अभी कुछ सालों से टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर जब-तब विवाद शुरू हो जाता है. कहीं औरंगज़ेब रोड का नाम बदला जा रहा है, तो कहीं ताजमहल को हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिश हो रही है. ऐसा लगता है कि हम अपने भविष्य को ठीक करने की जगह इतिहास में दफन सच्चे-झूठे अफसानों को खोदकर निकालने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं. एक ऐसा देश जहां एक सुंदर, समृद्ध और समतामूलक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के निर्माण का कार्य अधूरा ही पड़ा हो, वह यदि ऐसे फ़िजूल और बेसिर-पैर के झगड़ों में पड़ता है, तो उसकी आनेवाली नस्लें क्या कभी उदार और भविष्योन्मुख हो पाएंगी?

अभी यदि पूरी दुनिया में छिड़ी सामाजिक और राजनीतिक हिंसा के मूल में जाएं, तो पता चलता है कि सब के सब इसी ऐतिहासिक प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त हैं. मनगढ़ंत ऐतिहासिक खातों का हिसाब चुकता करने को लेकर राष्ट्रों के बीच युद्ध चल रहे हैं. कथित नॉन-स्टेट एक्टर्स अपने-अपने तरीके से इतिहास, धर्म और संस्कृति की व्याख्या करते हुए पूरी मानवता के लिए ही संकट बन चुके हैं. कोई हर बात में पांच हजार साल पहले का इतिहास गिनाता है, तो किसी के लिए दुनिया की हर अच्छी चीज चौदह सौ साल पहले ही शुरू होती है. कोई इसे सभ्यताओं का संघर्ष मानता है, तो कोई साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का अवशेष.

लेकिन इन सबमें कुछ सामान्य प्रवृत्तियां हावी रहती हैं. जैसे, इनमें एक खास किस्म का विक्टिमहुड या पीड़ितपने का बोध होता ही होता है कि कैसे इतिहास में अलग-अलग लोगों और आक्रांताओं द्वारा उन्हें सताया गया. अलग-अलग समाज में और अलग-अलग कालखंड में इन आंक्रांताओं का नाम और स्वरूप बदलता जाता है. इनमें से हर कोई स्वयं को ऐतिहासिक रूप से उदार, अहिंसक और वैज्ञानिक साबित करने का प्रयास करता है और इसके लिए उन्हें दूसरों को क्रूर, बर्बर और असभ्य साबित करने की जरूरत होती है. हाल के दिनों में सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे ऊटपटांग इतिहास का प्रचार-प्रसार जोर-शोर से किया जा रहा है, जिससे समाज में प्रेम और भाईचारे के स्थान पर विद्वेष, दूरी और हिंसा को बढ़ावा मिलता हो.

गांधी ने इस प्रवृत्ति को बहुत पहले पहचान लिया था. गांधी ने अपने सहज अनुभवों के आधार पर इतिहास-लेखन की जिन कमजोरियों की ओर ईशारा किया था, वह हिस्टोरिओग्राफ़ी के गंभीर से गंभीर अध्येताओं के लिए भी एक बड़ा सबक हो सकता है. लेकिन गांधी तो अपनी सहजता में सभी खास-ओ-आम एक साथ संबोधित कर रहे थे. आज हम अतीतोन्मुखता के जिस कुचक्र में फंस गए हैं, उसमें गांधी के इतिहास संबंधी विचारों को फिर से सुनना-समझना जरूरी हो गया लगता है.

गांधी ने अपनी पहली ही किताब ‘हिंद स्वराज’ में इस बारे में खुलकर लिखा था. इस सवाल के जवाब में कि इतिहास में सत्याग्रह, दया और आत्मबल का कोई सफल उदाहरण क्यों नहीं दिखाई देता, गांधी ने लिखा- ‘इतिहास’ जिस अंग्रेजी शब्द का तरजुमा है उस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की तवारीख़ होता है. ऐसा अर्थ लेने से उसमें सत्याग्रह का प्रमाण नहीं मिल सकता. जस्ते की खान में अगर आप चांदी ढूंढ़ने जाएं, तो वह कैसे मिलेगी? ‘हिस्ट्री’ में दुनिया के कोलाहल की कहानी मिलेगी. इसलिए गोरे लोगों में कहावत है कि जिस राष्ट्र की ‘हिस्ट्री’ (कोलाहल की कहानी) मौजूद नहीं है, वह राष्ट्र सुखी है. राजा लोग कैसे खेलते थे, कैसे खून करते थे, कैसे बैर रखते थे, यह सब ‘हिस्ट्री’ में मिलता है. अगर यही इतिहास होता, अगर इतना ही हुआ होता, तब तो यह दुनिया कब की डूब गई होती. अगर दुनिया की कथा लड़ाई से शुरू हुई होती, तो आज एक भी आदमी ज़िंदा नहीं रहता.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘दुनिया में इतने लोग आज भी ज़िंदा हैं, यह बताता है कि दुनिया का आधार हथियार-बल पर नहीं है, बल्कि सत्य, दया और आत्मबल पर है. ...हजारों बल्कि लाखों लोग प्रेम के बस रहकर अपना जीवन बसर करते हैं. करोड़ों कुटुंबों का क्लेश प्रेम की भावना में समा जाता है, डूब जाता है. सैकड़ों राष्ट्र मेलजोल से रह रहे हैं, इसको ‘हिस्ट्री’ नोट नहीं करती, ‘हिस्ट्री’ कर भी नहीं सकती. जब इस दया की, प्रेम की और सत्य की धारा रुकती है, टूटती है, तभी वह इतिहास में लिखा जाता है. ...हिस्ट्री अस्वाभाविक बातों को दर्ज करती है. सत्याग्रह स्वाभाविक है, इसलिए उसे इतिहास में दर्ज नहीं किया जाता है.’

आज हम औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान के संदिग्ध इतिहास के हवाले से मौजूदा समाज में जहर घोल रहे हैं. 19 जनवरी, 1935 को गांधी ने दिल्ली के जामिया मिलिया में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए इसके प्रति चेताते हुए कहा था- ‘हमें यह मानना ही होगा कि सच्चा इतिहास सम्राटों और राजवंशों का इतिहास नहीं है, बल्कि उसके निर्माता तो आमतौर पर साधारण पुरुष और स्त्रियां हैं. चंद ऐसे लोग जिनकी दुनिया ने उनके आखिरी वक्त में खबर भी नहीं ली और विपदा झेलते-झेलते ही जो चल दिए, वे ही सच्चे बहादुर थे, न कि बड़े-बड़े शहंशाह— चाहे उन्होंने संसार में कितने ही महान साम्राज्य को स्थापित क्यों न किया हो, और दुनिया में तबाही और बरबादी लाने में उनका कितना ही हाथ क्यों न रहा हो.’

चलते-चलते यह देखना भी दिलचस्प हो सकता है कि टीपू सुल्तान के बारे में अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास के बारे में गांधी क्या सोचते थे. वालजी गोविंदजी देसाई गांधीजी के साथ ही उनके आश्रम में रहते थे. वे गांधीजी के लिए अनुवादक का काम करते थे. लोगों द्वारा भेजी गई चिट्ठियां भी वे गांधीजी को पढ़कर सुनाते थे. 23 जनवरी, 1930 को ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी ने इन्हीं वालजी गोविंदजी देसाई का टीपू सुल्तान पर लिखा गया एक लेख प्रकाशित किया. लेख का शीर्षक था- ‘टीपू सुल्तान : हिंदू-मुस्लिम एकता के महान प्रतीक’ (ए मॉन्यूमेंट ऑफ़ हिंदू-मुस्लिम यूनिटी).

इस लेख के शुरू में ही वालजी ने लिखा था- ‘विदेशी इतिहासकारों ने मैसूर के फतेह अली टीपू सुल्तान का वर्णन एक ऐसे कट्टरपंथी शासक के रूप में किया है जिसने अपनी हिंदू प्रजा को सताया और जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कर मुसलमान बनाया. जबकि सच्चाई यह है कि अपनी हिंदू प्रजा के साथ उनके संबंध पूरी तरह से सौहार्द्रपूर्ण थे.’ इस लेख में बताया गया था कि मैसूर राज्य के पुरातत्व विभाग के पास ऐसे तीस पत्र मौजूद थे जो टीपू ने श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य को लिखी थी. टीपू ने ये चिट्ठियां कन्नड़ लिपि में ही लिखी थीं और इनमें बड़ी संख्या में संस्कृत के शब्द प्रयोग किए गए थे. टीपू ने कभी भी हिंदू व्यापारियों को अपना खाता अरबी में लिखने के लिए बाध्य नहीं किया. टीपू ने अपने महल से सटे मंदिरों के साथ ही श्री वेंकटरमन्ना, श्रीनिवास और श्रीरंगनाथ मंदिरों को ज़मीनें और अन्य महंगे उपहार प्रदान किए थे. इस लेख में टीपू के छविभंजन के लिए विदेशी इतिहासकारों की फूट डालो और राज करो की नीति को जिम्मेदार बताया गया था.

बिल्कुल यही बात गांधी ने 11 जून, 1928 को गुजरात विद्यापीठ के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कही थी- ‘अध्यापकों को सोचना चाहिए कि हिन्दुस्तान का इतिहास क्या हो सकता है. कोई फ्रांस का आदमी इतिहास लिखेगा, तो एक तरह का लिखेगा, अंग्रेज दूसरी तरह लिखेगा. ...फ्रांसीसियों और अंग्रेजों की लड़ाई के अंग्रेजों के लिखे हुए हाल को क्या तुम वेद-वाक्य मानते हो? जिसने लिखा होगा ठीक ही लिखा होगा? उसने तो अपने दृष्टिकोण से लिखा है. वह उसी किस्म की घटनाएं बयान करेगा जिनमें अंग्रेजों की जीत हुई हो. हम भी ऐसा ही करेंगे. फ्रांसीसी भी ऐसा ही करेंगे.’

आज टीपू के बारे में लिखे गए जिस इतिहास के आधार पर हिंदू-मुसलमान के बीच वैमनस्यता फैलाने के लिए गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं, वह इतिहास किर्कपैट्रिक और विल्क्स जैसे उन संदिग्ध अंग्रेज इतिहासकारों ने लिखा था, जिन्होंने खुद टीपू सुल्तान के खिलाफ युद्ध में भाग लिया था और जो लॉर्ड कॉर्नवालिस और रिचर्ड वेलेस्ली के प्रशासन से संबंध रखते थे. इन इतिहासकारों के तथ्यों को दूसरे अंग्रेज इतिहासकार भी दुर्भावना से ग्रस्त और अविश्वसनीय ठहरा चुके हैं. वैसे साम्राज्यवादी दौर के कुछ अंग्रेजों के इतिहास-लेखन की समझदारी पर किसी अन्य संदर्भ में गांधी ने ‘हिन्द-स्वराज’ में एक स्थान पर एक मारक टिप्पणी की है-

‘(अमुक संप्रदाय हिंसक है और अमुक संप्रदाय अहिंसक) ऐसे विचार स्वार्थी धर्मशिक्षकों, शास्त्रियों और मुल्लाओं ने हमें दिए हैं. और इसमें जो कमी रह गई थी उसे अंग्रेजों ने पूरा किया है. उन्हें तो इतिहास लिखने की आदत है. दुनिया के सभी समाजों का रीति-रिवाज जानने का वे दंभ भरते हैं. ...वे अपने बाजे खुद बजाते हैं और हमारे मन में अपनी बात सही होने का विश्वास जमाते हैं. और हम भोलेपन में उस सब पर भरोसा कर लेते हैं.’

इसलिए आज फिर से अपने भोलेपन में हम वैसी ही जहरखुरानी का शिकार तो न ही बनें. हिंदू हों या मुसलमान या कोई अन्य समुदाय, हम सभी को अपने-अपने फिरकों के बारे में झूठा दंभ और अहंबोध त्यागना होगा. अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ना या झूठे-सच्चे जख्मों को कुरेदना बंद करना होगा. तभी हम अपनी मौजूदा और भावी पीढ़ियों को एक सुंदर समाज दे पाएंगे. हमें याद रखना चाहिए कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने का मजा एकदम क्षणिक होता है, लेकिन समाज, देश और दुनिया के लिए उसका दुष्परिणाम घातक और दूरगामी होता है. और उसकी चपेट में देर-सवेर सभी आते हैं.