उत्तर प्रदेश सरकार शिया और सुन्नी वक़्फ़ बोर्डों का विलय करने की योजना बना रही है. हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़ वक़्फ़ राज्यमंत्री मोहसिन रज़ा ने बताया कि सरकार का इरादा दोनों बोर्डों का विलय कर एक ‘यूपी मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड’ बनाने का है. रज़ा ने आगे कहा कि दोनों बोर्डों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और सरकार जल्द ही इन्हें ख़त्म कर देगी. मोहिसन रज़ा ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़कर देश के सभी राज्यों में एक ही वक़्फ़ बोर्ड है. उनके मुताबिक़ राज्य में अलग-अलग वक़्फ़ बोर्ड होना ‘वैध’ नहीं है. उन्होंने कहा कि अलग-अलग बोर्डों में अलग अध्यक्ष, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और अन्य कर्मचारियों पर भारी ख़र्च आता है और यह पैसे की बर्बादी है.

मोहसिन रजा के मुताबिक यूपी मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड के गठन के बाद उसमें शिया और सुन्नी दोनों समुदाय के सदस्यों को शामिल किया जाएगा. बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव भी उन्हीं सदस्यों में से किया जाएगा. रजा ने जानकारी दी है, ‘शिया और सुन्नी वक्फ बोर्डों के विलय को लेकर सरकार को कई पत्र और सुझाव मिले हैं जिसके बाद सरकार ने इस बारे में संबंधित विभाग को प्रस्ताव भेजा है. क़ानून विभाग की समीक्षा के बाद सरकार इस पर विचार करेगी और यूपी मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड का गठन करेगी.’ वहीं, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के कैबिनेट मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी का कहना है कि सरकार इस तरह के किसी मामले पर कोई विचार नहीं कर रही है, ना ही उन्हें ऐसी किसी योजना की जानकारी है. मंत्री ने कहा कि ऐसा कोई प्रस्ताव उनके यहां विचारणीय नहीं है, और न ही फिलहाल सरकार की ऐसी मंशा है.

उधर, सरकार की योजना पर प्रतिक्रिया देते हुए शिया वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी ने कहा कि 2015 में पांच साल के लिए बोर्डों का गठन किया गया था. उन्हें बीच कार्यकाल में भंग करने का कोई प्रावधान नहीं है. रिज़वी ने कहा कि कार्यकाल ख़त्म होने के बाद सरकार वक़्फ़ बोर्डों की संख्या और उनकी आय को लेकर जांच कर सकती है. वहीं, राज्य के सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष ज़ुफ़र फ़ारूक़ी ने सरकार की योजना का स्वागत किया है. हालांकि उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि राज्य सरकार (अलग वक़्फ़ बोर्ड बनाने के) उसी फ़ैसले को क्यों बदल रही है जो 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाली कल्याण सिंह सरकार द्वारा लिया गया था.