साल 2006 में इमरान हाशमी की एक फिल्म रिलीज हुई थी - अक्सर. इस फिल्म ने हाशमी की ‘सीरियल किसर’ वाली इमेज को जमकर भुनाया था. फिल्म का संगीत तो इतना लोकप्रिय हुआ था कि आज भी सड़कों पर मोटर बाइक्स के हॉर्न में ‘झलक दिखला जा’ सुनने को मिल ही जाता है. विकीपीडिया पेज पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस शुक्रवार को रिलीज हुई ‘अक्सर 2’ हाशमी वाली उसी फिल्म की सीक्वल है, हालांकि फिल्म से जुड़े लोग इससे इंकार करते हैं और इसे एकदम नई कहानी बताते हैं.

फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में ज़रीन खान, टीवी के चर्चित सितारे गौतम रोड और बॉलीवुड में बस एक फिल्म पुराने मोहित मदान हैं. मोहित मदान वो ‘दिल्ली बॉय’ हैं, जिनकी परवरिश न्यूजीलैंड में हुई है और करीब तीन साल पहले फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए वो भारत लौटे हैं. आश्चर्यजनक रूप से न उनमें दिल्ली मार्का दिखावा है न एनआरआई होने का टशन. दिखता है तो ढेर सारी मेहनत करके बॉलीवुड में अपने पैर जमा लेने का जज्बा. फिल्मों से लेकर राजनीति तक तमाम विषयों पर मोहित मदान से हुई बातचीत के अंश :

आपकी फिल्म अक्सर 2’ का इमरान हाशमी वाली अक्सर’ से कितना कनेक्शन है?

मैं उम्मीद करता हूं कि ‘अक्सर 2’ की तुलना कोई पहली वाली ‘अक्सर’ से न करे. पहली बात तो कि दोनों फिल्मों में 11 साल का फासला है. वहीं हमारी फिल्म की कहानी भी एकदम अलग है, वैसे यह भी एक सस्पेंस थ्रिलर है, लेकिन थोड़ी हटकर. फिलहाल मैं यह कह सकता हूं कि इसमें हर किरदार जरूरी है और कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़ा हुआ है. यह सोलो परफॉर्मर टाइप फिल्म नहीं है बल्कि चार-पांच किरदारों की कहानी है. यह फिल्म आपको शॉर्टकट के नतीजे दिखाएगी, यानी कि जब आप कोई शॉर्टकट चुनते हैं तो कैसे उससे जुड़ी मुश्किलों में फंस जाते हैं. और तब क्या होता है जब आपको समझ नहीं आता कि अब बाहर कैसे निकलना है. दो घंटे की इस फिल्म में आप हमेशा अंदाजा लगाते रहेंगे कि आगे क्या होगा कैसे होगा.

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‘लव एक्सचेंज’ (2015) के बाद ‘अक्सर 2’ आपकी दूसरी फिल्म है. इसके बाद किसी और प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है?

अक्सर-2 के बाद एक और फिल्म आ रही है, ऋषिता भट्ट के साथ – इश्क तेरा. उसमें लड़की को मल्टी पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है. इस फिल्म में एक परिवार के लव और इमोशन्स की कहानी है.

करीब तीन-चार साल से आप बॉलीवुड में हैं और इस दौरान तीन फिल्में आपके हाथ में हैं. इसमें ‘अक्सर 2’ जैसी चर्चित फिल्म भी है. कहा जा सकता है कि आपका करियर बड़ी तेजी से आगे बढ़ा है.

सुनने में लग सकता है कि ये बहुत कम वक्त है. सबको अपने-अपने स्ट्रगल का टाइम सबसे कठिन लगता है. मेरे साथ भी ऐसा ही है. इन तीन-चार सालों में ही मुझे बहुत कुछ झेलना-देखना पड़ा. बहुत बार ना भी सुननी पड़ी, ऐसे में आपके आत्मविश्वास और उत्साह की बैंड बज जाती है. इसके बावजूद आपके लिए कोई डिसीजन बेस्ट डिसीजन हो यह आपको ही तय करना होता है. मैं खुद से प्यार करता हूं और हर समय खुद को बतौर परफॉर्मर तैयार करता रहता हूं. सीधे कहूं तो यह मेरी मेहनत है.

आपकी पढ़ाई-लिखाई न्यूजीलैंड में हुई है फिर भी आप इतनी साफ हिंदी कैसे बोल लेते हैं?

वैसे मैं पैदा दिल्ली में हुआ था. मैं जब तीन साल का था तब हम न्यूजीलैंड चले गए. फिर वहां से छह-सात साल पहले हम दुबई शिफ्ट हुए. साफ हिंदी का क्रेडिट मेरी मां को जाता है. उन्होंने मुझे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख दी. घर पर हम हमेशा हिंदी में बात करते थे. और फिर अब मैं हिंदी फिल्मों में एक्टर हूं तो कम से कम मेरी भाषा तो ऐसी होनी ही चाहिए कि उससे दर्शकों तक मेरी बात पहुंच सके. हालांकि इसके साथ अपनी भाषा सुधारने के लिए मैंने थोड़ी मेहनत भी की है.

बॉलीवुड में आने के बारे में कैसे सोचा, दोस्त-परिवार में से भी कोई है यहां?

बॉलीवुड में मेरी जान-पहचान-रिश्तेदारी का दूर-दूर तक कोई नहीं है. अगर होता तो जैसा मैंने बताया मुझे यहां तक पहुंचने में साढ़े तीन साल नहीं लग जाते. मैं भी किसी बड़ी फिल्म से लॉन्च हो चुका होता (हंसते हुए). हां, बचपन से मुझमें लोगों को खुश करने का, उन्हें हंसाने का बड़ा शौक था. मैं हमेशा लोगों को एंटरटेन करने में बिलीव करता था. शायद यही खूबी मुझे बॉलीवुड तक ले आई.

फिल्मों से पहले किन चीजों में हाथ आजमाया – थिएटर, टीवी या किसी दूसरे माध्यम में?

मैंने पढ़ाई के दौरान न्यूजीलैंड में थोड़ा-बहुत थिएटर किया था. वहां पर मैं इंटर स्कूल कॉम्पटीशन में हिस्सा लेता था. इंडिया आने के बाद से मैंने थिएटर सिर्फ देखा और खूब सीखा. मुझे लगता है थिएटर एक्टर का मीडियम है, फिल्में डॉयरेक्टर का और टीवी दोनों का मिला-जुला. यहां कभी थिएटर करने का मौका नहीं आया. टीवी में काम करने के कई मौके मुझे सिर्फ इसलिए गंवाने पड़े कि उनकी डेट्स मेरी फिल्मों से क्लैश हो रहीं थी. इसलिए मैं बहुत चाहकर भी नहीं कर पाया. बतौर एक्टर मैं हर मंच आजमाना चाहता हूं, चाहे वह टीवी हो वेबसीरीज हों, फिल्में तो हैं ही.

वेब सीरीज का आपने ही जिक्र कर दिया है. वेब सीरीज के बारे में कहा जाता है कि वे हीरो की हीरोगिरी पर नहीं कंटेंट पर चलती हैं जबकि फिल्मों पर क्लीशेड होने का इल्जाम लगता रहा है.

बतौर ऑडियंस हम फिल्मों में क्लीशे होने का इल्जाम लगाते रहते हैं और ऑडियंस ही है जो ऐसी फिल्मों को हिट करवाती है. फिल्म देखना हमारे खून में हैं. जब हम बड़े होते हैं तो खाने की ही तरह हमारा फिल्मों वाला टेस्ट भी डेवलप हो रहा होता है. जिस तरह की फिल्में हम देखते आते हैं, उन्हें ही पसंद करने लगते हैं. लेकिन इसके कारण इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि फिल्मों में कहानी नहीं होनी चाहिए या हर फिल्म की कहानी एक सी होनी चाहिए.

इसके अलावा वेब सीरीज यहां पर इसलिए ज्यादा सफल हो जाती हैं कि आपके पास कभी भी उन्हें स्किप करने का, टैब बंद करने का ऑप्शन होता है, जबकि फिल्में देखते हुए आप पहले ही पैसे दे चुके होते हैं. फिल्म-सिनेमा जैसे माध्यमों में आप कभी यह तय नहीं कर सकते कि दर्शक को क्या पसंद आएगा. इसलिए कंटेट वाली फिल्में आ रही हैं, यह अच्छा तो है पर टिपिकल मसाला बॉलीवुड भी हमेशा चलने वाली चीज है और रहेगा. वेब सीरीज जैसे माध्यम एक्सपोजर के लिहाज से बहुत बढ़िया हैं, लेकिन फिल्मी परदा हमेशा एक्टर का सपना होता है और रहेगा.

लेकिन वेब सीरीज का ही असर है कि हमारी फिल्मों में अब कंटेंट पर भी जोर दिया जाने लगा है. आपको क्या लगता है?

देखिए, वेब सीरीज देखने वाली ऑडियंस बहुत स्मार्ट हो गई है. जैसे अगर स्विट्जरलैंड का उदाहरण लें तो एक बार गूगल करने पर उसे स्विट्जरलैंड के बारे में जी-भर के जानकारी मिल जाएगी, यहां तक कि अगर कोई जाना चाहे तो जा भी सकता है. अब सिर्फ स्विट्जरलैंड के लिए कोई फिल्म क्यों देखना चाहेगा इसलिए अब वो थोड़ी सी ज्यादा ह्यूमन चीजें पसंद करने लगा है. ‘बरेली की बर्फी’ या ‘न्यूटन’ जैसी फिल्में उसे इसीलिए पसंद आती हैं कि वो उनसे खुद को कनेक्ट कर सकता है और साथ ही साथ हंस सकता है. ऐसा मनोरंजन पसंद करने वाले दर्शक अब बढ़ रहे हैं इसलिए कंटेट जहां होगा वो पसंद किया ही जाएगा. अगर यह वेब सीरीज का असर है तो अच्छी बात है.

हाल-फिलहाल रिलीज हुई किसी फिल्म को देखकर लगता है कि यह भूमिका मुझे मिलती तो मैं फटाक से कर लेता? आपका कोई ड्रीमरोल है?

हाल-फिलहाल की फिल्म का तो बता नहीं सकता क्योंकि जब मैंने फिल्म देखी तो ऑलरेडी किसी और एक्टर ने एक किरदार परफॉर्म कर ही दिया था. इसके बाद उसे हटाकर मैं खुद को नहीं सोच पाता और ड्रीमरोल जैसा भी कुछ नहीं है. बतौर एक्टर मैं बस यह चाहता हूं कि अलग-अलग जॉनर की फिल्में कर सकूं और हर परफॉर्मेंस में अपने दर्शकों के साथ कनेक्ट कर सकूं.

आप नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से हैं और पिछले दिनों कंगना रनौत ने नेपोटिज्म के खिलाफ झंडा बुलंद कर रखा था. इस पर आपकी क्या राय है?

नेपोटिज्म तो देखिए हर जगह है. अब ये बॉलीवुड की अच्छी बात कहिए या बुरी, कि यहां पर साफ-साफ पता चल जाता है. ये इंडस्ट्री ऐसी है, यहां कॉम्पटीशन इतना है कि हर कोई चाहेगा कि मेरा कोई परिवार वाला, दोस्त, रिश्तेदार यहां हो. तो जिनके हैं उनके लिए तो चीजें थोड़ी आसान हो ही जाएंगी न. जैसा मैंने कहा कि अगर मेरे घर का कोई होता तो मुझे साढ़े तीन साल नहीं लगते. मेरा ख्याल है कि नेपोटिज्म का फायदा ये है कि आपको सही वक्त पर, सही एक्सपोजर के साथ एक बड़ा ब्रेक मिल जाता है. इसके बाद तो उनका भी स्ट्रगल रहता है. अगर आप टैलेंटेड हैं तो ही आप आगे बढ़ेंगे. हो सकता है नेपोटिज्म के कारण एकाध बार फेल होने के बावजूद उन्हें बड़े मौके मिलते रहें लेकिन स्टार किड्स को भी खुद को प्रूव तो करना ही पड़ता है.

तीन साल से आप बॉलीवुड में हैं और तीन साल ही हुए हैं मोदी सरकार को सत्ता में आए. पॉलिटिक्स से कितना वास्ता रखते हैं और इससे प्रभावित एजेंडा फिल्मों पर आपकी क्या राय है.

मैं पॉलिटिक्स से तो वास्ता नहीं रखता. किसी भी आम नागरिक की तरह मोदी सरकार या उसके फैसले मुझ पर असर डालते हैं. फिल्मों के बारे में यही कह सकता हूं कि किसी भी तरह की कला आजादी से जुड़ी रहती है. आर्ट तो अपने आप में ही फ्री है. अगर आप कल्चर या पॉलिटिक्स से कहीं न कहीं जुड़ते हैं तो वह कला नहीं रह जाती.