पाब्लो पिकासो को तो जानते ही होंगे? संभव है, बहुत से लोगों ने उनका नाम सुन रखा होगा. पर निश्चित रूप से वे एक चित्रकार के रूप में ही उन्हें जानते होंगे. लेकिन मूल रूप से स्पेन के इस महान कलाकार के बारे में यह जानकारी अधूरी ही है. अधूरी भी क्या, उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मात्र है. बड़े होकर अपना जीवन फ्रांस में गुजारने वाले पिकासो कवि, नाटककार, स्टेज डिजाइनर (मंच सज्जा करने वाले), सेरेमिसिस्ट (मिट्‌टी की कलाकृतियां बनाने वाले) और प्रिंटमेकर भी थे. इसके साथ ही, एक आला दर्जे के मूर्तिकार भी. हालांकि पिकासो के चित्रों के अलावा उनकी अन्य कलाकृतियां भी जब-तब संग्रहालयों, प्रदर्शनियों और नीलामी घरों में नजर आती रही हैं. लेकिन उनकी चित्रकारी का जादू पूरी दुनिया के सिर पर इस कदर चढ़ा कि उनके व्यक्तित्व से जुड़े दूसरे तमाम पहलू पीछे रह गए या फिर कम जाने-समझे गए.

कुछ समय पहले जब पिकासो की बनाई एक मूर्ति से जुड़ा कानूनी विवाद सुर्खियों में आया तो उनके अद्भुत मूर्तिकार होने के संदर्भ में भी चर्चा शुरू हो गई. बहरहाल, पिकासो की बनाई मूर्ति की खरीद से जुड़ा विवाद एक तरफ है और यह बहस दूसरी् तरफ कि वे क्या चित्रकार से भी बेहतर मूर्तिकार थे? कई जानकार इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देते हैं. ऐसे ही जानकारों का आकलन है कि पिकासो ने अपने जीवनकाल में करीब 50,000 कलाकृतियां गढ़ीं. लेकिन इनमें उनके द्वारा बनाई गई शिल्पकृतियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी. पिकासो की जीवनी लिखने वाले रॉलैंड पेनरोज ने इस महान कलाकार की शिल्पकृतियों पर आधारित एक प्रदर्शनी आयोजित की थी. इसमें उन्होंने 284 कृतियां शामिल की थीं. जबकि पिकासो पर शोध करने वाले वर्नर स्पाइस ने उनकी कलाकृतियों की सूची में 664 मूर्तियों का जिक्र किया है. वहीं, पिकासो से संबंधित ऑनलाइन प्रोजेक्ट में उनकी बनाई 796 शिल्पकृतियों को जगह दी गई है. हालांकि किसी कलाकार के योगदान का आकलन महज उसकी कलाकृतियों की संख्या से करना ठीक नहीं. इसके लिए तो यह देखना बेहतर होता है कि उसकी कलाकृति किस कोटि या दर्जे की हैं.

पाब्लो पिकासो

पिकासो की बनाई गई मूर्तियों की तादाद अपेक्षाकृत कम रही. इसलिए भी इन्हें बहुत कम ही खरीदा और बेचा जाता है. मीडिया में पिकासो के मूर्तिशिल्प के ज्यादा सुर्खियां न बनने के पीछे भी यही बड़ी वजह रही. ब्रिटेन की राजधानी लंदन में स्थित क्रिस्टी नीलामघर ने 2014 में पिकासो की 116 चुनी हुई कलाकृतियों की नीलामी कीं जिनमें मूर्तिकृतियां सिर्फ नौ ही थीं. इसी तरह अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित सॉदबी नीलामघर ने भी पिकासो की 201 कलाकृतियों की नीलामी की, जिनमें सिर्फ 21 मूर्तियां ही थीं. हालांकि इसके बावजूद इन्हें जिस कीमत पर खरीदा गया, उसका किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया होगा.

उन्हें अपने मूर्तिशिल्प से बेहद प्यार था:

पिकासो की शिल्पकृतियों का जिक्र कम होने या उनके रहस्य बने रहने की एक वजह यह भी रही कि उन्हें अपनी इन कृतियों से बेहद प्यार था. वे इन्हें बेचने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थे. अमेरिका में कनेक्टीकट प्रांत के हर्टफोर्ड में स्थित ट्रिनिटी कॉलेज के प्रोफेसर माइकल फिज़गेराल्ड के मुताबिक, ‘पिकासो ने चित्रकला का प्रशिक्षण हासिल किया था और उन्हें अपनी पेंटिंग्स बेचने में कभी कोई हिचक महसूस नहीं हुई. दूसरी तरफ अपनी शिल्पकृतियों से उन्हें गहरा प्यार हो गया था. वे उन्हें अपने परिवार के सदस्यों की तरह संभाल कर रखते थे.’ यहां तक कि पूरी तरह अपनी बनाई मूर्तियों पर ही आधारित प्रदर्शनी लगाने के लिए भी वे 1966 तक तैयार नहीं हुए.

मगर 1967 में पेरिस में व्यापक स्तर पर उनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनी (‘पिकासो को आदरांजलि’ शीर्षक से) लगाई गई. इस प्रदर्शनी ने लंदन और न्यूयॉर्क की भी यात्रा की. तब कहीं जाकर उनका मूर्तिशिल्प लोगों के सामने आ सका. उसी वक्त आम जनता को पता चला कि यह कलाकार इस विधा में भी अपनी रचनाशीलता का प्रयोग कर रहा है. न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट के क्यूरेटर एन एमलैंड के मुताबिक, ‘यह पहला मौका था, जब पिकासो अपनी सारी शिल्पकृतियों को स्टूडियो से बाहर लाने के लिए राजी हुए थे. तभी आम लोगों को भी उनकी मूर्तिकला की गहराई और विस्तृत दायरे का भी अंदाजा हो सका.’

ज्यादा प्रचार नहीं मिल सका:

चूंकि पिकासो अपने जीवनकाल में लंबे समय तक अपनी शिल्पकृतियों को जनता के सामने लाने के लिए राजी नहीं हुए थे, इसलिए उनके इस काम का समग्र रूप से दस्तावेजीकरण भी नहीं हो सका. मिसाल के तौर पर कर्सटन-पीटर वर्न्क और इंगो एफ वाल्दर ने दो खंड में ‘पिकासो’ शीर्षक से जो किताब लिखी, उसमें 1,226 कलाकृतियों का वर्णन है. लेकिन शिल्पकृतियों के नाम पर इसमें सिर्फ 66 का जिक्र ही किया गया है. इसी तरह ‘अल्टीमेट पिकासो’ (अद्वितीय पिकासो) के नाम से एक और किताब आई. इसे ब्रिजिट लियॉल, क्रिस्टीन पाएट, मैरी लॉर बर्नाडेक ने मिलकर लिखा. इसमें पिकासो की 1,187 कलाकृतियों का विवरण है, लेकिन शिल्पकृतियां महज 78 ही हैं. यहां तक कि पिकासो की जीवनी की विस्तृत श्रृंखला लिखने वाले जॉन रिचर्डसन ने भी उनके मूर्तिशिल्प का जिक्र सरसरी तौर पर ही किया है.

पिकासो की ज्यादातर प्रदर्शनियों में भी मूर्तिशिल्प को सीमित तरीके से ही प्रदर्शित किया गया. जैसे कि 2012-13 में अमेरिका के गगेनहैम संग्रहालय और ह्यूस्टन संग्रहालय में ‘पिकासो; ब्लैक एंड व्हाइट’ के नाम से जो प्रदर्शनियां लगीं, उनमें कलाकृतियां तो 118 प्रदर्शित की गईं थी. लेकिन शिल्पकृतियां सिर्फ 12 ही थीं. इसी तरह, 2013 की ‘म्यूजी पिकासो’ के नाम से आयोजित की गई सफ़री नुमाइश (ट्रेवलिंग एक्जि़बिशन या चलती-फिरती प्रदर्शनी) में भी कुल 139 कलाकृतियां थीं. मगर इनमें शिल्पकृतियां सिर्फ 28 ही थीं.

मूर्तिशिल्प में प्रयोग जमकर किए:

पिकासो औपचारिक तौर पर चित्रकला में प्रशिक्षित थे. उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा भी पेंटिंग्स की बिक्री से ही आता था. लिहाजा, मूर्तिकला उनके लिए वह माध्यम बना, जिसमें वे स्वतंत्र रूप से खूब प्रयोग कर सकते थे. इसमें वे स्थापित नियम-कायदों को तोड़ सकते थे और ऐसा करते वक्त उनकी छवि या साख बिगड़ने का भी कोई झंझट या डर नहीं था. न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न (एमओएमए) की क्यूरेटर एन टेमकिन के मुताबिक, ‘चूंकि पिकासो गैर-पेशेवर मूर्तिकार थे, इसलिए मूर्तिशिल्प क्या है, इस पर वे पूरी आजादखयाली के साथ सोच-विचार कर सके, प्रयोग कर सके.’

उदाहरण के लिए पिकासो ने 20वीं सदी की शुरुआत में साथी कलाकार फ्रांस के जॉर्ज ब्रैक के साथ मिलकर चित्रकला में क्यूबिज्म (कलाकृति को यूं बनाना कि वह घनाकार (क्यूब के आकार वाले) टुकड़ों में बंटी या उनसे बनी नजर आए) शैली का चलन शुरू किया. इसे उन्होंने अपनी मूर्तिकला में भी बखूबी इस्तेमाल किया. पिकासो के द्वारा 1912-13 में किया गया यह प्रयोग एकदम अभिनव था. गार्जियन अखबार के कला समीक्षक जैसन फरागो कहते हैँ, ‘पिकासो की ये कलाकृतियां ‘बादलों के बीच कड़कती बिजली की चकाचौंध’ की तरह थीं. इनके जरिए कलाकार कला के नए स्वरूप को पाने के लिए मूर्तिकला के स्थापित तौर-तरीकों को उलट-पलट कर रहा था.’

पिकासो ने ऐसी ही एक कलाकृति ‘गिटार’ 1912 में बनाई. इसके लिए उन्होंने रोजमर्रा के काम में आने वाली सामान्य सी चीजों जैसे, कार्डबोर्ड (गत्ता) के टुकड़ों, थोड़ी मात्रा में लकड़ी और धातु आदि का उपयोग किया. इस तरह वे अपने शिल्प को आम जिंदगी से जोड़ते चले गए. यहां तक कि उन्होंने कला और जीवन के बीच की महीन सीमारेखा को भी धुंधला कर दिया. कला इतिहासकार वी एलेन बॉएस के अनुसार, ‘पिकासो का यह शिल्प गैर-प्रतिनिधित्ववादी मूल्य की तलाश करता है. दूसरे शब्दों में पिकासो अपने शिल्प को चित्रित करने के लिए मनमर्जी से पदार्थों-वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहे थे. इस तरह, जैसा कि उन्होंने खुद ही एक बार कहा था कि वे सिर्फ देखने वालों की ‘आंखों को ही नहीं बल्कि उनके दिमाग को भी चकमा देना चाहते थे.’

फिर 1950 तक पिकासो एक बार फिर सरल शिल्प की तरफ लौटे. इसमें शुरुआत कागज और गत्ता आदि से ही होती थी जिन्हें काटकर, घुमाकर तरह-तरह के आकार दिये जाते थे. इसके बाद इन्हें धातु की चादर से बनाया जाता था. इसे कभी वे पेंट करते थे और कभी नहीं भी.

अब पहली बार पिकासो की शिल्पकृतियों को उनका हक, प्रतिष्ठा और मान्यता मिलने की शुरुआत हुई है. उम्मीद है कि 1960 के दशक के आखिरी और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में जिस तरह की पहचान पिकासो की चित्रकला को मिली, वैसी ही अब उनकी मूर्तिकला को भी मिलेगी.

पिकासो के चित्रों की प्रदर्शनी पहली बार 1978 में दक्षिण-पूर्वी फ्रांस के एविनॉन शहर में लगी थी. इसमें उनकी विख्यात चित्रकृति ‘ली वाएल हॉम ऐसिस’ भी थी. तब उनकी चित्रकृतियों के बारे में काफी-कुछ लिखा-पढ़ा गया. अब ऐसा ही कुछ उनकी शिल्पकृतियों के मामले में होने लगा है. पिकासो की शिल्पकृतियों के बारे में जानने के लिए पूरी दुनिया में रुचि और ललक दिख रही है. यानी पिकासो के शिल्प का भी अब कलाकारों की आने वाली पीढ़ी पर गहर असर पड़ने वाला है.


(अमेरिका की सैम ह्यूस्टन स्टेट यूनिवर्सिटी में लिंग्विस्टिक और आर्ट हिस्ट्री के प्रोफेसर एनरिक मैलेन का लिखा यह लेख मूल रूप से द कन्वरसेशन पर प्रकाशित हुआ था.)