पोसा था और बदले में समाज के ताने भी सुने थे. अपनी इमेज से दूर हटकर राजेंद्र कुमार ने इस फिल्म में ग्रे शेड वाली भूमिका अदा की थी और उनका किरदार माला सिन्हा को प्यार में धोखा देकर दूसरी शादी कर लेने वाले एक जज का था.

लेकिन एक जरूरी कहानी कहकर हिट होने वाली इस फिल्म को यश चोपड़ा के बहाने आज याद करने की सबसे बड़ी वजह इसमें मौजूद यह गीत है - ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’. किसने सोचा था कि साहिर लुधियानवी का लिखा, मोहम्मद रफी का गाया और स्क्रीन पर मनमोहन कृष्ण द्वारा अभिनीत यह गीत 58 साल बाद भी आज के दौर में इतना मौजू होगा कि धर्म के नाम पर द्वेष फैलाने वालों से बचने के लिए सन् 2017 के लिए एक जरूरी सबक सा बन जाएगा. आप भी यश चोपड़ा के बहाने उनके द्वारा खूबसूरती से फिल्माए गए इस गीत को फिर सुनिए और साहिर जब गीत में कहें - ‘तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा’, तो 50-60 साल बाद भी वो बदला हुआ वक्त नहीं ला पाने के लिए शर्मिंदा होइए.

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सामाजिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति यश चोपड़ा की यह संवेदनशीलता उनके निर्देशन की दूसरी फिल्म में भी देखने को मिलती है. इस बार पहले की तुलना में ज्यादा मुखर रूप में, और शायद इसीलिए 1961 में रिलीज होते वक्त ‘धर्मपुत्र’ विवादों की आग में बहुत झुलसी थी.

फिल्म की कहानी एक ऐसे नायक (शशि कपूर) की थी जो आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदू कट्टरपंथी विचारधारा को अपनाकर साम्प्रदायिक हो जाता है और मुसलमानों से इतनी नफरत करने लगता है कि उन्हें और उनके घरों तक को जलाने से उसे गुरेज नहीं होता. लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि वो खुद भी एक मुस्लिम मां की संतान है, जिसे हिंदुओं ने पाला है, तो यह राज जानने के बाद ही साम्प्रदायिकता की काली पट्टी उसकी आंखों से उतर पाती है.

कहते हैं कि ‘धर्मपुत्र’ की रिलीज के वक्त हिंदूवादी संगठनों ने इसका धुर विरोध किया था और बंटवारे की असलियत दिखाने की वजह से सिनेमाघरों तक को जलाने की धमकी दी थी. इस कारण फिल्म अच्छा कारोबार करके सफल भी नहीं हो पाई थी और अगले कई वर्षों तक दूसरे फिल्मकारों ने बंटवारे पर फिल्म न बनाना ही बेहतर समझा था.

लेकिन बाद के वर्षों में सेक्युलर विचारधारा वाले यश चोपड़ा की यह अंजान सी फिल्म बहुत सराही गई और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बनी इस बेहतरीन फिल्म को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का नौवां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. और इस तरह, ‘किंग ऑफ रोमांस’ बनने के बहुत पहले यश चोपड़ा हिंदू-मुस्लिम एकता के एक ध्वजवाहक भी बने.